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बचाना होगा पानी

पृथ्वी पर उपस्थित कुल जल का मात्र एक फीसद जल ही उपयोगी है। इस एक फीसद जल पर दुनिया की करीब आठ अरब आबादी सहित सारे जीव और वनस्पतियां निर्भर हैं। इस मीठे जल से सिंचाई, कृषि और तमाम उद्योग संचालित होते हैं। जाहिर है, आने वाले वक्त में जल संकट और गंभीर रूप लेता जाएगा।

जल संचयन का सांकेतिक फोटो।

प्रदीप श्रीवास्तव

हम आदि काल से जल संरक्षित करते आ रहे हैं। लेकिन आधुनिक जीवन शैली ने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की सोच को मात्र कुछ गैर सरकारी संगठनों और सरकारों तक ही सीमित कर दिया है। लगता ही नहीं है कि जल, वायु, जमीन या अन्य प्राकृतिक संसाधनों की भी सीमा है और ये अनंत काल तक चलने वाले नहीं हैं। अगर हमें सीखना ही है तो हम अपने इतिहास से काफी कुछ सीख सकते हैं।

हमारे यहां आदि काल में जब पर्याप्त पानी था, तब भी जल संरक्षण के पुख्ता इंतजाम किए जाते थे और उन्हीं तरीकों में थोड़ा-बहुत बदलाव करके आज हम पानी की समस्या से काफी हद तक मुक्ति पा सकते हैं। भारत में जल संरक्षण का एक बेहतरीन इतिहास रहा है। यहां जल संरक्षण की मूल्यवान पारंपरिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक परंपरा है, जिसे न सिर्फ जानना है, बल्कि हमें उसे अपनाना भी होगा।

वैदिक काल में जल संचयन का काम प्राकृतिक और कृत्रिम दोनों तरीके से होता था। अगर अभी के हालात देखे जाएं तो देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था की धुरी जल प्रबंधन ही है। इस पर ही कृषि, औद्योगिक एवं तकनीकी प्रगति निर्भर करती है। भारत में भू-जल विज्ञान का विकास लगभग पांच हजार साल से भी अधिक पुराना है। वैदिक साहित्य में इसके प्रमाण मौजूद हैं। इसमें श्लोकों, सूत्रों और स्तुतियों के रूप में विभिन्न देवताओं- इंद्र, वायु, अग्नि आदि की उपासना की गई है। प्राचीन भारतीय सभ्यता में ‘जल ही जीवन है’ का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया था।

वैदिक साहित्य में जल स्रोतों, जल के महत्त्व, उसकी गुणवत्ता एवं संरक्षण की बात बारंबार की गई है। वैदिक काल में जल प्रबंधन का कार्य वृहत् एवं अति उत्तम विधियों से किया जाता था। चरक संहिता में भी भू-जल की गुणवत्ता की चर्चा की गई है। वृहत्संहिता के चौवनवें अध्याय में जमीन के नीचे के पानी का पता बताने वाले वृक्षों, जीवों, भूमि और चट्टानों से जुड़े विशेष संकेतकों और कुआं खोदने की विधि का वर्णन मिलता है। प्रकृति में कुछ ऐसे वृक्ष मौजूद हैं जो अपने नीचे की जमीन में पानी की मौजूदगी की जानकारी देते हैं। आज के पारिस्थिकी विज्ञान और वराहमिहिर के परंपरागत विज्ञान के बीच भी संबंध मिलता है। प्रकृति ने पृथ्वी के इकहत्तर प्रतिशत भाग को जलमय बनाया है। इतना ही नहीं, स्वयं हमारे शरीर का सड़सठ प्रतिशत भाग जल ही है।

जल जीवन के लिए सर्वाधिक आवश्यक वस्तु है। लेकिन आज उसके स्रोत घटते जा रहे हैं। आज दुनियाभर को सुरक्षित और ताजा जल-स्रोतों की तात्कालिक जरूरत है। स्वास्थ्य की रक्षा और उसे बनाए रखने के लिए पेयजल और स्वच्छता-सुविधाएं मूल आवश्यकताओं में शुमार हो गई हैं। सभी लोगों के लिए जलापूर्ति और स्वच्छता उनके स्वास्थ्य और विकास-संबंधी मुद्दों की दृष्टि से एक राष्ट्रीय चुनौती बन गई है। भूजल की गुणवत्ता में निरंतर गिरावट आ रही है। एक अनुमान के अनुसार देश की चौदह लाख से ज्यादा बस्तियों में दूषित पानी पहुंचता है। सवाल है ऐसे में कैसे लोगों को साफ पानी मिले?

अन्य देशों की तरह भारत में भी जल संकट की समस्या गंभीर है। तेजी से होते शहरीकरण से तालाब और झीलों जैसे परंपरागत जल स्रोत खत्म हो गए हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड के विभिन्न राज्यों में कराए गए सर्वेक्षणों से भी यह बात स्पष्ट होती है कि इन राज्यों के भूजल स्तर में बीस सेंटीमीटर प्रतिवर्ष की दर से गिरावट आ रही है। भारत में वर्तमान में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता दो हजार घनमीटर है। लेकिन यदि हालात ऐसे ही बने रहे तो अगले दो दशकों में जल की उपलब्धता घट कर एक हजार पांच सौ घनमीटर प्रति व्यक्ति रह जाएगी। जल की उपलब्धता का एक हजार छह सौ अस्सी घनमीटर से कम रह जाने अर्थ है, पीने के पानी से लेकर अन्य दैनिक उपयोग तक के लिए जल की अत्यधिक कमी।

भारत में भूमिगत जल के अधिक प्रयोग के कारण परंपरागत जलस्रोत सूख रहे हैं। पृथ्वी पर कुल उपलब्ध जल का लगभग 97.5 प्रतिशत जल समुद्र्री है। समुद्री जल खारा होने की वजह से हमारे लिए अनुपयोगी है। बाकी ढाई प्रतिशत जल मीठा है। किंतु इसका चौबीस लाख घन किलोमीटर हिस्सा छह सौ मीटर गहराई में भूमिगत जल के रूप में विद्यमान है और लगभग पांच लाख घन किलोमीटर जल गंदा व प्रदूषित हो चुका है। यानी पृथ्वी पर उपस्थित कुल जल का मात्र एक फीसद जल ही उपयोगी है।

इस एक फीसद जल पर दुनिया की करीब आठ अरब आबादी सहित सारे जीव और वनस्पतियां निर्भर हैं। इस मीठे जल से सिंचाई, कृषि और तमाम उद्योग संचालित होते हैं। जाहिर है, आने वाले वक्त में जल संकट और गंभीर रूप लेता जाएगा। इससे देश में खाद्यान्न संकट पैदा होगा, उद्योग खत्म होने लगेंगे, पलायन, बेरोजगारी और आपसी संघर्ष को बढ़ावा मिलेगा और देश की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचेगा। भारत वर्ष में विश्व के कुल मीठे जल की मात्रा का 2.5 प्रतिशत जल मौजूद है, जिसका नवासी प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र में उपयोग किया जाता है।

इस वक्त देश के सभी हिस्सों में जल प्रबंधन पर तत्काल काम शुरू किए जाने की जरूरत है। इसके लिए कृषि क्षेत्र से शुरुआत करनी होगी, क्योंकि सर्वाधिक मात्रा में कृषि कार्यों में ही जल का उपयोग किया जाता है। सिंचाई में जल का दुरुपयोग एक गंभीर समस्या है। आम धारणा है कि अधिक पानी अधिक उपज, जो कि गलत है। फसलों के उत्पादन में सिंचाई का योगदान पंद्रह-सोलह प्रतिशत होता है। बूंद-बूंद सिंचाई, फव्वारा तकनीक और खेतों के समतलीकरण से सिंचाई में जल का दुरुपयोग रोका जा सकता है। फसलों को जीवन रक्षक या पूरक सिंचाई देकर उपज को दोगुना किया जा सकता है।

ढाल के विपरीत जुताई और खेतों की मेड़बंदी से भी पानी रुकता है। छोटे-बड़े सभी कृषि क्षेत्रों पर क्षेत्रफल के हिसाब से तालाब बनाना जरूरी है। ग्राम स्तर पर बड़े तालाबों का निर्माण गांव के लिए उपयोगी है, साथ ही यह भू-गर्भ जलस्तर को बढ़ाता है। देश की मानसूनी वर्षा का लगभग पचहत्तर फीसद जल भूमि जल की कमी दूर करता है। देश के विभिन्न पारिस्थितिकीय क्षेत्रों के अनुसार लगभग तीन करोड़ हेक्टेयर मीटर जल का संग्रहण किया जा सकता है। कृषि के बाद शेष ग्यारह प्रतिशत जल का उपयोग मानवीय उपभोग तथा उद्योगों में किया जाता है।

भारत जल के वैश्विक स्रोतों का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। पूरे विश्व में भारत में पानी का अत्यधिक प्रयोग तेरह प्रतिशत होता है। भारत के बाद चीन बारह प्रतिशत और अमेरिका नौ प्रतिशत जल उपयोग करता है। एक रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक बहुत-सी भारतीय नदियों में पानी का संकट होगा। भारत को प्रतिवर्ष वर्षा और बर्फ से बह कर आने वाली नदियों से औसतन चार हजार अरब क्यूबिक मीटर जल प्राप्त होता है। भारत में साढ़े चार हजार से ज्यादा बांध हैं, जिनकी संग्रह क्षमता दो सौ बीस अरब क्यूबिक मीटर है।

इसमें जल संग्रह के छोटे-छोटे स्रोत शामिल नहीं हैं, जिनकी क्षमता ठह सौ दस अरब क्यूबिक मीटर है। फिर भी हमारी प्रति व्यक्ति संग्रहण की क्षमता आस्ट्रेलिया, चीन, मोरक्को, दक्षिण अफ्रीका, स्पेन और अमेरिका से बहुत कम है।
प्राणीजगत के लिए जल अत्यावश्यक है। इसलिए प्राकृतिक संसाधनों का हनन नहीं होना चाहिए। पहाड़ों, जलस्रोतों व वनों को एक सूत्र में बांधा जाना बहुत जरूरी है। इसके माध्यम से ही जल संरक्षण संभव है। इसलिए जंगलों, नदियों को बचाना जरूरी है, क्योंकि इन दोनों से ही लोगों को पीने का पानी और पर्याप्त शुद्ध वातावरण मिलेगा।

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