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चुनौती बनती आर्थिक चिंताएं

ओमीक्रान की वजह से तमाम कंपनियां परेशान हैं।

सांकेतिक फोटो।

आलोक पुराणिक

ओमीक्रान की वजह से तमाम कंपनियां परेशान हैं। आपूर्ति शृंखला बाधित होने की आशंका है। महंगाई अब बड़ी चिंता है। रिजर्व बैंक के अनुसार अक्तूबर 2021 में र्इंधन की महंगाई तो 14.3 फीसद के उच्चतम स्तर तक पहुंच गई थी। र्इंधन के महंगे होने का असर देर-सबेर हर चीज की महंगाई पर पड़ता है।

बंबई शेयर बाजार (बीएसई) का सूचकांक देखें, तो जरा भी नहीं लगता कि देश कोरोना से जूझ रहा है और ओमीक्रान के मामले नए उफान पर हैं। एक साल में बीएसई सूचकांक में करीब चौबीस फीसद और एक महीने में करीब तीन फीसद का उछाल देखा गया। बीएसई में सूचीबद्ध सूचना प्रौद्योगिकी (आइटी) से जुड़ी कंपनियों का सूचकांक एक साल में करीब सैंतालीस फीसद ऊपर जा चुका है। आटोमोबाइल क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों की शेयर कीमत का सूचकांक में एक साल में करीब अठारह फीसद से ज्यादा की वृद्धि हुई है। यानी मोटे तौर पर कम से कम शेयर बाजार तो कोरोना मुक्त हो चुका है।

पर कोरोना की चिंताओं से मुक्त हुए बाजार में सब कुछ हरा-भरा नहीं है। पेटीएम जैसे बहुचर्चित ब्रांड से जुड़ी कंपनी का शेयर एक महीने में करीब उनतीस फीसद नीचे आ चुका है। दरअसल चिंताएं यहीं से शुरू होती हैं। कई निवेशक नई कंपनियों के शेयरों में धुआंधार पैसा लगा रहे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे वे मान कर चल रहे हों कि शेयर बाजार की सिर्फ एक ही गति है और वह है- ऊपर की ओर जाना। कोरोना काल में शेयर बाजार कुछ समय तक तो सुन्न अवस्था में रहे, फिर उनमें एक अलग की किस्म की बेफिक्री आ गई और अब जो स्थितियां हैं, उनमें तो साफ माना जा सकता है कि शेयर बाजार की चाल कोरोना से मुक्त हो चुकी है। इसके गंभीर अर्थ और आशय हैं।

केंद्र सरकार की ओर से नवंबर में जारी आंकड़ों के अनुसार जुलाई-सितंबर 2021 के दौरान अर्थव्यवस्था में 8.4 फीसद का विकास हुआ। इससे पहले की तिमाही यानी अप्रैल-जून 2021 में 20.1 फीसद का इजाफा हुआ था। ये आंकड़े साफ बताते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूती से विकास की राह पर फिर लौट चली है। वित्त मंत्रालय की नवंबर, 2021 महीने के लिए मासिक आर्थिक रिपोर्ट के अनुसार भारत कोविड-19 की वजह से अर्थव्यवस्था में आई गिरावट से चालू वित्त वर्ष 2021-22 में तेजी से उभरने वाले कुछ देशों में होगा। साथ ही, देश में तेजी से टीकाकरण की वजह से कोरोना विषाणु के नए स्वरूप ओमीक्रान से अर्थव्यवस्था पर अधिक गंभीर प्रभाव नहीं पड़ेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत दुनिया की उन चुनिंदा अर्थव्यवस्थाओं में से है, जो इस संकुचन से अधिक तेजी से उबरेंगी। यानी कोरोना के ओमीक्रान स्वरूप को लेकर भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है, ऐसा वित्त मंत्रालय का मानना है।

जीएसटी संग्रह से भी अर्थव्यवस्था में मजबूती दिखाई देती है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह दिसंबर, 2021 में इससे पिछले साल के समान महीने की तुलना में तेरह फीसद बढ़ कर 1.29 लाख करोड़ रुपए के पार निकल गया। दिसंबर में जीएसटी संग्रह नवंबर के 1.31 लाख करोड़ रुपए के आंकड़े से कम रहा है। दिसंबर, 2021 में लगातार छठे महीने सरकार का जीएसटी राजस्व एक लाख करोड़ रुपए से अधिक रहा है, यानी जीएसटी के मोरचे पर अर्थव्यवस्था मजबूत दिखाई दे रही है।

पर चिंताएं अपनी जगह हैं। ओमीक्रान की वजह से तमाम कंपनियां परेशान हैं। आपूर्ति शृंखला बाधित होने की आशंका है। महंगाई अब बड़ी चिंता है। रिजर्व बैंक के अनुसार अक्तूबर 2021 में र्इंधन की महंगाई तो 14.3 फीसद के उच्चतम स्तर तक पहुंच गई थी। गौरतलब है कि र्इंधन के महंगे होने का असर देर-सबेर हर चीज की महंगाई पर पड़ता है। रिजर्व बैंक का आकलन है कि खुदरा महंगाई दर 2021-22 में 5.3 फीसद रहेगी। यह दर खासी चिंता बढ़ाने वाली है। दिसंबर 2021 की खुदरा महंगाई के आंकड़े भी आ गए हैं। दिसंबर 2021 में खुदरा महंगाई 5.59 फीसद रही, यानी रिजर्व बैंक द्वारा तय की गई खतरे की सीमा यानी छह फीसद के एकदम करीब।

खुदरा महंगाई का स्तर जो दिसंबर 2021 में दर्ज किया गया, वह पांच महीनों का उच्चतम स्तर है। यानी महंगाई फिर सिर उठा रही है। और संकट यह भी है कि कच्चे तेल के भाव वैश्विक बाजार में फिर दहाड़ रहे हैं। कच्चे तेल के भाव दो महीनों के उच्चतम स्तर पर हैं। महंगाई कई तरह से चोट करती है। एक तरफ तो खरीद क्षमता को कुतर जाती है और दूसरी तरफ ब्याज से मिलने वाली आय को बौना बना देती है। महंगाई बुजुर्गों के जीवन स्तर को लगातार गिराती है, जो कम गंभीर मसला नहीं है। पर महंगाई पर रोक लगाना सरकार के हाथ में एक हद ही संभव है। कच्चे तेल के भावों पर सरकार को कोई दखल नहीं है। महंगाई वहां से आती है, कच्चे तेल के भावों में बढ़ोत्तरी कमोबेश हर वस्तु की कीमत में दिखती है, देर सबेर।

रिजर्व बैंक के अपने मानकों के हिसाब से अगर यह महंगाई दर छह फीसद के ऊपर चली जाए, तो माना जाना चाहिए कि खतरे के संकेत हैं। महंगाई की चोट हर वह शख्स महसूस कर सकता है जो पेट्रोल पंप से पेट्रोल आदि लेता है। पेट्रोल के भाव बढ़ने से लगभग हर चीज की महंगाई बढ़ जाती है, ऐसा सामने आता है। सरकार को इस मसले पर गंभीरता से विचार करना ही चाहिए कि किस तरह से महंगाई को कम किया जाए ताकि कोरोना की मंदी से ग्रस्त लोगों को कुछ राहत मिल सके।

घरेलू बाजार में कर्ज की लागत कम हुई है। यह बात बिलकुल सही है कि कर्ज लेने की लागत यानी ब्याज दरों में कमी आई है और उद्यमियों को आसानी से सस्ती दरों पर कर्ज मिल रहा है। यही नहीं, पूंजी बाजार में नई कंपनियों के शेयरों को जम कर खरीदा जा रहा है। यानी पूंजी की कमी कहीं नहीं है। पर सवाल दूसरा है। पूंजी भी है, कारोबार भी है, पर मांग नहीं है। मांग हर क्षेत्र में मजबूत नहीं दिख रही है। सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है सेवा क्षेत्र। होटल, पर्यटन स्थल सब अब भी वीरान ही हैं। सिनेमा हाल भी अभी राह ताक रहे हैं कि कब दर्शक आएंगे। ओमीक्रान के कारण तमाम राज्य सरकारों ने माल, सिनेमा हाल आदि पर नए प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए हैं।

महंगाई का अर्थशास्त्र आम आदमी की जेब को चौपट कर रहा है। कोरोना से अर्थव्यवस्था बड़ी हद तक बच गई है, पर महंगाई के असर से बचना आसान नहीं है। इसलिए यह खतरा बना हुआ है कि कहीं महंगाई कई किस्म की आर्थिक संभावनाओं पर पानी ना फेर दे। विश्व स्वास्थ्य संगठन के ताजा बयानों के अनुसार ओमीक्रान को हलके में नहीं लिया जाना चाहिए। ओमीक्रान के मामले लगातार बढ़ने से यह सवाल तमाम राज्य सरकारों के सामने अहम हो गया है कि फिर से पूर्णबंदी लगाई जाए या नहीं।

लेकिन यहां दूसरा सवाल खड़ा होता है कि रोज कमाने-खाने वालों का क्या होगा? फिर तमाम कंपनियों के कारखाने बंद होने पर आय के साधन अवरुद्ध होते हैं, कर संग्रह समेत तमाम आर्थिक कारकों पर समग्र पूर्णबंदी का असर पड़ेगा। इसीलिए उद्योगों की प्रतिनिधि संस्था फिक्की ने वाणिज्य और उद्योग मंत्री को लिखे एक पत्र में लिखा है कि ओमीक्रान बहुत संक्रामक है, पर इसके बावजूद इसमें अस्पताल में भर्ती कराने की नौबत कम ही आ रही है, पहले के मुकाबले। यानी कुल मिलाकर संतुलन की जरूरत है। कोरोना जनित समग्र पूर्णबंदी को अब देश नहीं झेल सकता है, जीविका बनाम जीवन के समीकरण में संतुलन की जरूरत है।

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