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अरविंद मोहन यह अलग बात है कि विपक्ष ने साध्वी निरंजन ज्योति की घटिया बयानबाजी और इराक में उनतालीस भारतीयों के जीवित होने को लेकर उठ रहे नए सवालों पर सरकार को बचाव की मुद्रा में आने को मजबूर कर दिया, लेकिन संसद के इस सत्र के शुरूमें सरकार की परेशानियों और विपक्ष की एकजुटता […]

Author December 6, 2014 12:00 PM

अरविंद मोहन

यह अलग बात है कि विपक्ष ने साध्वी निरंजन ज्योति की घटिया बयानबाजी और इराक में उनतालीस भारतीयों के जीवित होने को लेकर उठ रहे नए सवालों पर सरकार को बचाव की मुद्रा में आने को मजबूर कर दिया, लेकिन संसद के इस सत्र के शुरूमें सरकार की परेशानियों और विपक्ष की एकजुटता और ताकत को लेकर जो बातें कही जा रही थीं उनका दूर-दूर तक कोई अता-पता नहीं है। इन दोनों मसलों पर लगभग पूरा विपक्ष एकजुट रहा लेकिन सत्र के विधायी कामों में यह एकता न दिखी। इसके चलते सरकार ने स्वतंत्र ढंग से काम किया और विपक्षी एकता में दरारें दिखने लगीं।

एक तो महाराष्ट्र सरकार में भागीदारी के सवाल पर भाजपा-शिवसेना की अनबन वह रूप नहीं दिखा सकी जिसकी विपक्ष आशा कर रहा था; आखिरकार फडणवीस सरकार में शिवसेना शामिल हो ही रही है। इसी खटपट के आधार पर सरकार को राज्यसभा से विधेयक पास कराने में दिक्कत और संयुक्त सत्र बुला कर भी संविधान संशोधन विधेयक पास कराने की तकलीफ को कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया था। दूसरे, खुद को मुख्य विपक्ष बताने वाली कांग्रेस पार्टी अब भी न अपने तौर-तरीकों में बदलाव करती दिख रही है न सोच में। कम्युनिस्ट पार्टियां जरूर इस बार काफी सक्रिय और संतुलित दिख रही हैं।

लोकसभा के कई कार्यकाल के बाद इस बार एक दल के पूर्ण बहुमत की सरकार है और उसे अपने मन के विधायी कामकाज निपटाने के लिए सहयोगी दलों का मुंह नहीं जोहना पड़ता है। पर शुरूमें लगा कि बीमा क्षेत्र को विदेशी निवेश के लिए खोलने, भूमि अधिग्रहण और श्रम कानूनों को बदलने समेत अनेक मुद््दों पर विपक्ष सरकार को घेर सकता है। पर धीरे-धीरे सरकार के ‘फ्लोर मैनेजरों’ ने उसका काम आसान कर दिया और कांग्रेस विरोध-समर्थन की अपनी दुविधा से ही नहीं उबर पाई। वह यही गिनवाना अपनी उपलब्धि मानती है कि सरकार उसी के फैसलों और नीतियों को आगे बढ़ा रही है। यह बात सही हो सकती है, पर मोदी सरकार के काम से आपको कैसे नंबर मिल जाएगा!

इस सत्र में काफी महत्त्वपूर्ण विधेयक पेश होने हैं। और भले ही लोकसभा में सरकार को किसी की मदद नहीं चाहिए, लेकिन राज्यसभा में और संविधान संशोधन विधेयकों पर तो जोड़-तोड़ का सहारा लेना ही होगा। पर वह सब छोटा मसला है राजनीति के हिसाब से। इसमें विधेयक के महत्त्व से भी ज्यादा राजनीतिक महत्त्व के नतीजे निकलेंगे, गोलबंदियां होंगी। और भले ही इस सरकार के सर्वाधिक सक्रिय मंत्री अरुण जेटली इसे सरकारी पक्ष की परीक्षा वाला सत्र बताएं लेकिन असल परीक्षा तो विपक्ष की होगी, जिसेसरकार को घेरने और संसद में पेश विधेयकों में अपनी इच्छा के मुताबिक बदलाव कराने के साथ भाजपा-विरोधी राजनीति को ठोस रूप देना है।

इसलिए हैरानी की बात नहीं कि विपक्ष इस सत्र में पेश होने वाले विधेयकों और उनके आर्थिक-राजनीतिक पहलुओं पर चर्चा करने (वैसे यह काम सरकार भी नहीं कर रही है) की जगह सरकार से वायदा निभाओ की मांग को ही प्रमुख रणनीति के तौर पर रख रहा है और महंगाई खत्म करने और रोजगार देने जैसे वायदों की जगह कालाधन लाने के मसले को आगे करने जा रहा है। इसी चीज को ध्यान में रख कर कांग्रेस ने मोदी सरकार के यू-टर्न वाली पुस्तिका छापी और चुनावी वायदों से एकदम पलट जाने वाली घोषणाएं गिनवा कर उसे घेरना चाहा। पिछला आम चुनाव अगर मोदी की जबर्दस्त जीत और राजनीति की कई प्रवृत्तियों- जैसे गठबंधन की राजनीति, क्षेत्रीय दलों का जोर बढ़ना वगैरह- के बदलने के चलते तो ऐतिहासिक बना ही, चुनाव-खर्च और चुनावी वायदों के लिहाज से भी वह अपूर्व था।

इतने और ऐसे वायदों को पूरा करना असंभव है। लेकिन जब उसी के नाम पर आपको जनादेश हासिल हुआ हो तो आपको घेरना आसान है। और सरकार को भी सत्र से पहले हुई सर्वदलीय बैठक में विपक्ष के मूड का अंदाजा हो गया जब तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने बैठक का बहिष्कार किया। ममता बनर्जी ने तो अगले दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस करके केंद्र को भला-बुरा कहने के साथ सभी गैर-भाजपा दलों को एकजुट करने का संकेत भी दिया।
असल में इस सत्र में तृणमूल और वाम दलों की एकता या परस्पर सहयोग की स्थिति बनी हो यह कहना सही नहीं है, लेकिन कई सवालों पर दोनों साथ दिखे और सरकार पर साझा हमला किया। पर इससे भी ज्यादा मेल-मिलाप लालू-मुलायम-नीतीश के लोगों में दिखा। अब अगर पुराने जनता दल परिवार के लोग एकजुटता बढ़ाते हैं तो इसमें हैरान होने की कोई बात नहीं है।

यह भी संभव है कि इसी सत्र के दौरान पुरानी समाजवादी पार्टी की पृष्ठभूमि वाले अधिकतर लोग एक दल बना लें। अपने प्रदेश या इलाके में जनता दल या समाजवादी पार्टी की ताकत को काफी कुछ पारिवारिक सत्ता का उपकरण बना लेने वाले ऐसे सारे नेता नरेंद्र मोदी के उभरने से ही सही, चेत गए हैं। आम चुनावों में पिटने के बाद जब इन्होंने बिहार में गठबंधन बना कर उपचुनाव लड़ा तो काफी हद तक मोदी लहर को रोकने में सफल हुए। इस मुहिम से ममता बनर्जी और मायावती वगैरह ने अभी तक दूरी ही बना रखी थी, पर उन्हें भी बिहार के प्रयोग से और उससे भी ज्यादा मोदी के डर से एकजुटता बनाने की प्रेरणा मिल रही है।

इस सत्र में पेश होने वाले बीमा संशोधन विधेयक, श्रम सुधार के बचे-खुचे हिस्से और भूमि अधिग्रहण विधेयक जैसे अनेक मामलों में इनकी वैचारिक एकता है। ये भाजपा की नीतियों से सहमत नहीं हैं। सो उसके विधेयकों को रोकने की साझा रणनीति से इनके बीच एकता या गठबंधन बनाने की कहां तक शुरुआत होगी, इस पर काफी सारे लोगों की नजर रहेगी। अब यह भी है कि इनके अपने विरोधाभास इतने हैं कि एकता बन कर कुछ कदम भी चले तब भी काफी लोग खुश होंगे।

पर विपक्ष की असली एकता कांग्रेस के सहयोग या सक्रियता के बिना संभव नहीं लगती। अगर कथित जनता दल परिवार के नेता एक दूसरे का हाथ थाम कर खड़े हो जाएं, संसद में उनके दसेक सदस्य समान रुख अपनाने और उसी के हिसाब से मतदान करने को तैयार हो जाएं तो भी विधेयकों और सरकार या भाजपा की सेहत पर खास फर्क नहीं पड़ेगा। और फिर राजनीतिक लड़ाई का भी सवाल हो तो किसी और दल की तुलना में कांग्रेस को ही अधिक लड़ना होगा। इस बार तो कांग्रेसी मल्लिकार्जुन खडगे को विपक्ष के नेता वाला स्थान मिल गया है। और सब कुछ होते-होते भी राज्यसभा में कांग्रेस के ही पास सबसे बड़ा जत्था है। पर कांग्रेस की मुश्किल यह है कि वह भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी भले हो, नीतियों के मामले में भाजपा और कांग्रेस के बीच फासला लगभग मिट चुका है।

भाजपा सरकार यूपीए-2 की नीतियों को ही ज्यादा जोर-शोर से लागू कर रही है और कांग्रेसी बार-बार इस बात का दावा भी करते हैं। इस सत्र में पेश होने वाले अधिकतर विधेयकों पर भी कांग्रेस की राय भाजपा से बहुत अलग नहीं है।

बीमा विधेयक में सरकार ने हल्के संशोधन से कांग्रेस को पटा लिया और इसके विरोध में विपक्षी एकजुटता नहीं होने दी। जीएसटी जैसे बड़े मसलों पर कांग्रेस को रंज है भी, तो इस बात का ही अधिक है कि यूपीए शासन के समय भाजपाई मुख्यमंत्रियों ने इसके रास्ते में बाधा डाली थी।

लिहाजा, जब तक कांग्रेस आर्थिक नीतियों के मामले में अपनी लीक नहीं छोड़ती और उनसे दूरी नहीं बनाती, वह विपक्ष की ढंग से अगुआई नहीं कर पाएगी और कम से कम भाजपा सरकार की राह को मुश्किल करने लायक शक्ति तो नहीं ही बना पाएगी। यह काम आसान नहीं है, भले ही भूमि अधिग्रहण से लेकर काफी मसलों पर कांग्रेस अलग लाइन लेने लगी थी और उसकी दुविधा इतनी हो गई थी कि उदारीकरण के पक्षधर उसे नीतिगत पक्षाघात (पॉलिसी पैरालिसिस) कहने लगे थे। लगता है वह अब भी इस दुविधा में है।

इस सत्र में पेश होने को तैयार सैंतीस विधेयकों और पिछले सत्र से लटके पड़े उन्नीस विधेयकों में अधिकतर ऐसे हैं जिनके महत्त्वपूर्ण प्रावधानों पर कांग्रेस दुविधा में या विरोध में है। अब वह अपनी दुविधा को छोड़ कर सभी विपक्षी दलों की अगुआई करना कबूल करती है या नहीं, यही इस सत्र में देखने की सबसे बड़ी चीज होगी। पर सरकार जिस स्थिति और मूड में है उसमें विपक्ष के लिए ही नहीं, देश के लिए भी सावधान रहने की जरूरत है। यह रफ्तार क्या होगी इसकी एक झलक सरकार पिछले सत्र में दिखा चुकी है।

बिना किसी पूर्व चर्चा के अचानक सरकार ने मंत्रिमंडल की बैठक में श्रम सुधारों को मंजूरी दे दी और पुराने श्रम कानूनों में बदलाव का प्रस्ताव पास किया। जल्दी ही संसद में नया विधेयक पेश कर दिया गया। विधेयक की प्रति भी सभी सांसदों को नहीं मिल पाई थी। और लगभग बिना चर्चा के फैक्टरी अधिनियम 1948, श्रम कानून 1988 (कुछ मामलों में विवरण देने और रजिस्टर रखने से छूट), और अपरेंटिसशिप कानून, 1961 में कुल चौवन संशोधन कर डाले गए। इन संशोधनों से संबंधित नोटिस जून में ही अर्थात सरकार के कामकाज संभालने के एक हफ्ते के अंदर ही जारी कर दिए गए थे। यह काम गुपचुप ढंग से हुआ और कहीं इन बदलावों पर चर्चा नहीं हुई। दिन-रात मजदूरों के संपर्क में रहने वाले ट्रेड यूनियन नेताओं तक को इनका पता न था।

इतना ही नहीं, वाहन उद्योग को भी आवश्यक सेवा के दायरे में लाने, 1926 के ट्रेड यूनियन कानून और 1947 के औद्योगिक विवाद कानून में बदलाव की तैयारियां भी अंतिम चरण में हैं। बालश्रम निषेध कानून में भी बदलाव की तैयारी है, जबकि शिक्षा का अधिकार कानून बन जाने के बाद से यह बेमानी हो जाना चाहिए था। जब चौदह साल तक के हर बच्चे को स्कूल जाने का हक है तब आप बालश्रम को कैसे कानूनी रूप दे सकते हैं। या तो एक कानून झूठा होगा या दूसरा। जाहिर है सरकार को भी और तैयारी की जरूरत है। जीएसटी कानून, भूमि अधिग्रहण विधेयक, कोयला खनन विधेयक (जो वर्तमान अध्यादेश की जगह लेगा), बीमा विधेयक वगैरह आने हैं। सो मुख्य परीक्षा विपक्ष की भले हो, इम्तहान तो पूरी राजनीतिक बिरादरी का होना है।

 

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