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वैज्ञानिक सोच के विरुद्ध

अजेय कुमार नस्लवादी घृणा और आर्य श्रेष्ठता के सिद्धांत को छात्रों और युवाओं तक पहुंचाने के लिए नाजियों ने जिस तरह जर्मनी में पूरे शैक्षिक पाठ्यक्रम को बदल डाला था, भाजपा और खासकर आरएसएस ने विद्यार्थियों के कोमल मन-मस्तिष्क को अपने सांप्रदायिक और सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी नजरिए से ढालने के लिए पाठ्यक्रमों में मूलभूत परिवर्तन करने की […]

Author December 12, 2014 1:46 PM

अजेय कुमार

नस्लवादी घृणा और आर्य श्रेष्ठता के सिद्धांत को छात्रों और युवाओं तक पहुंचाने के लिए नाजियों ने जिस तरह जर्मनी में पूरे शैक्षिक पाठ्यक्रम को बदल डाला था, भाजपा और खासकर आरएसएस ने विद्यार्थियों के कोमल मन-मस्तिष्क को अपने सांप्रदायिक और सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी नजरिए से ढालने के लिए पाठ्यक्रमों में मूलभूत परिवर्तन करने की योजना बनाई है।

आरएसएस से संबंधित ‘शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष दीनानाथ बतरा और उनके सहयोगी इस सिलसिले में मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी से सात बार मिल चुके हैं। उन्हें दिए गए एक ज्ञापन में पाठ्यपुस्तकों में आम प्रयोग में लाए जा रहे उर्दू शब्दों के स्थान पर संस्कृत शब्दों का इस्तेमाल करने की वकालत की है। उनके अनुसार, मुश्किल, दोस्त, गुस्सा, शरारत, खबरदार, गायब, साल, मोहल्ला, मौका, अक्सर आदि शब्द ‘हमारी’ वर्णमाला को दूषित कर रहे हैं। ऐसे अनेक शब्दों पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते हुए बतराजी ने इन्हें संस्कृत के ऐसे शब्दों से बदलने की पैरवी की है, जिन्हें भले कोई छात्र न समझ सके।

लगभग पच्चीस वर्ष पहले भोपाल में एक लेखक सम्मेलन के उद्घाटन भाषण में मशहूर अभिनेता उत्पल दत्त ने एक मजेदार लेकिन बहुत महत्त्वपूर्ण बात कही थी। उनका कहना था, ‘‘दूरदर्शन में जब यह कहा जाता है कि अब आप हिंदी में समाचार सुनिए, तो वास्तव में उन्हें कहना चाहिए कि अब आप समाचारों में हिंदी सुनिए। ‘जरूरत’ शब्द सारे भारतीयों को समझ में आता है, पर दूरदर्शन के समाचार में उसके स्थान पर ‘आवश्यकता’ कहा जाता है।’’
रोजमर्रा के जीवन में घर, बाजार, दफ्तर, कहीं भी उर्दू शब्दों के बिना काम नहीं चलता। ऐसा लगता है अगर कोई महिला कहे कि ‘मैं शर्म से पानी-पानी हो गई’ तो बतराजी उसे ‘मैं जल-जल हो गई’ कहने की सलाह देंगे। बतराजी से पूछा जाना चाहिए कि वे फिल्मी गीतों को किस तरह बदलेंगे। ‘मेरे महबूब कयामत होगी, आज रुसवा तेरी गलियों में मुहब्बत होगी’ का संस्कृत में अनुवाद बतराजी कैसे करेंगे। उनका मुसलिम-विरोध उर्दू-विरोध में ढल कर हमारी गंगा-जमुनी तहजीब पर हमला बोल रहा है।

इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि ब्राह्मणवादी मूल्यों को पुनर्स्थापित करने, वैज्ञानिक सोच को निरुत्साहित करने और मध्यकालीन परंपराओं को प्रोत्साहित करने के उद््देश्य से पिछली राजग सरकार ने समाज-विज्ञान और इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में जो परिवर्तन किए थे, उन्हें फिर से लागू किया जा रहा है। उनकी कोशिश है कि पाठ्यपुस्तकों में वही विभाजनकारी इतिहास पढ़ाया जाए, जो आरएसएस की शाखाओं में पढ़ाया जाता है, जिसमें राजाओं के हर कार्य को धर्म के चश्मे से देखा जाता है।

पिछली राजग सरकार ने 2001 में एनसीइआरटी के सलाहकार के रूप में दीनानाथ बतरा को नियुक्त किया था, जिन्होंने पाठ्य-पुस्तकों से वे तमाम सच हटा दिए थे, जो आरएसएस दुनिया से छिपाना चाहता है- प्राचीन हिंदू समाज की दमनकारी जातिप्रथा, छुआछूत, वैदिक युग में हिंदुओं द्वारा गोमांस का सेवन, आदि। जिस भी इतिहासकार ने इसका विरोध किया, वे चाहे डीएन झा हों या रोमिला थापर, सबको आरएसएस की भर्त्सना का शिकार होना पड़ा।

गुजरात में बयालीस हजार स्कूलों में दीनानाथ बतरा की पुस्तकें पढ़ाई जा रही हैं। उनकी एक पुस्तक ‘तेजोमय भारत’ के कुछ अंशों से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि वे किस तरह की शिक्षा देने पर उतारू हैं:

अमेरिका स्टेम सेल अनुसंधान के आविष्कार का श्रेय लेना चाहता है, पर सच यह है कि भारत के डॉ बालकृष्ण गणपत मातापुरकर को पहले ही शरीर के अंगों का फिर से निर्माण करने का पेटेंट मिल चुका है… तुम्हें यह जान कर आश्चर्य होगा कि यह अनुसंधान नया नहीं है और डॉ मातापुरकर को इसकी प्रेरणा महाभारत से मिली थी। कुंती का सूर्य के समान तेजस्वी एक पुत्र था।

जब गांधारी, जो दो वर्षों बाद गर्भधारण कर सकी थीं, का गर्भपात हो गया उनके गर्भ से मांस का एक बड़ा लोथड़ा बाहर आया। ऋषि द्वैपायन व्यास को बुलवाया गया। उन्होंने मांस के इस बड़े लोथड़े का ध्यानपूर्वक अवलोकन किया। उसके बाद उन्होंने उसे कुछ विशिष्ट दवाओं के साथ एक ठंडी टंकी में सुरक्षित रख दिया। कुछ समय पश्चात इस लोथड़े को सौ भागों में विभाजित किया और हर भाग को घी से भरी सौ टंकियों में दो साल के लिए रख दिया। दो साल बाद इन टंकियों से सौ कौरव निकले। यह पढ़ने के बाद डॉ मातापुरकर को यह समझ में आया कि स्टेम सेल उनका आविष्कार नहीं है। भारत में यह हजारों वर्ष पूर्व था (पृष्ठ 92-93)।

भारतीय ऋषि अपनी योग विद्या से दिव्य दृष्टि हासिल कर लेते थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि टेलीविजन का आविष्कार इसी दिव्य दृष्टि से हुआ… महाभारत में संजय हस्तिनापुर के एक महल में बैठ कर दिव्य शक्ति के जरिए महाभारत के युद्ध का दृष्टिहीन धृतराष्ट्र के लिए ‘लाईव टेलीकास्ट’ किया करते थे। (पृष्ठ 64)

हम जिसे आज मोटरकार कहते हैं वह वैदिक युग में अस्तित्व में थी। उसे ‘अनश्व रथ’ कहा जाता था। सामान्यत: रथ को घोड़े खींचते थे, परंतु अनश्व रथ का अर्थ था ऐसा रथ, जो बिना घोड़ों के चलता था। इसे ‘यंत्र रथ’ भी कहा जाता था। इसी यंत्र रथ को अब हम मोटरकार कहते हैं। (पृष्ठ 60)
इन तमाम बातों को दीनीनाथ बतरा विश्व-सभ्यता के लिए भारत का योगदान मानते हैं और उनका दृढ़ विचार है कि सभी विषयों की पुस्तकों में पहला अध्याय ऐसे योगदानों पर केंद्रित होना चाहिए। लेकिन ऐसे योगदानों का अगर विश्व-मंचों पर जिक्र किया जाएगा तो पूरी दुनिया हम पर हंसेगी। ऐसा नहीं कि प्राचीन भारत का विश्व-सभ्यता में कोई योगदान नहीं है। अगर वैज्ञानिक ढंग से इस पर विचार किया जाए तो कई ग्रंथ लिखे जा सकते हैं।
चिकित्सा विज्ञान के हमारे ऋषि सुश्रुत ने कई बीमारियों और शारीरिक अपंगताओं को दूर करने के लिए सर्जरी की वकालत की थी।

हमारे दो विख्यात खगोलशास्त्री ब्रहमिहिर और ब्रह्मगुप्त हुए हैं, जिन्होंने चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण के कारणों का पता लगाया। पर आरएसएस इनके योगदान का जिक्र तक नहीं करना चाहता, क्योंकि इन्होंने वैज्ञानिक दर्शन को अपनी खोज का आधार बनाया और इस प्रक्रिया में वे उन दिनों प्रचलित ब्राह्मणवादी मूल्यों और कानूनों के विरुद्ध खड़े हुए। चार्वाक का नाम तक लेना नहीं चाहता आरएसएस। हां, मनुस्मृति के संदर्भ देने में उसे कोई संकोच नहीं। यह पूरी तरह संभव है कि कल को पाठ्य-पुस्तकों में ऐसा एक अध्याय अनिवार्य कर दिया जाए, जिसका शीर्षक हो ‘मनुस्मृति का विश्व सभ्यता में योगदान’।

बच्चों को कैसी शिक्षा देनी चाहिए, दीनानाथ बतरा को इसमें कोई संशय नहीं। उनका मानना है, ‘हमें एक ऐसी युवा पीढ़ी विकसित करनी होगी, जो हिंदुत्व तथा राष्ट्रवाद के प्रति प्रतिबद्ध हो।’ इसके लिए वे चाहते हैं कि एनसीइआरटी की पाठ्यपुस्तकों से एमएफ हुसेन के सभी संदर्भ हटा दिए जाएं, क्योंकि उन्होंने, ‘भारत माता को निर्वस्त्र चित्रित किया है’। पंजाब के मशहूर कवि पाश को भी इन पुस्तकों में कोई स्थान नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि वे ‘वर्ग-संघर्ष, छुआछूत और सामाजिक असमानता’ की बात करते हैं।

इन तर्कों से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि आगामी
समय में स्कूली पाठ्यपुस्तकों

से किन-किन लेखकों-दार्शनिकों, इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों को निकाल बाहर किया जाएगा और किन्हें शामिल किया जाएगा। संभव है कि नेहरू, गांधी, भगतसिंह आदि भी हटा दिए जाएं और इनके स्थान पर बच्चों को सावरकर के योगदान के बारे में पढ़ने को मिले।

मगर यहां भी इस सच को छिपा दिया जाएगा कि ‘वीर’ सावरकर किस तरह यह माफीनामा लिख कर कि वे ‘अंगरेज सरकार के पक्के भक्त’ बने रहेंगे, जेल से बाहर आए थे। बच्चों को यह भी नहीं बताया जाएगा कि सावरकर पर गांधीजी की हत्या का षड्यंत्र रचने का इल्जाम था। तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने गांधीजी की हत्या के बारे में लिखा था, ‘हिंदू महासभा, जो वीर सावरकर के पूरे नियंत्रण में थी, के वित्तीय विभाग ने इस षड्यंत्र को रचा और सफलतापूर्वक अंजाम दिया।’

मध्यप्रदेश में प्राय: हर स्कूल में आरएसएस की पत्रिका ‘देवपुत्र’ उपलब्ध है, जिसमें गोलवलकर के विचारों को प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता है। वह दिन दूर नहीं, जब ये विचार स्कूली पाठ्यपुस्तकों में भी पढ़ने को मिलेंगे। ये विचार भारत की एकता और अखंडता के लिए कितने घातक हैं, इसका अंदाजा गोलवलकर द्वारा दी गई ‘हिंदू राष्ट्र’ की परिभाषा से लगाया जा सकता है। यह परिभाषा इस प्रकार है- ‘विदेशी नस्लों (सभी गैर-हिंदू) को या तो हिंदू संस्कृति और भाषा को अपनाना होगा, हिंदू धर्म का सम्मान करना और उसे पूजनीय समझना होगा, हिंदू नस्ल और हिंदू राष्ट्र की संस्कृति के महिमामंडन के सिवा किसी अन्य विचार के बारे में नहीं सोचना होगा और अपने अलग अस्तित्व को त्याग कर हिंदू नस्ल में समा जाना होगा या वे फिर देश में हिंदू राष्ट्र के अधीन बिना कोई हक मांगे, बिना किसी प्रतिष्ठा के, बिना किसी विशेष सुविधा की उम्मीद किए- नागरिक अधिकारों की भी नहीं- रहें।’
मध्यप्रदेश सरकार ने एक परिपत्र (सर्कुलर) जारी करके भगवदगीता को स्कूलों और मदरसों में पढ़ाने के लिए कहा था, जिसे शायद बाद में ‘अनिवार्य’ की श्रेणी से बाहर कर दिया गया था। लगभग दो दशक पहले पाकिस्तान में विज्ञान की पुस्तकों में भी कुरान की आयतें पढ़ाई जाने लगी थीं जिन्हें बेनजीर भुट्टो ने अपने शासनकाल में हटवा दिया। मुसलिम कट्टरपंथियों को उनका यह कदम नागवार गुजरा था और वे अपनी हत्या तक उनकी आंखों में खटकती रही थीं।

इधर हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिंदू कट्टरपंथियों से लड़ना तो दूर, उनके हर कदम का समर्थन करते हैं या उस पर चुप्पी साधे रहते हैं। दीनानाथ बतरा को उनका वरदहस्त प्राप्त है। मोदी ने न केवल बतरा की अधिकतर पुस्तकों की भूमिका लिखी है, बल्कि मुंबई में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उनके विचारों से अपनी सहमति जता चुके हैं। मोदी ने कहा, ‘हम गर्व कर सकते हैं कि एक जमाने में हमारे देश के चिकित्सा विज्ञान ने क्या-क्या उपलब्धियां हासिल कीं। हम महाभारत में कर्ण के बारे में पढ़ते हैं- महाभारत के अनुसार कर्ण अपनी मां के पेट से नहीं जनमा था। इसका अर्थ यह हुआ कि उस वक्त जेनेटिक साइंस मौजूद थी।’ इससे आगे वे कहते हैं, ‘हम गणेशजी की पूजा करते हैं। उस समय जरूर कोई प्लास्टिक सर्जन रहा होगा, जिसने एक मानव शरीर पर हाथी का सिर लगा दिया और इस तरह प्लास्टिक सर्जरी की शुरुआत हुई होगी।’

पिछले दिनों ‘द हिंदू’ में अपने एक लेख में विख्यात प्रत्रकार करण थापर ने प्रधानमंत्री के इन विचारों पर अफसोस प्रकट किया। यह दुखद है कि देश में ऐसे निर्भीक पत्रकारों की संख्या नगण्य है।

 

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