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भूकम्प से निपटने की चुनौती

भूकम्प के लिए कुछ क्षेत्र बेहद संवेदनशील हैं और यहां जीवन पर खतरा हमेशा मंडराता रहता है। ये वे क्षेत्र हैं जहां वलन (फोल्डिंग) और भ्रंश (फाल्टिंग) जैसी हिलने की घटनाएं सर्वाधिक होती हैं।
Author नई दिल्ली | April 18, 2016 02:23 am
जापान में आए भूकंप के बाद प्रभावित इलाके में बचाव कार्य में जुटे राहतकर्मी। (फोटो- रॉयटर्स/क्यो़डो)

पिछले एक सप्ताह में जापान और भारत में आए भूकम्पों ने एक बार फिर हमें इस पर सोचने के लिए विवश किया है कि क्या भूकम्प की आवृत्ति बढ़ रही है, और दूसरे यह कि इसका सामना करने के लिए हमारी तैयारियां कितनी पुख्ता हैं। बीते शुक्रवार और गुुरुवार को आए दो शक्तिशाली भूकम्पों ने जापान के कुमामाटो प्रांत को हिला कर रख दिया। दो दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों लोग घायल हो गए। इससे पहले म्यांमा सीमा के निकट आया शक्तिशाली भूकम्प भले ही त्रासदी का सबब न बना हो, पर उसके झटके ने पूर्वोत्तर राज्यों समेत पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड के लोगों को डरा दिया। गौर करें, रिक्टर स्केल पर इस भूकम्प की तीव्रता 6.8 मापी गई जो एक भीषण तबाही ला सकती थी। याद होगा जनवरी माह में पूर्वोत्तर में आए भीषण भूकम्प की तीव्रता भी रिक्टर पैमाने पर 6.8 ही थी, जिसमें डेढ़ दर्जन लोग मारे गए और सैकड़ों लोग घायल हो गए।

हालांकि पिछले दिनों आए भूकम्प से जान-माल के नुकसान की खबर नहीं है लेकिन दो बातें गौर करने वाली हैं। एक यह कि पूर्वोत्तर समेत समूचा भारत भूकम्प की जद में है और दूसरा यह कि भूकम्प से निपटने की चुनौती जस की तस बरकरार है। अभी तक भूकम्प के पूवार्नुमान लगाने के भरोसेमंद उपकरण विकसित नहीं किए जा सके हैं। अलबत्ता इस दिशा में वैज्ञानिक सक्रिय हैं और अच्छी बात यह है कि रूस और जापान में आए अनेक भूकम्पों के पर्यवेक्षणों से पूवार्नुमान के संकेत सामने आने लगे हैं। गौरतलब है कि भूकम्प के लिए कुछ क्षेत्र बेहद संवेदनशील हैं और यहां जीवन पर खतरा हमेशा मंडराता रहता है। ये वे क्षेत्र हैं जहां वलन (फोल्डिंग) और भ्रंश (फाल्टिंग) जैसी हिलने की घटनाएं सर्वाधिक होती हैं।

विश्व के भूकम्प क्षेत्र मुख्य रूप से दो तरह के भागों में हैं। एक, परिप्रशांत (सर्कम पैसिफिक) क्षेत्र जहां नब्बे फीसद भूकम्प आते हैं, और दूसरे, हिमालय व आल्पस क्षेत्र। भारत के भूकम्प क्षेत्रों का देश के प्रमुख प्राकृतिक भागों से घनिष्ठ संबंध है। विशेषकर हिमालयी क्षेत्र भूसंतुलन की दृष्टि से एक अस्थिर क्षेत्र है। यह अब भी अपने निर्माण की अवस्था में है। यही वजह है कि इस क्षेत्र में सबसे अधिक भूकम्प आते हैं। वैसे तो भूकम्प के कई कारण हैं लेकिन भारत और यूरेशिया प्लेटों के बीच टकराव हिमालयी क्षेत्रों में भूकम्प का प्रमुख कारण है। ये प्लेटें चालीस से पचास मिमी प्रतिवर्ष की गति से चलायमान हैं। इस प्लेट की सीमा विस्तृत है। यह भारत में उत्तर में सिंधु-सांगपो सुतुर जोन से दक्षिण में हिमालय तक फैली है। यूरेशिया प्लेट के नीचे उत्तर की ओर स्थित भारत प्लेटों की वजह से पृथ्वी पर यह भूकम्प के लिहाज से सबसे संवेदनशील क्षेत्र है।

वैज्ञानिकों की मानें तो कश्मीर से पूर्वोत्तर तक का इलाका भूकम्प की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। इसमें हिमाचल, असम, अरुणाचल प्रदेश, कुमाऊं व गढ़वाल समेत पूरा हिमालयी क्षेत्र शामिल है। निश्चित रूप से उत्तरी मैदानी क्षेत्र भयावह भूकम्प के दायरे से बाहर हैं लेकिन पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बारे में बताया गया है कि भूगर्भ की दृष्टि से ये क्षेत्र बेहद संवेदनशील है। दरअसल, इस मैदानी क्षेत्र की रचना जलोढ़ मिट्टी से हुई है और हिमालय के निर्माण के समय सम्पीड़न के फलस्वरूप इस मैदानी क्षेत्र में कई दरारें बन गई हैं। यही वजह है कि भूगर्भिक हलचलों से यह क्षेत्र शीघ्र ही कंपित हो जाता है। अगर इस क्षेत्र में भूकम्प आता है तो भीषण तबाही मच सकती है।

भीषण भूकम्पों से भारत में अनगिनत बार जनधन की भारी तबाही मच चुकी है। 11 दिसंबर 1967 को कोयना के भूकम्प से सड़कें तथा बाजार वीरान हो गए। हरे-भरे खेत ऊबड़-खाबड़ भू-भागों में तब्दील हो गए। हजारों व्यक्तियों की मृत्यु हुई। अक्तूबर, 1991 में उत्तरकाशी और 1992 में उस्मानाबाद और लातूर के भूकम्पों में हजारों व्यक्तियों की जानें गर्इं और अरबों रुपए की संपत्ति का नुकसान हुआ। उत्तरकाशी के भूकम्प में लगभग पांच हजार लोग काल-कवलित हुए। 26 जनवरी 2001 को गुजरात के कच्छ में आए भूकम्प से तीस हजार से अधिक लोगों की जानें गर्इं।

गौर करें तो अमूमन हर वर्ष देश को कहीं न कहीं भूकम्प का सामना करना पड़ता है। लेकिन विडंबना यह है कि भूकम्प से बचाव का कारगर तरीका ढूंढ़ा नहीं जा सका है। उचित होगा कि वैज्ञानिक बिरादरी न सिर्फ भूकम्प के पूवार्नुमान के भरोसेमंद उपकरण विकसित करे बल्कि यह भी आवश्यक है कि भवन-निर्माण में ऐसी तकनीकी का विकास करे जिससे इमारतें भूकम्प के भीषण झटके को झेल सकें। गौरतलब है कि भूकम्प में सर्वाधिक नुकसान भवनों इत्यादि के गिरने से होता है। दुनिया के सर्वाधिक भूकम्प जापान में आते हैं। इसलिए उसने अपनी ऐसी आवास-व्यवस्था विकसित की है जो भूकम्प के अधिकतर झटकों को सहन कर लेती है। सरकार व स्वयंसेवी संस्थाओं को चाहिए कि वे आपदा के समय किए जाने वाले कार्य तथा व्यवहार के बारे में जनता को प्रशिक्षित करें। बेहतर तो यह होगा कि मानव जाति प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए प्रकृति से सामंजस्य बिठाए। पर विडंबना है कि विकास की अंधी दौड़ में मानव प्रकृति से कोसों दूर ही नहीं चला गया है बल्कि उसके विनाश पर आमादा है।

यह तथ्य है कि अंधाधुंध विकास के नाम पर मानव प्रतिवर्ष सात करोड़ हेक्टेयर वनों का विनाश कर रहा है। पिछली कुछ शताब्दियों में उसके हाथों प्रकृति की एक तिहाई से अधिक प्रजातियां नष्ट हुई हैं। जंगली जीवों की संख्या में पचास फीसद की कमी आई है। जैव विविधता पर संकट है। वनों के विनाश से प्रतिवर्ष 2 अरब टन अतिरिक्त कार्बन-डाइऑक्साइड वायुमंडल में घुल-मिल रहा है। बिजली उत्पादन के लिए नदियों के सतत प्रवाह को रोक कर बांध बनाए जाने से पारिस्थितिकीय संकट खड़ा हो गया है। जलस्रोतों के दोहन की गति उनके सालाना पुनर्भरण के मुकाबले कई गुना बढ़ गई है। पेयजल और कृषिजल का संकट गहराने लगा है। भारत की गंगा और यमुना जैसी अनगिनत नदियां सूखने के कगार पर हैं। वे प्रदूषण से कराह रही हैं। सीवर का गंदा पानी और औद्योगिक कचरा बहाने के कारण क्रोमियम और मरकरी जैसे घातक रसायनों से उनका पानी जहर बनता जा रहा है।

जल संरक्षण और प्रदूषण निवारण पर ध्यान नहीं दिया गया तो दो सौ सालों में भूजल स्रोत सूख जाएगा। किंतु भोग में डूबा मानव इन संभावित आपदाओं से बेफिक्र है। नतीजतन उसे मौसमी परिवर्तनों मसलन ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन क्षरण, ग्रीनहाउस प्रभाव, भूकम्प, भारी वर्षा, बाढ़ और सूखे जैसी अनेक विपदाओं से जूझना पड़ रहा है। हालांकि प्रकृति में हो रहे बदलाव से मानव जाति चिंतित है और इसके लिए 1972 में स्टाकहोम सम्मेलन, 1992 में जेनेरियो, 2002 में जोंहासबर्ग, 2006 में मांट्रियाल, 2007 में बैंकॉक और 2015 में पेरिस सम्मेलनों के जरिए चिंता जताई गई। पर्यावरण संरक्षण के लिए कई कानून भी बनाए गए। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह कि उन पर अमल नहीं हो रहा है और मानव अपने दुराग्रहों के साथ है। लिहाजा, उसे प्रकृति की तीखी प्रतिक्रियाएं झेलनी पड़ रही हैं।

समझना होगा कि प्रकृति सार्वकालिक है। मनुष्य अपनी वैज्ञानिकता के चरम बिंदु पर क्यों न पहुंच जाए, उसका एक छोटा-सा दुस्साहस भी सभ्यता का सर्वनाश कर सकता है। लेकिन विडंबना है कि मनुष्य प्रकृति की भाषा और व्याकरण को समझने को तैयार नहीं। वह अपनी समस्त ऊर्जा प्रकृति को ही अपने अधीन करने में झोंक रहा है। लेकिन यह समझना होगा कि जब तक प्रकृति से एकरसता स्थापित नहीं होगी तब तक प्रकृति का कोपभाजन बनना होगा। गौरतलब है कि सिंधु घाटी की सभ्यता हो या मिस्र की नील नदी घाटी सभ्यता या दजला-फरात हो या ह्वांगहो घाटी की सभ्यता, सभी में प्रकृति के प्रति एकरसता थी। इन सभ्यताओं के लोग प्रकृति को ईश्वर का प्रतिरूप मानते थे। इन सभ्यताओं में वृक्ष पूजा और नागपूजा के स्पष्ट प्रमाण हैं। यह इस बात का संकेत है कि हजारों वर्ष पूर्व मानव जाति प्रकृति के निकट और सापेक्ष थी। उसकी प्रकृति से समरसता और आत्मीयता थी। उसकी सोच व्यापक और उदार थी।

मौजूदा समय में भी स्वयं को बचाने के लिए प्रकृति के निकट जाना होगा। यह समझना होगा कि अमेरिका, जापान, चीन और कोरिया, जिनकी वैज्ञानिकता और तकनीकी क्षमता का दुनिया लोहा मानती है, वे भी प्रकृति के कहर के आगे घुटने टेक चुके हैं। अलास्का, चिली और कैरेबियाई द्वीप हैती में आए भीषण भूकम्प की बात हो या जापान में सुनामी के कहर की, बचाव के वैज्ञानिक उपकरण धरे के धरे रह गए। लेकिन विडंबना है कि इस ज्ञान के बावजूद इक्कीसवीं सदी का मानव प्रकृति की भाषा को समझने को तैयार नहीं। उसका एकमात्र चरम लक्ष्य प्रकृति की चेतना को चुनौती देकर अपनी श्रेष्ठता साबित करना है। पर मानव को समझना होगा कि उसका यह आचरण समष्टि विरोधी है। प्रकृति पर प्रभुत्व की लालसा विनाश का रास्ता है। मानव जाति को समझना होगा कि आए दिन आ रहे भूकम्प प्रकृति की एक छोटी-सी प्रतिक्रिया भर है। अगर मानव जाति ने प्रकृति के प्रति अपने क्रूरता का परित्याग नहीं किया तो उसके सामने वजूद का संकट खड़ा हो सकता है।

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