खतरा बनता ई-कचरा

ई-कचरे का प्रबंधन एक जटिल प्रक्रिया है और बड़ी चुनौती भी।

इलेक्‍ट्रानिक कचरा बनी समस्‍या।

सुशील कुमार सिंह

ई-कचरे का प्रबंधन एक जटिल प्रक्रिया है और बड़ी चुनौती भी। भारत में ई-कबाड़ प्रबंधन नीति 2011 से ही उपलब्ध है। साल 2016 और 2018 में इसके दायरे का विस्तार भी किया गया था। मगर जमीनी हकीकत यह है कि इस पर अमल की स्थिति निराशाजनक ही रही है।

हमारे जीवन के हर पहलू में प्रौद्योगिकी का दखल बढ़ता जा रहा है। इतना ही नहीं, तकनीक के बूते दुनिया आसमान भी छू रही है। सभ्यता और तकनीक की बेहद ऊंचाई पर पहुंची दुनिया अब ई-कचरे से परेशान है। दुनिया भर में जैसे-जैसे इलेक्ट्रानिक उत्पादों की मांग बढ़ रही है, वैसे-वैसे इलेक्ट्रानिक कचरा भी तेजी से बढ़ रहा है।

हम अपने घरों और उद्योगों में जिन बिजली और इलेक्ट्रानिक सामान को इस्तेमाल के बाद फेंक देते हैं, वही कबाड़ ई-कचरे की संज्ञा में आता है। वैश्विक ई-कचरे की स्थिति को लेकर संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट बताती है कि 2019 में पांच करोड़ छत्तीस लाख मीट्रिक टन इलेक्ट्रानिक कचरा पैदा हुआ था। हैरत यह भी है कि 2030 तक इसकी मात्रा बढ़ कर करीब साढ़े सात करोड़Þ मीट्रिक टन पहुंच जाने का अनुमान है।

पूरी दुनिया में ई-कचरे को यदि महाद्वीपों के आधार पर बांट कर देखा जाए तो तो एशिया में दो करोड़ उनचास लाख टन, अमेरिका में एक करोड़ इकतीस लाख टन, यूरोप में एक करोड़ बीस लाख टन और अफ्रीका में उनतीस लाख टन ई-कचरा हर साल निकलता है। आस्ट्रेलिया में इसकी मात्रा सात लाख टन है। अनुमान तो यह भी है कि डेढ़ दशक के भीतर दुनिया में इसकी मात्रा दोगुनी हो जाएगी। भारत जैसे विकासशील देश में जहां बिजली और इलेक्ट्रानिक वस्तुएं जनसंख्या के एक बहुत बड़े हिस्से तक अभी पूरी तरह पहुंची ही नहीं है, बावजूद इसके दस लाख टन से अधिक कचरा हर साल तैयार हो रहा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की दिसंबर-2020 की रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया गया है।

गौरतलब है कि ई-कचरे का प्रबंधन एक जटिल प्रक्रिया है और बड़ी चुनौती भी। भारत में ई-कबाड़ प्रबंधन नीति 2011 से ही उपलब्ध है। साल 2016 और 2018 में इसके दायरे का विस्तार भी किया गया था। मगर जमीनी हकीकत यह है कि इस पर अमल की स्थिति निराशाजनक ही रही है। रोचक यह भी है कि देश में उत्पन्न कुल ई-कचरे का महज पांच फीसद ही पुनर्चक्रण केंद्रों के जरिए प्रसंस्करित किया जाता है। जाहिर है, बाकी बचा हुआ पनचानवे फीसद ई-कबाड़ का निस्तारण अनौपचारिक क्षेत्र के हवाले है।

इस बात का गहराई से विश्लेषण करने की जरूरत है कि ई-कबाड़ प्रबंधन को कैसे दुरुस्त किया जाए। दो टूक यह है कि इस काम में गैर-सरकारी संगठनों की मदद लेना प्रभावशाली रहेगा। देखा जाए तो सरकार ने साल 2008 में सामान्य कबाड़ प्रबंधन नियम लागू किया था। इन नियमों में ई-कचरा के प्रबंधन को लेकर जिम्मेदार ढंग से काम करने की बात भी निहित थी। हालांकि तब समस्या इतनी बड़ी नहीं थी।

गौरतलब है कि ई-कचरा तब पैदा होता है जब किसी उत्पाद का उपयोगकर्ता यह तय करता है कि इस सामान का उसके लिए कोई उपयोग नहीं रह गया है। मौजूदा समय में भारत में एक सौ छत्तीस करोड़ की आबादी में लगभग एक सौ बीस करोड़ मोबाइल फोन हैं। जब ये इस्तेमाल के लायक नहीं रहते, तो जाहिर है ई-कचरे के ही एक रूप में सामने आते हैं। गौरतलब है कि भारत में 2025 तक इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की तादाद नब्बे करोड़ हो जाएगी। फिलहाल यह संख्या पैंसठ करोड़ के आसपास है।

भारत में ई-कचरे की मात्रा 2014 में सत्रह लाख टन थी, जो अगले ही साल 2015 में उन्नीस लाख टन हो गई थी। संदर्भ निहित बात यह भी है कि राष्ट्रीय ई-कबाड़ कानून के अंतर्गत इलेक्ट्रानिक वस्तुओं का प्रबंधन औपचारिक संग्रह के जरिए ही किया जाना चाहिए, क्योंकि इस तरह से इकट्ठे किए गए कबाड़ को विशेष प्रसंस्करण केंद्र में ले जाया जा सकता है, जहां इसका पुनर्चक्रण करते समय पर्यावरण और स्वास्थ्य को भी ध्यान में रखना संभव है।

हालांकि इस मामले में भारत की स्थिति खराब है। साल 2018 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने न्यायाधिकरण को बताया था कि भारत में ई-कचरे का पनचानवे फीसद पुनर्चक्रण अनौपचारिक क्षेत्र द्वारा किया जाता है। इतना ही नहीं, अधिकांश कवाड़ी इसका निपटान इसे जला कर या तेजाब के इस्तेमाल से करते हैं।

रोचक तथ्य यह भी है कि इलेक्ट्रानिक उत्पादों के चलते ही ई-शासन को ताकत मिलती है जो सुशासन को सशक्त बनाने के काम आता है। मगर जब यही इलेक्ट्रानिक वस्तुएं उपयोगिता खत्म हो जाने के बाद कूड़ेदान में डाल दी जाती हैं तो यह ई-कचरे के रूप में मुसीबत का सबब बन जाती हैं। आंकड़ों से पता चलता है कि भारतीय इलेक्ट्रानिक क्षेत्र ने इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में जबर्दस्त प्रगति की।

2004-2005 में 11.5 अरब अमेरिकी डालर से यह क्षेत्र 2009-2010 में बत्तीस अरब अमेरिकी डालर पर पहुंच गया। गौरतलब है कि इन्हीं दिनों में इलेक्ट्रानिक वस्तुओं के स्वदेश में उत्पादन और आयात में आई वृद्धि के साथ ई-कचरे ने भी समृद्धि हासिल कर ली। इसी के चलते इस क्षेत्र पर नियामक नियंत्रण की आवश्यकता महसूस की जाने लगी और भारत में ई-कचरा प्रबंधन नीति 2011 लाई गई।

विकसित देशों में देखा गया है कि ई-कचरे के पुनर्चक्रण का खर्च ज्यादा बैठता है। इन देशों में टूटे और खराब उपकरणों के प्रबंधन व निस्तारण के लिए कंपनियों को भुगतान करना पड़ता है। वैसे देखा जाए तो नीतिगत बदलाव के जरिए इन क्षेत्रों को औपचारिक बनाने की लगातार कोशिश की गई है। मगर जमीनी स्तर पर इस प्रयास को लेकर कठिनाई अभी भी बरकरार हैं।

दरअसल ई-कचरा निपटान से जुड़ी समस्या में कुछ महत्त्वपूर्ण बिंदुओं पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है। इस मामले में पहला मुद्दा तो मूल्य का है। साथ ही औपचारिक केंद्रों में पुनर्चक्रण की तुलना में असंगठित क्षेत्र में चलने वाले कचरा निपटान केंद्रों में खर्च कम आता है। जाहिर है ई-कचरा पुनर्चक्रण शृंखला को बिना मजबूती दिए बिना इस कबाड़ से निपटना संभव नहीं हैं। ऐसा करने के लिए सख्त निगरानी, अनुपालन और उसकी क्षमता के सर्वोत्तम उपयोग के अलावा वैश्विक सहयोग की आवश्यकता पड़ सकती है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पूरे देश में लाखों टन ई-कचरे में से तीन से दस फीसद कचरा ही इकट्ठा किया जाता है। इसके निस्तारण का कुछ नैतिक तरीका भी हो सकता है, जैसे जरूरतमंदों को पुराना कंप्यूटर, मोबाइल या अन्य इलेक्ट्रानिक पदार्थ फेंकने के बजाय भेंट कर देना या फिर कंपनियों को वापस कर देना और कुछ न हो सके तो सही निस्तारण की राह खोजना। दुविधा भरी बात यह है कि भारत में हरित विकास की अवधारणा अभी जोर नहीं पकड़ पाई है, मगर ई-कचरा पसरता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन से निपटने में चुनौतियां सामने खड़ी हैं।

वैश्विक तापमान में आई लगातार वृद्धि से दुनिया जूझ रही है। उक्त तमाम मुद्दों से अभी सुशासन की लकीर खींच पाने में सफल नहीं हुए कि ई-कचरा पर्यावरण और स्वास्थ्य को नई चुनौती की ओर धकेल रहा है। परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण यही बताते हैं कि धरा को धरोहर की तरह बनाए रखने की जिम्मेदारी सभी की हैं। तकनीक के सहारे जीवन आसान होना सौ टके का संदर्भ है। मगर लाख टके का सवाल यह भी है कि रोजाना तीव्र गति से उत्पन्न हो रहा ई-कचरा उसी आसान जीवन को नई समस्या की ओर ले जाने में कारगर भी हैं।

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