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अर्थव्यवस्था को टीके की आस

पाबंदियों के कारण असंगठित क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) के ताजा आंकड़ों के अनुसार भारत की 90.7 फीसद श्रमशक्ति असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है, लिहाजा इस क्षेत्र के प्रभावित होने से बड़ी संख्या में लोगों के बेरोजगार होने का खतरा पैदा हो गया है।

एक कोविड अस्पताल की तस्वीर। क्रेडिट- पीटीआई

सरोज कुमार मिश्र

महामारी की पहली लहर से बेपटरी हुई अर्थव्यवस्था अभी पटरी पर लौटना शुरू भी नहीं हुई थी कि दूसरी लहर कहर बरपाने लगी। इस बार की लहर कहीं ज्यादा व्यापक और तीव्र है। दैनिक संक्रमण के मामले साढ़े तीन लाख के पार निकल गए हैं और मरने वालों का रोजाना का आंकड़ा भी तीन हजार के करीब पहुंच चुका है। ऐसे में संक्रमण से निपटने के लिए सरकारों को फिलहाल पूर्णबंदी जैसे ही कड़े प्रतिबंधों के अलावा कोई चारा नजर आ भी नहीं रहा। इसलिए ज्यादातर राज्यों ने फिर से कड़े प्रतिबंध और आंशिक पूर्णबंदी जैसे उपायों का सहारा लेना शुरू कर दिया है।

कहने को फिलहाल कारोबार और औद्योगिक गतिविधियों को इस सख्ती से अलग रखा गया है। लेकिन जब व्यापकस्तर पर लोगों की आवाजाही पर ही रोक लग जाएगी तो आर्थिकी इससे कैसे अछूती रह सकती है! भले इस बार आर्थिक गतिविधियां बनाए रखने की भरसक कोशिशों के दावे हो रहे हों, पर सख्त पाबंदियों के कारण अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्र खासतौर से अनौपचारिक क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। अर्थव्यवस्था पर क्या और कितना असर होना है, इसका अंदाजा लगाने के लिए हमारे पास अनुभव और आंकड़े उपलब्ध हैं।

दो महीने से ज्यादा की पूर्णबंदी के कारण वित्त वर्ष 2020-21 में भारत की अर्थव्यवस्था रसातल में चली गई थी। तब पहली तिमाही में विकास दर शून्य से 24.4 फीसद और दूसरी तिमाही में शून्य से 7.50 फीसद नीचे दर्ज की गई थी। धीरे-धीरे आर्थिक गतिविधियां बहाल होने के बाद तीसरी तिमाही में विकास दर शून्य से ऊपर (0.5 फीसद) आई और चौथी तिमाही में इसके और ऊपर उठने का अनुमान है। इसके आंकड़े अभी आने हैं। महामारी की दूसरी लहर को काबू करने के लिए राष्ट्रव्यापी पूर्णबंदी तो लागू नहीं है, लेकिन अलग-अलग राज्यों में लागू सख्त पाबंदियों और संक्रमण के भय के कारण जो माहौल बन गया है, उससे आर्थिक गतिविधियों के दरवाजे फिर बंद होने लगे हैं।

उड्डयन, आॅटोमोबाइल, पर्यटन, मॉल, स्पा, होटल, रेहड़ी-पटरी जैसे छोटे-बड़े क्षेत्रों के कारोबार एक बार फिर से ठप होने के कगार पर हैं। घरेलू हवाई यात्रियों की संख्या में लगातार गिरावट हो रही है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 20 अप्रैल को 155,207 यात्रियों ने घरेलू उड़ानों में यात्रा की। इसके पहले 19 अप्रैल को यह आंकड़ा 169,971 यात्रियों का था और 17 अप्रैल को घरेलू हवाई यात्रियों की संख्या 182,189 थी। जबकि फरवरी के अंत में घरेलू हवाई यात्रियों की एक दिन की संख्या 313,000 थी, जो पिछले मई में उड़ानों की बहाली के बाद यात्रियों की सर्वाधिक संख्या थी।

महामारी की दूसरी लहर का वाहन उद्योग पर बुरा असर पड़ा है। कई कारखानों में उत्पादन एक बार फिर ठहर-सा गया है। देश में बनने वाले कुल वाहनों का एक-चौथाई हिस्सा अकेले महाराष्ट्र में बनता है, लेकिन वहां इन दिनों सख्त पाबंदियां लगी हैं और कारखाने सामान्य दिनों की तुलना में पचास-साठ फीसद क्षमता के साथ ही संचालित हो रहे हैं। इससे सौ से सवा सौ करोड़ रुपए प्रतिदिन का नुकसान हो रहा है। मरीजों के लिए आॅक्सीजन की भारी मांग के कारण इस्पात संयंत्रों को होने वाली आपूर्ति अस्पतालों की ओर मोड़ दी गई है। इस कारण इस्पात कारखानों में भी उत्पादन बंद हो गया है।

पाबंदियों के कारण असंगठित क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) के ताजा आंकड़ों के अनुसार भारत की 90.7 फीसद श्रमशक्ति असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है, लिहाजा इस क्षेत्र के प्रभावित होने से बड़ी संख्या में लोगों के बेरोजगार होने का खतरा पैदा हो गया है। इसी तरह शहरों और महानगरों में खरीदारी के बड़े ठिकानों के भी बुरे दिन लौट आए हैं। देशभर में मॉल कारोबार नब्बे प्रतिशत तक लौट आया था, लेकिन महामारी की दूसरी लहर के कारण अप्रैल में इस क्षेत्र के कारोबार पर फिर से ग्रहण लग गया। हर महीने पंद्रह हजार करोड़ रुपए की कमाई करने वाले इस क्षेत्र की कमाई स्थानीय पाबंदियों के कारण घट कर आधी भी नहीं रह गई है।

आर्थिक अनिश्चितता के कारण उपभोक्ताओं का भरोसा भी डगमगाया है। रिफिनिटिव-इप्सास के मासिक प्राइमरी कंज्यूमर सेंटीमेंट इंडेक्स (पीसीएसआइ) के अनुसार, उपभोक्ताओं के भरोसे में पिछले एक महीने के दौरान 1.1 फीसद की गिरावट आई है। उपभोक्ता भावना में गिरावट से मांग घटती है और मांग घटने से उत्पादन प्रभावित होता है और बेरोजगारी बढ़ती है। गूगल मोबिलिटी डेटा के अनुसार खुदरा और मनोरंजन गतिविधियों में सात अप्रैल तक ही 24 फरवरी की तुलना में पच्चीस फीसद की गिरावट आ चुकी थी। जबकि उस समय राज्यों में पाबंदियां लागू नहीं हुई थीं।

आज महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली सहित कई राज्यों में सख्त पाबंदियां लगी हैं। इस कारण आवश्यक सेवाओं को छोड़ बाकी गतिविधियां बंद हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि अकेले महाराष्ट्र और गुजरात मिल कर देश की जीडीपी में बाईस से पच्चीस फीसद का योगदान करते हैं। इन दोनों राज्यों में आर्थिक गतिविधियों के बाधित होने से देश की अर्थव्यवस्था को होने वाले नुकसान का अंदाजा लगाया जा सकता है।

अर्थव्यवस्था की सेहत मापने का सटीक पैमाना बेरोजगारी दर होता है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) के आंकड़े के अनुसार 23 अप्रैल को देश की बेरोजगारी दर 7.74 फीसद हो गई, जो मार्च में 6.52 फीसद थी। अप्रैल में बेरोजगारी दर में लगातार वृद्धि का रुझान बना हुआ है और महीने के अंत तक यह आठ फीसद से ऊपर जा सकती है। यानी तब हम अगस्त 2020 की स्थिति में पहुंच जाएंगे, जब बेरोजगारी दर 8.35 फीसद थी। उसके बाद के महीनों में दिसंबर (9.06 फीसद) को छोड़ कर यह छह से सात फीसद के बीच बनी रही। यानी हमने अगस्त से मार्च तक आठ महीनों में जो हासिल किया था, वह एक महीने के दौरान हाथ से निकल चुका है।

रेटिंग एजेंसियों और ब्रोकरेज कंपनियों ने विकास दर के अपने अनुमान घटा दिए हैं। मूडीज ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने ऋणात्मक साख की जोखिम की आशंका जताई है, यानी आर्थिक गतिविधियां सुस्त होने से लेनदार न कर्ज लेने की स्थिति में रहेंगे और न चुकाने की स्थिति में। लक्षण स्पष्ट हैं, क्योंकि बैंकिंग प्रणाली में अतिरिक्त धनराशि बढ़ती जा रही है। बैंकों द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) में जमा जो राशि 31 मार्च को अड़तीस खरब रुपए थी, वह 18 अप्रैल तक बढ़ कर 55.5 खरब रुपए हो गई। यानी बैंकों द्वारा कर्ज देने या लेनदारों द्वारा कर्ज लेने की रफ्तार में अप्रत्याशित गिरावट आई है।

मूडीज ने कहा है कि यदि संक्रमण की स्थिति नियंत्रित नहीं हो पाई तो वित्त वर्ष 2021-22 में 13.7 प्रतिशत विकास दर के उसके अनुमान को हासिल कर पाना भारत के लिए कठिन हो सकता है। हालांकि एजेंसी का अनुमान अभी भी दो अंकों की विकास दर का है। फिच ने भी अपने विकास दर अनुमान को घटा दिया है। नोमुरा, जेपी मॉर्गन, यूबीएस और सिटी रिसर्च जैसी ब्रोकरेज कंपनियों ने भी भारत के लिए अपने विकास दर अनुमान घटा दिए हैं। लेकिन दो अंकों की दर पर सभी एकमत हैं। आर्थिक जानकारों का मानना है कि मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही तक अर्थव्यवस्था में गिरावट रहेगी।

लेकिन कोरोना की दूसरी लहर गुजरने के बाद तीसरी तिमाही में मांग बढ़ेगी। जून के बाद टीकाकरण की तेज रफ्तार भी दो अंकों की दर हासिल करने में मददगार होगी। लेकिन दो अंकों की विकास दर के लिए टीकाकरण एक बड़ी शर्त है। अगस्त तक तीस करोड़ और दिसंबर तक पचास करोड़ लोगों को टीका लगाने का लक्ष्य है। लेकिन टीकाकरण की मौजूदा गति निराशाजनक है। 11 अप्रैल तक टीकाकरण की दर महज छत्तीस लाख प्रतिदिन थी। जबकि यह टीका लोगों की जिंदगियां बचाने के लिए जितना जरूरी है, अर्थव्यवस्था बचाने के लिए भी उतना ही जरूरी है।

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