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राजनीतिः ई-सिगरेट भी कम घातक नहीं

भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्य सरकारों को भेजे एक परामर्श में कहा है कि ई-सिगरेट जैसे उत्पाद स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हैं और यह भी संभव है कि बच्चों को अगर एक बार निकोटिन का चस्का लग गया तो वे भी पीने लग जाएंगे। सरकार का यह परामर्श ऐसे समय में आया है जब दिग्गज तंबाकू कंपनियां भारत में अपने स्मोकिंग डिवाइस-आइक्यूओएस -को उतारने की तैयारी कर रही हैं।

लंबे समय से यह बहस चल रही है कि ई-सिगरेट नुकसानदायक है या नहीं। इस बारे में एक नहीं, कई शोध हुए हैं और हो रहे हैं। लेकिन सबके नतीजे अलग-अलग हैं। जैसे एक शोध में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि ई-सिगरेट धूम्रपान करने की आदत को कम कर देती है। ई-सिगरेट में जोखिम धूम्रपान के मुकाबले कम रहता है और इसके सेवन से नुकसान कम फायदे ज्यादा हैं। ई-सिगरेट से धूम्रपान करने वालों की संख्या कम हो सकती है। खासतौर पर उन देशों में जहां धूम्रपान करने वालों की संख्या ज्यादा है और जो लोग धूम्रपान छोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। ई-सिगरेट धूम्रपान छोड़ने को प्रोत्साहित करती है। ऐसा देखा गया है कि जो लोग धूम्रपान करना छोड़ ई-सिगरेट पीने लगते हैं, उनके लिए धूम्रपान छोड़ना आसान हो जाता है। बहरहाल, धूम्रपान के बजाय ई-सिगरेट का सेवन करने वाले लोगों में तंबाकू से होने वाले खतरे पांच फीसद कम हो जाते हैं। अमेरिका, कनाडा और इंग्लैंड में पिछले चार-पांच सालों के मुकाबले दो सालों में धूम्रपान करने वालों की संख्या में कमी आई है। वहीं पिछले दो सालों में ई-सिगरेट पीने का चलन भी बढ़ा है।

आजकल ई-सिगरेट का सेवन आमतौर पर वही लोग कर रहे हैं जो पहले धूम्रपान करते थे। ‘जरनल एडिक्शन’ में प्रकाशित इस शोध में पाया गया कि ई-सिगरेट से धूम्रपान करने वालों की संख्या में कमी आई है। हालांकि शोधकर्ताओं ने इस बात के लिए भी चेताया है कि ई-सिगरेट पर बहुत ज्यादा पाबंदी और टैक्स बढ़ाने से लोग ई-सिगरेट का इस्तेमाल नहीं करेंगे और इसके होने वाले फायदे खत्म हो सकते हैं। लेकिन इसका यह अर्थ कतई न लगाएं कि हम युवा और वयस्कों, जो धूम्रपान का सेवन नहीं करते, के लिए ई-सिगरेट को बढ़ावा दे रहे हैं। तंबाकू नियंत्रण नीति के तहत सिगरेट आसानी से मिलने पर पाबंदी होनी चाहिए जिससे सिगरेट छोड़ने में आसानी हो।

अगर आप ई-सिगरेट को सुरक्षित मानते हैं तो अपनी धारणा बदल लीजिए, क्योंकि एक नए अध्ययन में पता चला है कि इसमें भी वही जहरीले रासायनिक पदार्थ होते हैं जो तंबाकू के धुएं में पाए जाते हैं। इससे फेफड़ों का जीवाणुरोधी रक्षा तंत्र बाधित होता है। अमेरिका के नॉर्थ कैरोलिना विश्वविद्यालय में किए गए एक शोध में पता चला है कि सिगरेट के धुएं में पाए जाने वाले जहरीले एल्डिहाइड की तरह ही ई-सिगरेट में मौजूद रासायनिक पदार्थ सिन्नामेल्डिहाइड का उपयोग सामान्य कोशिका को नुकसान पहुंचाता है। इससे सांस संबंधी बीमारियां हो सकती हैं। शोध में पता चला है कि सिन्नामेल्डिहाइड मनुष्य के शरीर में सांस के जरिए सामान्य हवा की आवाजाही को बाधित करता है जिससे यह पता चलता है कि ई-सिगरेट में उपयोग होने वाला एक सामान्य फ्लेवर फेफड़ों के महत्त्वपूर्ण रक्षा तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है। सिन्नामेल्डिहाइड एक ऐसा रसायन है जिसमें दालचीनी जैसा स्वाद और गंध होती है। हाल के वर्षों में ई-सिगरेट पारंपरिक सिगरेट के मुकाबले सुरक्षित विकल्प के रूप में उभरा है, क्योंकि इसमें तंबाकू के बिना ही धूम्रपान करने जैसा एहसास होता है। फिर भी इसकी लत खतरनाक है। विश्व स्वास्थ संगठन (डब्लूएचओ) के अनुसार धूम्रपान की वजह से हर साल लगभग साठ लाख लोग मारे जा रहे हैं और इनमें से अधिकतर मौतें कम और मध्यम आय वाले देशों में हो रही हैं। डब्लूएचओ के मुताबिक अगर ऐसा ही चलता रहा तो वर्ष 2030 में प्रति वर्ष धूम्रपान की वजह से मारे जाने वाले लोगों की संख्या बढ़ कर अस्सी लाख हो जाएगी। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि धूम्रपान पर किसी न किसी तरह लगाए गए प्रतिबंधों से बानवे देशों के सवा दो अरब लोगों को लाभ हुआ है।

पश्चिमी देशों में धूम्रपान करने वालों की संख्या तेजी से कम हुई है। लेकिन भारत में इसका उल्टा हो रहा है। आज का युवा वर्ग, तनाव और अपनी पहचान बनाने के लिए जूझ रहा है। देश के पचास फीसद से भी अधिक युवा धूम्रपान करते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि यह तनाव को कम करता है। एक सर्वेक्षण से पता चला है कि बावन फीसद से अधिक युवाओं का मानना है कि धूम्रपान से एकाग्रता बढ़ाती है। लेकिन यह पूर्णतया गलत है। भारत सरकार के आंकड़े बताते हैं कि देश में तंबाकू के सेवन से हर साल लगभग नौ लाख लोग मारे जाते हैं। तंबाकू के इस्तेमाल को रोकने के लिए कड़े कानून भी बनाए गए हैं। लेकिन उन्हें सख्ती से अमल में नहीं लाया जाता। यही वजह है कि भारत में धूम्रपान करने वाले करीब दस करोड़ से ज्यादा वयस्क लोग हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक धूम्रपान करने वाले लोगों की संख्या के मामले में भारत सिर्फ चीन से पीछे है।

भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्य सरकारों को भेजे एक परामर्श में कहा है कि ई-सिगरेट जैसे उत्पाद स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हैं और यह भी संभव है कि बच्चों को अगर एक बार निकोटिन का चस्का लग गया तो वे भी पीने लग जाएंगे। सरकार का यह परामर्श ऐसे समय में आया है जब दिग्गज तंबाकू कंपनियां भारत में अपने स्मोकिंग डिवाइस-आइक्यूओएस -को उतारने की तैयारी कर रही हैं। आइक्यूओएस तंबाकू को जलाता नहीं, बल्कि सिर्फ गर्म करता है और उससे निकोटिन वाली भाप निकलती है, न कि धुआं। स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्यों से यह सुनिश्चित करने को कहा है कि ई-सिगरेट और निकोटिन को गर्म करने वाले इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद न तो बेचे जाएं, न तैयार किए जाएं और न ही उनका आयात किया जाए। इनके विज्ञापन पर भी रोक लगाने के निर्देश दिए गए हैं। मंत्रालय का कहना है कि इस तरह के उत्पाद आम लोगों, खासतौर से बच्चों, किशोरों और गर्भवती महिलाओं की सेहत के लिए खतरा हैं। हाल के सालों में भारत सरकार ने तंबाकू के इस्तेमाल को कम करने के लिए कई कदम उठाए हैं। इसके तहत सिगरेट पर लगने वाला कर बढ़ाया गया है। कंपनियों से सिगरेट के पैकेटों पर चेतावनी बड़े शब्दों में लिखने को कहा गया है। साथ ही धूम्रपान छोड़ने के लिए हेल्पलाइन भी बनाई गई हैं। लेकिन इन सब का कोई खास असर नहीं दिखता।

अब तो ई-सिगरेट का चलन शहरों में खूब हो गया है। ई-सिगरेट में भाप बनाने वाला एक यंत्र और एक कंटेनर होता है, जिसमें निकोटीन फ्लेवर वाला द्रव भरा जाता है। जब इसे एक सिरे से खींचा जाता है, तो द्रव भाप बनता है। इस भाप को सांस के साथ अंदर खींचा जा सकता है। ई-सिगरेट बैटरी से चलती है और बैटरी यूएसबी ड्राइव से चार्ज की जा सकती है। अब तो इलेक्ट्रॉनिक सिगार और पाइप भी आने लगे हैं। सिगरेट का मिनी वर्जन भी बाजार में आ चुका है। इस तरह की एक सिगरेट की कीमत करीब आठ सौ रुपए के आसपास होती है। जलते हुए पौधे या तंबाकू के साथ सांस खींचना धूम्रपान कहलाता है, लेकिन ई-सिगरेट में कुछ जलता नहीं है। इसलिए कहा जाता है कि यह कम नुकसानदेह होती है। लेकिन चूंकि द्रव में निकोटीन होता है, इसलिए ई सिगरेट की भी लत लग सकती है। जर्मनी और यूरोप के दूसरे देशों में इस मुद्दे पर गंभीर बहस चल रही है कि क्या ई सिगरेट को धूम्रपान वाले कानून में रखा जाए। अगर उन्हें दूसरी सिगरेटों की तरह ही देखा जाए, तो सार्वजनिक जगहों पर उन पर भी पाबंदी लगनी चाहिए। लेकिन तकनीकी तौर पर ऐसा नहीं हो सकेगा। ई-सिगरेट के द्रव यानी लिक्विड में बहुत से केमिकल होते हैं। इनमें प्रोपेलीन ग्लाइकोल भी है, जो रंगहीन और गंधहीन पदार्थ है। इसका इस्तेमाल दवा कारोबार और टूथपेस्ट में भी होता है। इसलिए इस पर पूरा प्रतिबंध लगाना मुश्किल होगा।

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