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राजनीतिः निरापद नहीं है ई-सिगरेट

ई-सिगरेट से होने वाले नुकसान को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है। महाराष्ट्र सरकार के सर्वे से साबित हो गया है कि ई-सिगरेट से मुंह के कैंसर हो रहे हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय भी इस वस्तुस्थिति से अवगत है। ऐसे में यह कहना कि ई-सिगरेट के सेवन से स्वास्थ्य को कोई नुकसान नहीं होगा, बेमानी है। हालांकि स्वास्थ्य मंत्रालय इस पर प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है, लेकिन अभी तक इस बारे में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

Author June 27, 2018 4:50 AM
सिगरेट बनाने वाली कंपनियों के संगठन टीआइआइ ने ई-सिगरेट पर प्रतिबंध लगाए जाने से इसकी तस्करी बढ़ने की आशंका जताई है।

महाराष्ट्र सरकार राज्य में इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट (ई-सिगरेट) पर पाबंदी लगाने की तैयारी में है, क्योंकि ई-सिगरेट में द्रव के रूप में मौजूद निकोटीन ज्यादा मात्रा में होती है, जिससे कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है। दरअसल, महाराष्ट्र में इसके बढ़ते सेवन के कारण मुंह के कैंसर के रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। हाल में राज्य सरकार और मुंबई के टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल ने एक सर्वे किया था। इसमें चौंकाने वाली बात यह थी कि महिलाओं में सिगरेट पीने की आदत बढ़ी है। पिछले साल दो करोड़ से ज्यादा लोगों में मुंह की जांच की गई थी, जिनमें से ढाई लाख से ज्यादा लोगों में मुंह के कैंसर के लक्षण मिले। सर्वे से पता चलता है कि भारत में ई-सिगरेट पीने का चलन बढ़ा है। मुंबई तो एक उदाहरण भर है। देश के दूसरे प्रदेशों में भी मुंबई की तरह मुंह के कैंसर की जांच करने पर देश में इसके रोगियों की वास्तविक संख्या का पता चल सकता है। बहरहाल, विश्व के साथ-साथ भारत में भी ई-सिगरेट की स्वीकार्यता में इजाफा हुआ है। हालांकि स्वास्थ मंत्रालय इस पर प्रतिबंध लगाने के बारे में विचार कर रहा है, लेकिन अभी तक इस बारे में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

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ई-सिगरेट बैटरी चलित एक ऐसा उपकरण है, जो तरल निकोटीन, प्रोपीलीन ग्लाइकोल, पानी, ग्लिसरीन और फ्लेवर की मदद से सिगरेट पीने जैसा अनुभव देता है। सिगरेट कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन टोबैको इंस्टीट्यूट आॅफ इंडिया (टीआइआइ) के मुताबिक इलेक्ट्रॉनिक निकोटीन डिलिवरी सिस्टम्स (ईएनडीएस) को सामान्य भाषा में ई-सिगरेट कहा जाता है। वर्ष 2003 में एक चीनी फार्मासिस्ट होन लिक ने ई-सिगरेट का आविष्कार किया था, जिसे वर्ष 2004 में बाजार में उतारा गया। होन लिक की कंपनी ने वर्ष 2005 से 2006 में इसकी बिक्री अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शुरू की, जिसका नाम बाद में रूयान रखा गया। रूयान का अर्थ होता है- धूम्रपान के जैसा। ई-सिगरेट सिगार या पाइप जैसे धूम्रपान वाले तंबाकू उत्पादों का एक विकल्प है, जो तंबाकू के धुएं के समान स्वाद वाला होता है और वैसा ही अहसास देता है। इसका आंतरिक आकार लंबी ट्यूब के समान या पेन की तरह होता है, जबकि बाहरी स्वरूप वास्तविक धूम्रपान उत्पादों जैसे सिगरेट, सिगार और पाइप जैसा होता है। ई-सिगरेट के उपकरण का फिर से उपयोग किया जा सकता है। इसके भागों को बदला या फिर से भरा भी जा सकता है।

ई-सिगरेट के जरिए जब कोई कश लेता है तब उसमें लगा एक सेंसर इस प्रवाह को महसूस करके तापक अवयव को सक्रिय कर देता है, जिससे माउथपीस या कार्ट्रिज में मौजूद मसालेदार तरल घोल, जो निकोटीन युक्त होता है वाष्पीकृत हो जाता है। इसके कश में आम सिगरेट की तरह का अहसास होता है। कश लगाने के लिए ई-सिगरेट पीने वालों को तापक अवयव को सक्रिय करने के लिए उसमें लगे एक बटन को दबाना होता है। ई-सिगरेट के अधिकांश मॉडलों में उपकरण के विपरीत छोर पर लगी एक एलईडी भी कश लगाने के दौरान सक्रिय हो जाती है, जिससे मालूम होता है कि ई-सिगरेट को पीया जा रहा है।

सिगरेट बनाने वाली कंपनियों के संगठन टीआइआइ ने ई-सिगरेट पर प्रतिबंध लगाए जाने से इसकी तस्करी बढ़ने की आशंका जताई है। संगठन के मुताबिक ई-सिगरेट पर प्रतिबंध लगाने से इसकी तस्करी को बढ़ावा मिलेगा, जिससे भारत को उन देशों की तुलना में संरचनात्मक नुकसान होगा, जहां ई-सिगरेट के संदर्भ में नियंत्रित नियामकीय नीति है। टीआइआइ का कहना है कि ई-सिगरेट पर प्रतिबंध लगाने से इसके उत्पादों की तस्करी का खतरा पैदा हो सकता है। विश्व स्वास्थ संगठन के आंकड़ों का हवाला देते हुए संगठन ने कहा कि वर्ष 2015 में ई-सिगरेट उत्पादों का वैश्विक बाजार करीब दस अरब डॉलर का था, जो 2030 तक बढ़ कर साठ अरब डॉलर के स्तर को पार कर सकता है। अमेरिका में खाद्य और औषधि प्रशासन (एफडीए) ने ई-सिगरेट को एक औषधि डिलीवरी उपकरण के रूप में वगीकृत किया है। वहां इसकी बिक्री से पहले खाद्य, औषधि व प्रसाधन सामग्री अधिनियम (एफडीसीए) के तहत मंजूरी लेनी होती है। अप्रैल, 2006 में ई-सिगरेट का आगाज यूरोप में हुआ। आॅस्ट्रिया में ‘रूयान’ के विदेशी प्रोमोशन सम्मलेन में आधिकारिक रूप से इसे शुरू किया गया। बाद में इस उत्पाद को यूरोपीय बाजार के अनुकूल बनाया गया और ई-सिगरेट के रूप में ब्रिटेन में इसका विपणन किया जाने लगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने सितंबर, 2008 में कहा कि धूम्रपान की आदत छुड़ाने में ई-सिगरेट एक तर्कसंगत उपाय है। निर्माताओं का भी दावा है कि ई-सिगरेट धूम्रपान का एक सुरक्षित विकल्प है, क्योंकि पारंपरिक सिगरेट में तंबाकू के दहन से पैदा होने वाली अधिकांश हानिकारक सामग्री ई-सिगरेट के तरल में मौजूद नहीं होती है। कैंसरजनक तत्त्व नहीं होने के कारण ई-सिगरेट को सुरक्षित बताने के दावे के बावजूद निर्माता अपने उत्पादों में चेतावनी छापा करते हैं। उनका कहना है कि इसमें निकोटीन होती है। नियमित रूप से तंबाकू पीने वालों की इच्छा में कमी लाने के लिए ई-सिगरेट के उपयोग के प्रभावों पर ईस्ट लंदन विश्वविद्यालय में एक शोध भी किया गया, जिसमें निकोटीन युक्त वाष्प का कश लगाने वालों और बिना निकोटीन के वाष्प का कश लगाने वालों के बीच कोई उल्लेखनीय फर्क नहीं पाया गया। रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया कि ई-सिगरेट निकोटीन से संबंधित लक्षण कम करने में प्रभावी हो सकता है।

हालांकि निर्माता निकोटीन की लत में कमी लाने के एक उपाय के रूप में इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट का विपणन करते हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठनों का कहना है कि इस तरह से इसका विपणन नहीं किया जा सकता है। इन उत्पादों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों के संबंध में अनेक नियामक एजंसियों ने चेतावनी जारी की है। जाहिर है, ये एजेंसियां मानती हैं कि ई-सिगरेट कतई निरापद नहीं है; इससे सेहत को गंभीर खतरे हो सकते हैं। हाल ही में गठित इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट संघ ने ई-सिगरेट कंपनियों के अपुष्ट दावों को हटा देने का फैसला किया है।

धूम्रपान से दुनिया में होने वाली मौतों का आंकड़ा भी हैरान करने वाला है। वर्ष 2015 में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक दुनिया-भर में धूम्रपान के कारण चौंसठ लाख लोगों की मौत हुई थी। यानी दुनिया में दस में से दो लोगों की मौत का कारण धूम्रपान रहा। धूम्रपान के कारण बावन फीसद लोग चीन, भारत, अमेरिका और रूस में मरे। पुरुषों के धूम्रपान करने के मामले में चीन, भारत और इंडोनेशिया सबसे आगे हैं। वर्ष 2015 में धूम्रपान करने वाले साढ़े इक्यावन फीसद पुरुष इन्हीं तीन देशों से थे। महिलाओं के संदर्भ में तीन अग्रणी देश अमेरिका, चीन और भारत हैं।

बेशक, ई-सिगरेट से होने वाले नुकसान को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है। महाराष्ट्र सरकार के सर्वे से साबित हो गया है कि ई-सिगरेट से मुंह के कैंसर हो रहे हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय भी इस वस्तुस्थिति से अवगत है। साफ है, धूम्रपान के कारण लाखों लोग वैश्विक स्तर पर असमय ही काल-कवलित हो रहे हैं। इस मामले में भारतीय भी अपवाद नहीं हैं। ऐसे में यह कहना कि ई-सिगरेट के सेवन से स्वास्थ्य को कोई नुकसान नहीं होगा, बेमानी है। भारत में इस पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने की जरूरत है।

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