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राजनीति: भुखमरी का गहराता संकट

इसमें कोई संदेह नहीं कि आर्थिक मंदी और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी घटनाओं ने भी बड़ी संख्या में लोगों को भुखमरी की ओर धकेला है। महंगाई के कारण पोषक आहार लोगों की पहुंच से दूर हैं। वर्तमान समय में विश्व भर में लगभग तीन अरब लोगों के पास पौष्टिक आहार हासिल करने का कोई साधन नहीं है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि विश्व भर में भुखमरी की स्थिति कितनी विकट है।

starvaionयह विडंबना ही है कि इक्कीसवीं सदी में भी विश्व भर में आबादी के बड़े हिस्से के पास पर्याप्त भोजन नहीं है। ऐसे में सभी को पौष्टिक आहार उपलब्ध करवाना एक बड़ी चुनौती है।

संजय ठाकुर

संयुक्त राष्ट्र की इस चेतावनी को गंभीरता से लिया जाना चाहिए कि वर्तमान संकट विश्व भर में करोड़ों और लोगों को भुखमरी की ओर धकेल सकता है। वैसे तो यह समस्या पूरे विश्व की है, लेकिन भारत के संबंध में यह स्थिति ज्यादा चिंताजनक है, क्योंकि यहां आबादी का एक हिस्सा पहले ही से भुखमरी जैसे हालात का शिकार है। हैरानी की बात यह है कि देश के पास इस समस्या से निपटने के पर्याप्त साधन-संसाधन होते हुए भी भारत की गिनती उन देशों में होती है जहां भुखमरी आज भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। और इससे निजात तभी पाई जा सकती है जब इस बारे में बनाई गई नीतियों और योजनाओं को भ्रष्टाचार-मुक्त व्यवस्था के अंतर्गत प्रभावी ढंग से कार्यरूप देने की पहल हो।

भारत में खाद्यान्न की कोई कमी नहीं है। हालत यह है कि भंडारण सुविधाओं के अभाव में हर साल लाखों टन अनाज सड़ जाता है। वर्तमान समय में भारत के पास चीन के बाद विश्व का सबसे बड़ा अन्न-भंडार है, जिस पर सरकार सात सौ पचास अरब रुपए सालाना खर्च करती है। यह धनराशि सकल घरेलू उत्पाद की लगभग एक प्रतिशत है। इस अन्न को लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। इसके लिए कोई नई नीति निर्धारत करने की भी जरूरत नहीं है, बल्कि देश में मौजूद खाद्यान्न वितरण व्यवस्था के तहत ही ऐसा किया जा सकता है।

यह विडंबना ही है कि इक्कीसवीं सदी में भी विश्व भर में आबादी के बड़े हिस्से के पास पर्याप्त भोजन नहीं है। ऐसे में सभी को पौष्टिक आहार उपलब्ध करवाना एक बड़ी चुनौती है। विश्व में सबसे ज्यादा कुपोषित एशिया में हैं, जिनकी संख्या लगभग अड़तीस करोड़ है। इसके बाद लैटिन अमेरिका और कैरिबियाई देशों का नंबर आता है।

विश्व में खाद्य सुरक्षा और पोषण की स्थिति को लेकर संयुक्त राष्ट्र की पांच एजेंसियों- खाद्य व कृषि संगठन, अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष, संयुक्त राष्ट्र बाल कोष, विश्व खाद्य कार्यक्रम और विश्व स्वास्थ्य संगठन की साझा रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा वैश्विक आर्थिक परिदृश्य पर आधारित अनुमान के अनुसार वर्ष 2020 में भुखमरी की सूची में तेरह करोड़ बीस लाख अतिरिक्त लोग जुड़ सकते हैं। पिछले वर्ष ही विश्व में भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या में लगभग एक करोड़ की बढ़ोतरी हुई थी।

वर्ष 2014 के बाद पिछले छह वर्षों में भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या में छह करोड़ की वृद्धि दर्ज की गई है। मौजूदा परिस्थितियों के चलते यह समस्या और विकट रूप धारण करती जा रही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि आर्थिक मंदी और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी घटनाओं ने भी बड़ी संख्या में लोगों को भुखमरी की ओर धकेला है। महंगाई के कारण पोषक आहार लोगों की पहुंच से दूर हैं। वर्तमान समय में विश्व भर में लगभग तीन अरब लोगों के पास पौष्टिक आहार हासिल करने का कोई साधन नहीं है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि विश्व भर में भुखमरी की स्थिति कितनी विकट है।

भारत में भारतीय खाद्य निगम द्वारा संचालित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) देश का सबसे महत्त्वपूर्ण खाद्य सुरक्षा-तंत्र है जिसे कम कीमत पर खाद्यान्न वितरण के लिए शुरू किया गया था। लेकिन बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के कारण यह प्रणाली वांछित उद्देश्यों की प्राप्ति में असफल रही। सार्वजनिक वितरण प्रणाली से वितरित किया जाने वाला अन्न उचित मूल्य की दुकानों की बजाय कारखानों में पहुंचता रहा है।

यह भी कड़वी सच्चाई है कि राशन की दुकानों द्वारा जितना भी अन्न वितरित किया जाता है, वह गरीबों की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होता। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में अन्न की खपत का औसत स्तर प्रति व्यक्ति प्रतिमाह सिर्फ एक किलो है। और सबसे ज्यादा दुखद तो यह कि यह राशन दुकानों के जरिए वितरित किया जाने वाला खाद्यान्न गुणवत्ता की दृष्टि से घटिया किस्म का होता है। ऐसे में लोगों को पौष्टिक खाद्यान्न मिलने की बात तो सपने में भी नहीं सोची जा सकती।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली का लाभ वास्तव में जरूरतमंदों तक पहुंचाने के लिए एक जून, 1997 से लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) शुरू की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य गरीबी-रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को ज्यादा रियायती दामों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराना था। केंद्र और विभिन्न राज्यों की सरकारें साझा तौर पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली और लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली को विनियमित करने की जिम्मेदारी वहन करती हैं। वर्तमान समय में देशभर में गरीब लोगों को पांच लाख उचित मूल्य की दुकानों के माध्यम से खाद्यान्न का वितरण किया जा रहा है।

भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली दुनिया का सबसे बड़ा वितरण-तंत्र है। इसके बावजूद देश के इक्कीस प्रतिशत लोग कुपोषित हैं। इससे यह बात भलीभांति समझी जा सकती है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली और लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत वितरित किया जा रहा अन्न सभी जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच रहा है।
कोरोना संकट के कारण जिस तरह के हालात पैदा हुए हैं, उनका चौतरफा असर पड़ा है। ऐसे में खाद्यान्न वितरण प्रणाली भी बाधित हुई है, लोगों का रोजगार छिन्न गया है और रोजगार के अवसरों में भारी कमी आई है। आजीविका बुरी तरह प्रभावित हुई है। लेकिन भुखमरी का संदर्भ इतना ही नहीं है, बल्कि भुखमरी की बढ़ती समस्या के कारण तो पहले से विद्यमान हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था पहले ही से संकट में है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनोमी (सीएमआइई) के आंकड़ों के अनुसार पिछले कुछ महीनों में लगभग बारह करोड़ नौकरियां चली गई हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना से हालात और बिगड़ने का अंदेशा जताया है। अर्थव्यवस्था में मांग एवं आपूर्ति आधारित सुस्ती के साथ-साथ बेरोजगारी का भीषण संकट सामने है। यह संकट सीधे-सीधे भुखमरी के हालात पैदा कर सकता है।

मौजूदा संकट से निपटने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली और लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुदृढ़ बना कर पहाड़ी, सुदूरवर्ती और दुर्गम क्षेत्रों तक इसकी पहुंच सुनिश्चित करने की जरूरत है। जनसंख्या के निर्धनतम लोगों पर केंद्रित लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली को इस वर्ग के प्रति और ज्यादा सशक्त और सुदृढ़ बना कर प्रभावी रूप से लागू करना होगा। लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत अंत्योदय अन्न योजना को गरीबी रेखा से नीचे की आबादी के निर्धनतम वर्ग के बीच भुखमरी कम करने के उद्देश्य से आरम्भ किया गया था।

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण ने इस तथ्य को उजागर किया था कि देश की कुल जनसंख्या के लगभग पांच प्रतिशत भाग के पास दो समय का भी भोजन नहीं है। वर्तमान समय में इस संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। इसलिए भुखमरी को फैलने से रोकने के लिए लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली को आबादी के इस वर्ग के प्रति और ज्यादा प्रभावी बनाने की सख्त जरूरत है।

सरकार को ग्रामीण व शहरी, दोनों क्षेत्रों के भूमिहीन खेतिहर मजदूरों, सीमांत किसानों, दस्तकारों, कुम्हार, बढ़ई, बुनकर, लोहार, मोची, रिक्शा चलाने वालों, सामान ढोने वालों, फल व फूल विक्रेताओं एवं कबाड़ियों सहित अनौपचारिक क्षेत्र में दिहाड़ी पर अपनी जीविका चलाने वालों पर विशेष रूप से ध्यान देना होगा। ऐसे परिवारों पर भी ध्यान देना होगा, जिनमें किसी विधवा, असाध्य रोग से ग्रस्त व्यक्ति, अपंग व्यक्ति या साठ वर्ष या इससे ज्यादा उम्र के लोग अकेले हैं और जिनकी जीविका का कोई निश्चित साधन नहीं है या जिन्हें पारिवारिक अथवा सामाजिक सहायता प्राप्त नहीं है। ऐसे कुछ उपायों से ही भारत में भुखमरी को फैलने से रोका जा सकता है।

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