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राजनीति: संकट महंगाई और रोजगार का

रोजगार के मामले में भारत का स्थिति दुनिया में सबसे खराब है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएलओ) के आंकड़ों के अनुसार विश्व क८ी औसत रोजगार दर सत्तावन फीसद है। जबकि भारत की औसत रोजगार दर सैंतालीस फीसद है। पड़ोसी देश पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश भी इस मामले में भारत से आगे हैं। पाकिस्तान और श्रीलंका की रोजगार दर क्रमश: पचास और इक्यावन फीसद है। जबकि बांग्लादेश में रोजगार दर सत्तावन फीसद है।

Author Updated: January 27, 2021 4:41 AM
Generalसांकेतिक फोटो।

सरोज कुमार

महंगाई और बेरोजगारी दो ऐसे शब्द हैं, जिसे आम से लेकर खास तक कोई पसंद नहीं करता। लेकिन अर्थशास्त्र में महंगाई को बुरा नहीं माना जाता, बशर्ते वह एक सीमा में हो और रोजगार की स्थिति उसे समर्थन करती हो। लेकिन जब महंगाई के साथ ही बेरोजगारी के हालात बन जाएं, तो किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए यह एक संकट की घड़ी मानी जाती है। हमारा देश आज इसी संकट में फंसा हुआ है। महंगाई और बेरोजगारी दोनों एक साथ कदम ताल कर रहे हैं। जो रोजगार और नौकरियां हैं, वहां भी कमाई नहीं रह गई है।

आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया वाली स्थिति है। कोरोना काल के दौरान और उससे पहले से ही अर्थव्यवस्था का कमोबेश यही हाल रहा है। अब कोरोना के नियंत्रण में आने और महामारी का टीका तैयार हो जाने के बाद भी इस स्थिति से जल्द निजात मिलने के आसार नहीं हैं। कहानी पूरे 2021 तक बनी रह सकती है।

बेशक आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं और बाजार में मांग भी बढ़ी है, लेकिन बाजार रोजगार पैदा नहीं कर पा रहा है। वेतन में कटौती अभी भी बहाल नहीं हुई है। यह स्थिति चिंताजनक है। पिछले महीने (दिसंबर 2020) में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआइ) पर आधारित खुदरा महंगाई दर घट कर 4.59 फीसद पर आ गई, जो बीते मार्च (5.84 फीसद) से अब तक की सबसे निम्न दर है। लेकिन इस गिरावट से बहुत खुश होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि प्रकृति में यह क्षणिक है।

यह गिरावट खाद्य वस्तुओं की कीमतों में कमी के कारण आई है, वह भी सिर्फ सब्जियों की कीमतों में 10.41 फीसद की भारी कमी के कारण। आपूर्ति शृंखला के सुचारु होने का भी इसमें थोड़ा योगदान हो सकता है, लेकिन उतना नहीं, जितना कि महंगाई के लिए इसे जिम्मेदार ठहराया जा रहा था। यदि महंगाई की वजह आपूर्ति शृंखला होती तो सिर्फ सब्जियों की कीमतें नहीं घटतीं। लेकिन सब्जियों को छोड़ कर बाकी खाद्य उत्पादों की कीमतों में वृद्धि के रुझान सरकार की बात को बेमानी बनाते हैं। अनाज और संबंधित उत्पादों की कीमतों में दिसंबर में हालांकि मामूली 0.98 फीसद की वृद्धि हुई। लेकिन मांस और मछली की कीमतें क्रमश: 15.21 फीसद और 16.08 फीसद बढ़ीं।

तेल और वसा की कीमतों में 20.05 फीसद वृद्धि हुई। दूध और दुग्ध उत्पाद 3.98 फीसद महंगे हुए। फल की कीमतें 2.68 फीसदी बढ़ीं। जबकि दालों और उससे जुड़े उत्पादों की कीमतों में 15.98 फीसद वड्ढद्धि दर्ज की गई। चीनी 0.53 फीसद महंगी हुई। जबकि मसाले 10.29 फीसद महंगे हो गए। पेय पदार्थों (शराब को छोड़ कर) की क८ीमतें 11.86 फीसद बढ़ीं।

तैयार भोजन, नाश्ते, मिठाई आदि की कीमतों में दिसंबर में 4.81 फीसद की वृद्धि देखी गई। वृद्धि का यह रुझान आगे बना रह सकता है। विनिर्मित वस्तुओं की कीमतों में सालाना वृद्धि की परंपरा है, लेकिन कोरोना महामारी के कारण पिछले साल यह नहीं हो पाया था। अब जब स्थिति सामान्य होने को है तो निश्चित रूप से इस साल कीमतें बढ़ाई जाएंगी। दूसरी बात यह कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार के कारण मांग बढ़ रही है, जिसका असर भी कीमतों पर पड़ेगा।

महंगाई का एक और बड़ा कारण र्इंधन की कीमतें हैं। र्इंधन महंगा होने से माल ढुलाई महंगी होती है और इसका असर खुदरा महंगाई दर पर पड़ता है। सरकार ने कोरोना काल में पेट्रोल, डीजल पर दो महीने से भी कम अंतराल में दो बार उत्पाद शुल्क बढ़ाया था। पहली बार 14 मार्च, 2020 को पेट्रोल और डीजल दोनों पर प्रति लीटर तीन-तीन रुपए और उसके बाद पांच मई को पेट्रोल पर दस रुपए प्रति लीटर और डीजल पर तेरह रुपए प्रति लीटर। हालांकि कोरोना काल के दौरान वैश्विक बंदी के कारण मांग न होने से कच्चे तेल की कीमतें दो दशक के न्यूनतम स्तर लगभग अठारह डालर प्रति बैरल पर पहुंच गई थीं, लेकिन कारण उत्पाद शुल्क में भारी वृद्धि के बाद भी र्इंधन कीमतें यथावत बनी रहीं।

अब जब वैश्विक बंदी समाप्त होने के बाद अब मांग बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतें भी बढ़ रही हैं, तो उसका असर हर रोज तेल कीमतों पर दिख रहा है। इसके अलावा राज्यों ने भी र्इंधन पर कोरोना अधिभार के रूप में मूल्य वर्धित कर (वैट) बढ़ा दिया। यह गौर करने वाली बात है कि आज पेट्रोल-डीजल की जो कीमत हम चुकाते हैं, उसका सत्तर फीसद हिस्सा सिर्फ कर का है। यदि सरकार ने ये उत्पाद कर नहीं बढ़ाए होते तो उपभोक्ताओं को मौजूदा संकट काल में थोड़ी राहत मिलती।

पेट्रोल, डीजल की कीमतों में वृद्धि का रुझान लगातार बना हुआ है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार के बाद मांग बढ़ने लगी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भी तेजी का रुझान है। इसका असर महंगाई दर पर हर हाल में होगा। कई विशेषज्ञों का अनुमान है कि निकट भविष्य में महंगाई दर पांच-छह फीसद तक रह सकती है। उपभोक्ताओं की आमदनी के लिहाज से यह दर चिंता का विषय है। महंगाई को तब तक बुरा नहीं माना जाता जब तक कि रोजगार की स्थिति बुरी न हो। लेकिन भारत में रोजगार की स्थिति भी गंभीर है।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) के अनुसार, दिसंबर,2020 में बेरोजगारी दर बढ़ कर 9.07 फीसद हो गई, जो नवंबर में 6.50 फीसद और अक्तूबर में यह 7.02 फीसद थी। जून में बेरोजगारी दर 10.18 फीसद तक जा पहुंची थी। इससे पहले पूर्णबंदी लागू होने के बाद बेरोजगारी दर अप्रैल में 23.52 फीसद के ऐतिहासिक सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गई थी। मई में इसमें थोड़ा सुधार हुआ और यह 21.73 फीसद पर आई। आगे बेरोजगारी दर में कैसे सुधार होगा, फिलहाल कोई खाका दिखाई नहीं देता है। सरकार का मानना है कि अर्थव्यवस्था में सुधार हो रहा है और इससे बेरोजगारी दर में भी सुधार होगा। लेकिन आंकड़े इस कथ्य के पक्ष में संकेत नहीं देते।

बेरोजगारी दर में वृद्धि रोजगार में कमी का संकेतक होती है। दिसंबर में रोजगार में अड़तालीस लाख की कमी हुई और यह 38.88 करोड़ रह गया, जो नवंबर में 39.36 करोड़ था। रोजगार का मौजूदा स्तर दो साल पहले के स्तर से भी नीचे है। रोजगार के मामले में भारत का स्थिति दुनिया में सबसे खराब है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएलओ) के आंकड़ों के अनुसार विश्व की औसत रोजगार दर सत्तावन फीसद है। जबकि भारत की औसत रोजगार दर सैंतालीस फीसद है। पड़ोसी देश पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश भी इस मामले में भारत से आगे हैं। पाकिस्तान और श्रीलंका की रोजगार दर क्रमश: पचास और इक्यावन फीसद है। जबकि बांग्लादेश में रोजगार दर सत्तावन फीसद है।

भारत में रोजगार दर की इस हालत के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार सार्वजनिक क्षेत्र है। आइएलओ के अनुसार भारत में कुल श्रमशक्ति क८ा मात्र 3.8 फीसद ही सार्वजनिक क्षेत्र में कार्यरत हैं। जबकि अमेरिका में यह दर 15.8 फीसद, ब्रिटेन में 21.5 फीसद, जर्मनी में 12.9 फीसद, फ्रांस में 24.9 फीसद, दक्षिण कोरिया में 10.3 फीसद, जापान में 10.5 फीसद, सिंगापुर में 32 फीसद, और चीन में 50 फीसद है। यहां तक कि बांग्लादेश में भी श्रमशक्ति का आठ फीसद हिस्सा सार्वजनिक क्षेत्र में कार्यरत है।

अब एक तरफ महंगाई और दूसरी तरफ बेरोजगारी है। जाहिर है, अर्थव्यवस्था को उबरने में अभी वक्त लगेगा। सरकार का ध्यान महंगाई पर अधिक है, लिहाजा उच्च महंगाई दर के बावजूद उसने अपना लक्ष्य चार फीसद बरकरार रखा है। जबकि मौजूदा परिस्थिति में ध्यान रोजगार बढ़ाने पर होना चाहिए। लोगों की जेब में पैसा होगा, तभी अर्थव्यवस्था सुधरेगी। लंबे समय तक अर्थव्यवस्था में ठहराव अच्छा संकेत नहीं है।

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