ताज़ा खबर
 

विनिवेश और निजीकरण के आगे

विनिवेश जितना सुगम आर्थिक मॉडल दिखता है, धरातल पर उस ढंग से उतरता नहीं है, जबकि इसके अनुमान के आधार पर सरकारें नियोजन को पटरी पर लाने का मंसूबा पाल लेती हैं। ऐसे में इसके बूते किए जाने वाले कई लोकहित के कार्य भी प्रभावित होते हैं।

Indianसांकेतिक फोटो।

सुशील कुमार सिंह

अर्थव्यवस्था उत्पादन, वितरण और खपत की एक सामाजिक व्यवस्था है जो किसी देश या क्षेत्र विशेष में अर्थशास्त्र का गतिशील आईना भी होती है। इस शब्द की सबसे प्राचीन कसौटी कौटिल्य के अर्थशास्त्र में देख सकते हैं। इसी आर्थिक गतिशीलता को बनाए रखने के लिए सरकारें नए कदम भी उठाती हैं और नए आयामों की खोज में लगी रहती हैं। हालांकि विनिवेश और निजीकरण जैसे शब्द भारतीय शासन पद्धति में नए नहीं हैं, पर इन्हें नूतन तरीके से प्रसार देने का प्रयास जारी है। अर्थव्यवस्था के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों को देखते हुए सरकार विनिवेश और निजीकरण को तेजी से आजमा रही है। जाहिर है, इससे सरकार को अतिरिक्त राजस्व मिलेगा और शासन की दक्षता में वृद्धि होगी। मगर इस हकीकत को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता कि एक सीमा के बाद इसके दुष्प्रभाव भी देखने को मिल सकते हैं।

बीते कुछ वर्षों से विनिवेश और निजीकरण को लेकर चर्चा फलक पर हैं और इसे एक नई ऊंचाई देने का प्रयास भी जारी है। स्वतंत्र भारत में सबसे बड़ा आर्थिक सुधार 24 जुलाई 1991 को आए उदारीकरण को माना जाता है। यहीं से विनिवेश के दौर की शुरुआत होती है। सरकारें बदलती रहीं, मगर यह नीति निरंतर चलती रही। मौजूदा सरकार का ध्यान भी विनिवेश पर बाकायदा देखा जा सकता है। एक फरवरी 2021 को पेश बजट में पौने दो लाख करोड़ की वसूली विनिवेश के जरिए ही उगाहने का लक्ष्य रखा गया है, जबकि इसके ठीक एक साल पहले वित्त वर्ष 2020-21 के लिए लक्ष्य दो लाख दस हजार करोड़ का था। मगर कोरोना महामारी के चलते सरकार मामूली ही धन जुटा पाई।

इतना ही नहीं, वर्ष-दर-वर्ष विनिवेश के लक्ष्य भी बड़े होते गए। वित्त वर्ष 2014-15 में सरकार ने अट्ठावन हजार चार सौ पच्चीस करोड़ रुपए का विनिवेश लक्ष्य रखा था, जबकि छब्बीस हजार अड़सठ करोड़ रुपए ही जुटा पाई थी। 2015-16 में यही लक्ष्य साढ़े उनहत्तर हजार करोड़ रुपए का था, मगर महज एक तिहाई से थोड़े ही ज्यादा यानी तेईस हजार नौ सौ सनतानवे करोड़ से ही संतोष करना पड़ा। इसी तरह 20216-17 और 2017-18 में भी निर्धारित लक्ष्य से वसूली कम हुई। लेकिन वित्त वर्ष 2018-19 में अस्सी हजार करोड़ रुपए का लक्ष्य रखा गया मिले पचासी हजार करोड़। मौजूदा सरकार का यही एक वर्ष तय लक्ष्य से अधिक है अन्यथा विनिवेश के मामले में लक्ष्य बड़े और ताकत अधिक झोके गए संसाधनों के बावजूद उगाही बौनी ही साबित हुई।

सरकारें विनिवेश को आर्थिक सुगमता के एक बेहतर आर्थिक मॉडल के रूप में देखती रही हैं जो तीन दशक पुराना है। 1991-92 में जब सरकारी क्षेत्र की इकतीस कंपनियों में विनिवेश किया गया और तीन हजार अड़तीस करोड़ रुपए सरकारी खजाने में आए तो सरकार का सुखद महसूस करना लाजिमी था। उदारीकरण से आर्थिक उठान धीरे-धीरे दिखने लगा था। अगस्त 1996 में एक विनिवेश आयोग का गठन किया गया जिसके मुखिया जीवी रामकृष्णा थे। आयोग का काम सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में चरणबद्ध तरीके से हिस्सेदारी बेचने को लेकर सलाह देना और इस प्रक्रिया पर निगरानी रखना था। इस आयोग ने सत्तावन सरकारी कंपनियों के निजीकरण की सिफारिश की थी।

वाजपेयी शासनकाल में बाकायदा विनिवेश मंत्रालय भी बनाया गया था। हालांकि मई 2004 में आयोग समाप्त कर दिया गया और मंत्रालय का भी इतिश्री हो गया था। गौरतलब है कि 1991-92 से लेकर 2000-01 के बीच अर्थात् एक दशक में विनिवेश से धन जुटाने का जो लक्ष्य रखा गया था, उसके आधे से कम की वसूली हो पाई थी। इससे यह स्पष्ट हो गया कि विनिवेश जितना सुगम आर्थिक मॉडल दिखता है, धरातल पर उस ढंग से उतरता नहीं है, जबकि इसके अनुमान के आधार पर सरकारें नियोजन को पटरी पर लाने का मंसूबा पाल लेती हैं। ऐसे में इसके बूते किए जाने वाले कई लोकहित के कार्य भी प्रभावित होते हैं।

विनिवेश और निजीकरण के फर्क को भी समझने की जरूरत है। विनिवेश में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी में सरकार कुछ हिस्सा बेचती है, लेकिन कंपनी पर नियंत्रण सरकार का ही रहता है, जबकि निजीकरण में बहुमत हिस्सेदारी निजी कंपनियों को दे दी जाती है और इस तरह से प्रबंधन निजी कंपनी के हाथों में चला जाता है। दो टूक यह भी है कि विनिवेश के संदर्भ में सरकार नियंत्रण निजी कंपनी को दे या न दे, यह उस पर निर्भर है लेकिन निजीकरण में ऐसा नहीं है।

सवाल यह है कि विनिवेश की आखिरकार आवश्यकता क्यों पड़ती है। इसके पीछे बड़ा कारण कंपनी का अच्छा प्रदर्शन न करना है। कंपनी चलाने के लिए संचित निधि पर भार बने रहने से वित्तीय बोझ लगातार बना रहता है। ऐसे में सरकार इससे पीछा छुड़ाना चाहती है। इससे न केवल सरकारी खजाने से पैसा निकलना बंद होता है, बल्कि उल्टे खजाना भरने का अवसर मिलता है। लेकिन तीन दशक की पड़ताल यह बताती है कि कुछ वित्त वर्ष को अपवादस्वरूप छोड़ दें, तो विनिवेश से उगाही का लक्ष्य कभी हासिल नहीं हो पाया। विनिवेश की प्रक्रिया इतनी सरल भी नहीं है, इसके लिए बाकायदा खरीददार ढ़ूंढ़ने पड़ते हैं। पिछले साल जनवरी में सरकार ने घोषणा कर दी थी कि वह कर्ज के बोझ में दबी एअर इंडिया की पूरी हिस्सेदारी बेचने के लिए तैयार है। मगर इसमें कठिनाई बनी हुई है।

निजीकरण को भी राजस्व जुटाने का बेहतर जरिया माना जाता है। मगर इसके बजाए यदि संरचनात्मक, प्रक्रियागत और व्यावहारिक सुधार पर बल दिया जाए तो नतीजे और बेहतर हो सकते हैं। कहा जा रहा है कि सरकार ने निजीकरण के लिए अठारह क्षेत्रों को रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण माना है जिसे तीन व्यापक खंडों में विभाजित किया गया है खनन और पर्यवेक्षण, विनिर्माण, प्रसंस्करण एवं निर्माण और सेवा क्षेत्र। जाहिर है बैंकिंग, बीमा, इस्पात, उर्वरक, पेट्रोलियम आदि इसकी जद में रहेंगे। अब सवाल यह है कि क्या बेचना ही विकल्प रह गया है।

लोक सशक्तिकरण यदि सुशासन है तो निजी क्षेत्र के हाथों में बढ़ती ताकत से क्या नागरिकों का शोषण नहीं होगा? राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए भी सरकार विनिवेश की ओर कदम बढ़ाती है, साथ ही इस पूंजी का इस्तेमाल कर्ज कम करने के लिए भी करती है। मगर लोक कल्याण इस प्रक्रिया से क्या प्रभावित होता है। जितना अधिक निजी क्षेत्र का दखल बढ़ेगा, लोक कल्याण उतना प्रभावित होगा। मुनाफे के बगैर निजी क्षेत्र काम नहीं कर सकते और घाटे में रह कर भी जनता के हित सुनिश्चित करना सरकार अपना धर्म समझती है।

बैंकों का विलय हो या सरकारी कंपनियों का विनिवेश या फिर निजी के हाथ में कुछ का नियंत्रण देने जैसी बात हो, इनके फायदे और नुकसान दोनों हैं। पिछले साल मई में आत्मनिर्भर भारत की जो धारणा प्रकट हुई उसका प्रभाव भी उपरोक्त बिन्दुओं में देखा जा सकता हैं। 2021-22 के बजट में आत्मनिर्भर भारत के लिए सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम नीति की घोषणा की गई थी। इसके तहत रणनीतिक क्षेत्र में पीएसयू के जरिए सरकार की मौजूदगी बहुत कम हो जाएगी और गैर रणनीतिक क्षेत्रों में पीएसयू का निजीकरण होगा या उन्हें बंद कर दिया जाएगा। संकेत साफ है सब कुछ पैसे के लिए हो रहा है।

जाहिर है, पैसे से विकास होगा, लेकिन क्या विनिवेश और निजीकरण व्यापक रूप से लाकर कोई चुनौती तो नहीं खड़े कर रहे हैं जिसका असर आने वाले दिनों पर पड़े। वैसे भी देश का नागरिक इस भौतिकवाद में कहीं अधिक बड़ा उपभोक्ता बन गया है, मगर वह पहले देश का नागरिक है। ऐसे में यदि नियंत्रण निजी के हाथों में होता भी है तो भी अपने नागरिकों के लोक कल्याण से सरकार मुंह नहीं मोड़ सकती।

Next Stories
1 धधकते जंगल, धुएं में उड़ते सवाल
2 ग्रामीण रोजगार और अर्थव्यवस्था
3 फिर अधर में भारत-पाक आर्थिक संबंध
यह पढ़ा क्या?
X