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राजनीतिः मौसम के बिगड़ते मिजाज के मायने

वायुमंडल में हानिकारक गैसों का जमावड़ा बढ़ते जाने और इन गैसों की एक परत बन जाने की वजह से पृथ्वी के तापमान का संतुलन निरंतर बिगड़ रहा है। समय रहते वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर अंकुश न लगाया गया तो आने वाले वर्षों में इसके बहुत विनाशकारी परिणाम सामने आएंगे।

Author May 30, 2018 4:30 AM
मानव-निर्मित ग्रीन हाउस गैसों में ‘क्लोरो फ्लोरो कार्बन’ परिवार की गैसें शामिल हैं, जो औद्योगिक इकाइयों में बड़ी मात्रा में उपयोग की जाती हैं।

योगेश कुमार गोयल

हालांकि मौसम विभाग ने पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि इस साल देश के कई इलाकों में औसत तापमान पिछले वर्षों के मुकाबले डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा रहेगा, पर तापमान में औसत से चार-पांच डिग्री तक की वृद्धि दर्ज की जा रही है। न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर तापमान में साल-दर-साल हो रही बढ़ोतरी तथा मौसम का निरंतर बिगड़ता मिजाज अब गहन चिंता का विषय बनता जा रहा है। गरमी में जहां पारा 48-49 डिग्री तक जा पहुंचता है तो सर्दियों में यह अपेक्षया गर्म इलाकों में भी लोगों को बुरी तरह कंपकंपा जाता है, वहीं बरसात में कहीं इस कदर बारिश होती है कि लोग बाढ़ की विभीषिका झेलने को विवश हो जाएं तो कहीं लोग वर्षा ऋतु में भी एक-एक बूंद पानी को तरसते दिखाई पड़ते हैं और अकाल की नौबत आ जाती है।

इस साल जहां सर्दियों में बहुत कम ठंड पड़ी, वहीं अगर याद करें तो कुछ वर्ष पूर्व जनवरी माह के शुरू में उत्तर भारत में मौसम ने ऐसा सितम ढाया था कि हर कोई हतप्रभ था। तब दिल्ली में जहां पारे ने 0.2 डिग्री पर पहुंच कर सत्तर साल का रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिया था, वहीं कश्मीर की डल झील इस कदर जम गई थी कि लोगों ने उस पर जमकर क्रिकेट खेला। कुछ अन्य हिस्सों में पारा शून्य डिग्री से भी नीचे पहुंच गया था तो ठंडी जगह माने जाने वाले शिमला में उसी दौरान तापमान अपेक्षया बहुत ज्यादा, छह डिग्री दर्ज किया गया था। एक ओर जहां एकाएक बढ़ी ठंड ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर जान-माल को काफी नुकसान पहुंचाया था, वहीं जनवरी के दूसरे पखवाड़े में मौसम अपेक्षया काफी गर्म रहा था।

अमेरिका में कैटरीना और रीटा नामक तूफानों के चलते हुई भयानक तबाही, भारतीय उपमहाद्वीप में कुछ साल पहले आया विनाशकारी भूकम्प और अब देश के अधिकतर राज्यों में कई दिनों तक चला तूफानी तांडव, ये प्रकृति का प्रकोप ही तो हैं। अंटार्कटिका में पिघलती बर्फ और वहां उगती घास ने हर किसी को हैरत में डाल दिया है। लेकिन यह सब हमारे दुष्कृत्यों का ही नतीजा है, पर्यावरण संतुलन को हमने बुरी तरह बिगाड़ दिया है। भू-जल भी अब दूषित होने लगा है और बढ़ते प्रदूषण के चलते जहरीली गैसें ‘एसिड’ की बरसात करने लगी हैं।

पृथ्वी का निरंतर बढ़ता तापमान और जलवायु में लगातार हो रहे भारी बदलाव समूचे विश्व में मानव जीवन के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं। मौसम का बिगड़ता मिजाज मानव जाति, जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों के लिए तो बेहद खतरनाक है ही, पर्यावरण संतुलन के लिए भी एक गंभीर खतरा है। प्रकृति बार-बार अपने प्रकोप, अपनी प्रचंडता के जरिए हमें सावधान करने की भरसक कोशिश भी करती रही है, पर हम इन भयावह खतरों की निरंतर अनदेखी करते रहे हैं। अब भले प्रतिवर्ष मौसम की मार को देखते हुए अधिकतर देश इस तथ्य को स्वीकार रहे हैं कि पृथ्वी लगातार गर्म हो रही है, पर कुछ देश अपने औद्योगिक स्वार्थों के चलते यह मानने को तैयार ही नहीं हैं। क्योटो प्रोटोकॉल के तहत क्लोरो फ्लोरो कार्बन के उत्सर्जन में कमी लाने के प्रस्ताव का जहां अधिकतर देश समर्थन कर रहे हैं, वहीं अमेरिका कुछ शोधों के जरिये यह साबित करने में जुटा रहा है कि ग्लोबल वार्मिंग तो एक छद्म खतरा भर है।

पर्यावरणविदों के अनुसार विगत दस हजार वर्षों में भी पृथ्वी पर जलवायु में इतना बदलाव और तापमान में इतनी बढ़ोतरी नहीं देखी गई, जितनी हाल के वर्षों में देखी गई है। मौसम के इस बदलते मिजाज के लिए औद्योगीकरण, बढ़ती आबादी, घटते वनक्षेत्र, प्रचंड रफ्तार से बढ़ती वाहनों की तादाद तथा तेजी से बदलती जीवनशैली को विशेष रूप से जिम्मेदार माना जा सकता है। ग्लोबल वार्मिंग की विकराल होती समस्या के लिए औद्योगिक इकाइयों और वाहनों से निकलने वाली हानिकारक गैसें, कार्बन डाइआक्साइड, कार्बन मोनोआक्साइड, नाइट्रोजन डाइआक्साइड, मीथेन आदि प्रमुख रूप से जिम्मेवार हैं, जिनका वायुमंडल में उत्सर्जन औद्योगिक क्रांति के बाद से काफी तेजी से बढ़ा है।

पृथ्वी तथा इसके आसपास के वायुमंडल का तापमान सूर्य की किरणों के प्रभाव अथवा तेज से बढ़ता है और सूर्य की किरणें पृथ्वी तक पहुंचने के बाद इनकी अतिरिक्त गर्मी वायुमंडल में मौजूद धूल के कणों और बादलों से परावर्तित होकर वापस अंतरिक्ष में लौट जाती हैं। इस प्रकार पृथ्वी के तापमान का संतुलन बरकरार रहता है, लेकिन कुछ वर्षों से वायुमंडल में हानिकारक गैसों का जमावड़ा बढ़ते जाने और इन गैसों की वायुमंडल में एक परत बन जाने की वजह से पृथ्वी के तापमान का संतुलन निरंतर बिगड़ रहा है। दरअसल, हानिकारक गैसों की इस परत को पार करके सूर्य की किरणें पृथ्वी तक तो आसानी से पहुंच जाती हैं लेकिन यह परत उन किरणों के वापस लौटने में बाधक बनती है और यही पृथ्वी का तापमान बढ़ते जाने का मुख्य कारण है।

जिस प्रकार वनस्पतियों के लिए (पौधों के शीघ्र विकास के लिए) बनाया जाने वाला ‘ग्रीन हाउस’ (शीशे का घर) सूर्य की ऊर्जा को इस ग्रीन हाउस के अंदर तो आने देता है लेकिन ऊष्मा को बाहर नहीं निकलने देता और परिणामत: ग्रीन हाउस के भीतर का तापमान काफी बढ़ जाता है, ठीक उसी प्रकार वायुमंडल में विभिन्न जहरीली गैसों की एक परत बन जाने से वह परत भी इस ग्रीन हाउस की भांति सूर्य की गर्मी को परत को पार करके पृथ्वी तक जाने तो देती है लेकिन वापस नहीं लौटने देती। इस प्रक्रिया को ‘ग्रीन हाउस इफेक्ट’ कहा जाता है और हानिकारक गैसों की इस परत को ‘ग्रीन हाउस लेयर’ तथा इस परत के निर्माण में सक्रिय गैसों को ‘ग्रीन हाउस गैस’ कहा जाता है।

मानव-निर्मित ग्रीन हाउस गैसों में ‘क्लोरो फ्लोरो कार्बन’ परिवार की गैसें शामिल हैं, जो औद्योगिक इकाइयों में बड़ी मात्रा में उपयोग की जाती हैं। इन गैसों में कोयले, पेट्रोल, डीजल, तेल, जीवाश्म र्इंधन आदि से उत्पन्न होने वाली कार्बन डाइआक्साइड गैस सर्वाधिक खतरनाक ‘ग्रीन हाउस गैस’ मानी जाती है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, 1960 के बाद से वायुमंडल में इस गैस की मात्रा में पच्चीस फीसद का इजाफा हुआ है। वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा बढ़ते जाने के साथ-साथ ज्यों-ज्यों वायुमंडल में ग्रीन हाउस लेयर की मोटाई बढ़ती जा रही है, पृथ्वी का तापमान भी उसी के अनुरूप लगातार बढ़ रहा है और इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि पिछली सदी के दौरान वर्ष-दर-वर्ष पृथ्वी का तापमान बढ़ता रहा और उसका अंतिम दशक तो विगत हजार से भी अधिक वर्षों के मुकाबले बहुत ज्यादा गर्म रहा।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, पृथ्वी के इतिहास में कोई भी जलवायु परिवर्तन इतनी तीव्र गति से नहीं हुआ। पर्यावरण विशेषज्ञों की मानें तो अगर अगले पचास वर्षों तक पर्यावरण प्रदूषण और पृथ्वी के तापमान में बढ़ोतरी की यही गति जारी रही तो इस सदी के मध्य तक तापमान में तीन से पांच डिग्री सेंटीग्रेड तक की वृद्धि हो सकती है और अगर ऐसा हुआ तो ‘महाप्रलय’ की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार, सन 2050 तक पृथ्वी के वायुमंडल का तापमान 2.8 डिग्री तक बढ़ने की संभावना है। समय रहते वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर अंकुश न लगाया गया तो आने वाले वर्षों में इसके बहुत विनाशकारी परिणाम सामने आएंगे। इन आशंकाओं के मद्देनजर आज हम सबका कर्तव्य है कि पर्यावरण सुधार की मुहिम में अपने-अपने स्तर पर जरूर शामिल हों।

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