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राजनीतिः सुशासन और संसाधन

जब तक ग्रामीण इलाकों में कम्प्यूटर या मोबाइल उपकरण और इंटरनेट के प्रयोग के प्रसार को बल नहीं मिलेगा, डिजिटल असमानता को दूर नहीं किया जा सकेगा। जब तक देश के नागरिकों को डिजिटल साक्षर नहीं किया जाएगा, तब तक ई-शासन अपने लक्ष्य से दूर रहेगा। स्थानीय भाषाओं, वेब सर्वर का विकास, ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में तकनीक के विस्तार पर बल से ई-गवर्नेंस को बल मिलेगा।

भारत में साइबर जाल अभी तक न पूरी तरह बिछा है और न सबकी पहुंच में है।

सुशील कुमार सिंह

सुशासन की दरकार लंबे समय से महसूस की जा रही है। ऐसे में ई-गवर्नेंस कारगर उपाय साबित हो सकता है। यह एक ऐसा क्षेत्र है और एक ऐसा साधन भी, जिसके चलते नौकरशाही का समुचित प्रयोग करके व्याप्त कठिनाइयों को समाप्त किया जा सकता है। नागरिकों को सरकारी सेवाओं की बेहतर आपूर्ति, प्रशासन में पारदर्शिता बढ़ाने के साथ व्यापक नागरिक भागीदारी के मामले में ई-शासन कहीं अधिक प्रासंगिक है। यह तकनीक शासन-प्रशासन को तीव्रता देती और संचालन को प्रभावित करती है। प्रौद्योगिकी मानवीय पसंद और विकल्पों द्वारा निर्धारित परिवर्तन का अनुमान ही नहीं, बल्कि एक सशक्त परिणाम भी ई-शासन से पाया जा सकता है। पर इस दिशा में अभी और काम करने की जरूरत है। ऐसे समावेशी विकास पर बल देने की जरूरत है, जो इलेक्ट्रॉनिक सेवाओं, उत्पादों, उपकरणों और रोजगार के अवसरों समेत किसानों से संबंधित बुनियादी तत्वों को अपेक्षित बढ़ावा दे सके।

गौरतलब है कि 1992 में आठवीं पंचवर्षीय योजना समावेशी विकास की धुरी पर आगे बढ़ी थी और इसी वर्ष भारत में सुशासन की नींव पड़ी थी। 1991 के उदारीकरण के बाद जिस अपेक्षा और अवधारणा के अंतर्गत भारत आर्थिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से युक्त होकर नागरिक केंद्रित धारा के साथ आगे बढ़ा था, उसका प्रवाह उतना सकारात्मक नहीं दिखाई दिया। ई-गवर्नेंस लागू करने संबंधी तकनीकी अवसंरचना, महत्त्वपूर्ण मुद्दों की पहचान, कुशल मानव संसाधन और ई-साक्षर नागरिकों की आवश्यकता पड़ती है। हालांकि 2006 में राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना के चलते कॉमन सर्विस सेंटरों के जरिए आम नागरिकों को सभी सरकारी सेवाओं तक पहुंच प्रदान करते हुए सक्षमता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चत करने का प्रयास हुआ था, जो आज भी पूरा नहीं है।

नीतियां कितनी भी शोधपरक हों, मगर जिस माध्यम से उनका क्रियान्वयन होना है, अगर उसकी आधारभूत संरचना में कमियां हों, तो नीतियों को जनकेंद्रित बना पाना मुश्किल होता है। देश में साढ़े छह लाख गांव और ढाई लाख पंचायतें हैं, जहां बिजली और इंटरनेट कनेक्टिविटी एक आम समस्या है। इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन आॅफ इंडिया से यह जानकारी मिलती है कि भारत में पूरी दुनिया के मुकाबले सबसे सस्ता इंटरनेट शुल्क है, मगर कड़वी सच्चाई यह भी है कि यहां दो-तिहाई जनता इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करती। 2017 तक भारत में केवल चौंतीस फीसद आबादी इंटरनेट का इस्तेमाल करती थी। संख्या की दृष्टि से इस समय यह आंकड़ा पचपन करोड़ पार कर गया है, जिसके 2025 तक नब्बे करोड़ होने की संभावना जताई गई है। एक सौ तीस करोड़ जनसंख्या वाले भारत में लगभग एक सौ चौदह करोड़ से अधिक मोबाइल उपभोक्ता हैं, जबकि इंटरनेट वालों की संख्या कहीं अधिक पीछे है। वैसे इन आंकड़ों में कुछ संख्या दो या तीन मोबाइल रखने वालों की भी होगी। इंटरनेट का उपयोग न होने के पीछे लोगों की आर्थिक स्थिति भी जिम्मेदार है। भारत में हर चौथा व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे है और इतने ही अशिक्षित भी। इसके अलावा कई व्यावहारिक कठिनाइयों के चलते इंटरनेट कनेक्टिविटी दूर की कौड़ी बनी हुई है। इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बिजली के आभाव में संचालित नहीं किए जा सकते। नगरीय क्षेत्रों में भले बिजली जरूरतों को पूरा कर देती हो, मगर गांव और दूर-दराज के इलाकों में इसका अभाव ई-शासन को प्रभावित कर रहा है।

वाणिज्य मंत्रालय द्वारा स्थापित ट्रस्ट इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन की रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत दुनिया में बिजली उत्पादन के मामले में तीसरा देश है और खपत में पहला। भले जापान और रूस से बिजली उत्पादन के मामले में भारत आगे है, मगर सभी तक इसकी पहुंच पूरी तरह संभव नहीं है और इसका सीधा असर मोबाइल और इंटरनेट सेवा पर पड़ रहा है, जो ई-शासन की राह मुश्किल बनाए हुए है।

कोविड-19 के इस समय में शिक्षा बहुत बड़ी मुश्किल का सामना कर रही है। इससे निपटने के लिए स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों में डिजिटल यानी ई-शिक्षा का रास्ता चुना गया है। यहां भी इंटरनेट कनेक्टिविटी और बिजली की समस्या काफी हद तक रुकावट बनी। देखा जाए, तो ई-शासन के उदय के पीछे शासन का जटिल होना और सरकार से नागरिकों की अपेक्षाओं में वृद्धि ही रही है। जबकि इसका उद्देश्य आॅनलाइन सेवाओं की आपूर्ति करना है, नागरिकों को बेहतर सेवा प्रदान करना, पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देना, शासन दक्षता में सुधार सहित व्यापार और उद्योग के साथ तमाम प्रक्रियागत संदर्भों को तीव्रता देना शामिल था। जबकि ई-शासन के चार स्तंभों में नागरिक, प्रक्रिया, प्रौद्योगिकी और संसाधन निहित हैं।

आज विश्व के विभिन्न देशों के बीच सिमटती दूरियों का कारण सूचना प्रौद्योगिकी और संचार को माना जाता है, जबकि देश के भीतर सेवा आपूर्ति में तत्परता और नागरिकों को शीघ्र खुशियां देने के लिए ई-शासन को देखा जा सकता है। किसानों के खाते में सम्मान निधि का स्थानांतरण इसका एक छोटा-सा उदाहरण है। ई-लर्निंग, ई-बैंकिंग, ई-अस्पताल, ई-याचिका और ई-अदालत समेत कई ऐसे क्षेत्र देखे जा सकते हैं, जो शासन को सुशासन की ओर ले जाते हैं। ई-गवर्नेंस को बढ़ावा देने की दिशा में 1987 में लांच राष्ट्रीय उपग्रह आधारित कम्प्यूटर नेटवर्क (एनआईसीएनईटी) एक क्रांतिकारी कदम था, जिसका मुखर पक्ष 1991 के उदारीकरण के बाद देखने को मिला। मगर आधारभूत कमियों के चलते यह जिस मात्रा में होना चाहिए, उतना हुआ नहीं। गौरतलब है कि भारत में ई-शासन व्यापक संभावनाओं से भरा हुआ है।

भारत में साइबर जाल अभी तक न पूरी तरह बिछा है और न सबकी पहुंच में है। डिजिटल इंडिया की सफलता के लिए मजबूत आधारभूत संरचना भी तैयार करना जरूरी है। नवंबर 2018 तक करीब एक लाख बीस हजार ग्राम पंचायतों को हाईस्पीड नेटवर्क से जोड़ा गया। इससे न केवल गांवों का डिजिटलीकरण हुआ है, बल्कि वे बुनियादी और समावेशी जरूरतों को भी पूरा कर सकेंगे। शैक्षणिक और शोध संस्थानों के बीच आदान-प्रदान अत्याधुनिक नेटवर्क के माध्यम से किया जा रहा है। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि एक करोड़ से अधिक छात्र-छात्राएं राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पोर्टल से जुड़ चुके हैं। ई-अस्पताल और आॅनलाइन रजिस्ट्रेशन सेवा भी जारी है। देश के तीन सौ से अधिक अस्पतालों में यह व्यवस्था लागू है। इसी तरह मृदा स्वास्थ कार्ड योजना तेरह करोड़ से अधिक जारी किए जा चुके हैं। इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार के अंतर्गत लगभग एक करोड़ किसान जोड़े गए हैं। देश के सोलह राज्यों में लगभग छह सौ से ज्यादा बाजार इस नेटवर्क से जुड़े हैं। ई-वीजा के जरिए भी एक सौ तिरसठ देशों के पर्यटकों को जोड़ने का काम जारी है। अब तक चालीस लाख से अधिक वीजा जारी किए जा चुके हैं। ई-अदालत के जरिए देश भर की विभिन्न अदालतों में चल रहे मुकदमों की निगरानी करना आसान हुआ है।

इनके अलावा देश भर में आम लोगों को डिजिटल साक्षरता प्रदान करना, छोटे शहरों में बीपीओ को बढ़ावा देना, साथ ही रोजगार उद्यमिता और सशक्तिकरण भी देखा जा सकता है। इस कोरोना समय में लगता है कि भारत साइबर जाल के मामले में कमजोर है और यही कमजोरी ई-गवर्नेंस के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही है। विकास के नए आयाम के रूप में ई-गवर्नेंस शासन की आगे की विधा है, मगर रास्ता इसके आगे भी है। जब तक ग्रामीण इलाकों में कम्प्यूटर या मोबाइल उपकरण और इंटरनेट के प्रयोग के प्रसार को बल नहीं मिलेगा, डिजिटल असमानता को दूर नहीं किया जा सकेगा। जब तक देश के नागरिकों को डिजिटल साक्षर नहीं किया जाएगा, तब तक ई-शासन अपने लक्ष्य से दूर रहेगा। स्थानीय भाषाओं, वेब सर्वर का विकास, ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में तकनीक के विस्तार पर बल से ई-गवर्नेंस को बल मिलेगा।

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