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राजनीतिः अमेरिका में ट्रंपवाद की चुनौती

अतिराष्ट्रवाद की भावना को हथियार बना कर सत्ता के शीर्ष पर बने रहने के इतिहास में कई उदाहरण हैं, जिसमें जनता को भ्रमित कर उसका विश्वास जीत लिया जाता है और लोक कल्याण की भावना गौण हो जाती है। तानाशाहों के लिए सत्ता में बने रहने का यह प्रमुख अस्त्र माना जाता था। अब लोकतांत्रिक देशों में भी अधिनायकवाद मजबूत होकर कबीलाई संस्कृति को बढ़ावा दे रहा है और यह दुनिया में अशांति बढ़ाने वाला प्रमुख कारक बन सकता है।

security before oath ceremony of joe bidenवॉशिंगटन नेशनल पैट्रोल के एक सैनिक ने सोमवार को ओलंपिया वाशिंगटन में विरोध प्रदर्शन की आशंका में कैपिटल हिल के पास वाशिंगटन नेशनल गार्ड के सदस्यों के साथ सुरक्षा प्रबंध का जायजा लेते हुए। (एपी फोटो)

ब्रह्मदीप अलूने

अमेरिका के वाइट हाउस में इन दिनों अजीब-सा सन्नाटा पसरा है। यह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस बुर्जुआ और संकीर्णता पर आधारित विचारों और शासन व्यवस्था से उपजा राजनीतिक संकट है जिसने अमेरिकी लोकतंत्र की अस्मिता को तार-तार कर दिया है। ट्रंप के राजनीतिक कदमों से उपजी परिस्थितियों को लेकर अमेरिका इतना आशंकित है कि फेसबुक, यूट्यूब और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया ने भी उनके अकाउंट को बंद कर दिए हैं, जिससे वे लोगों को भड़का न सकें।

यह समूचा घटनाक्रम अति राष्ट्रवादी राजनीति के उभार के बाद आने वाले संकटों के संकेत दे रहा है। इसके प्रभाव से नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन बच नहीं सकते, क्योंकि ट्रंप को अब भी अमेरिका के एक बड़े वर्ग का जनाधार हासिल है और इसे किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा झुठलाना देश को अराजकता में झोंक देना होगा।

दरअसल डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता से विदाई के ठीक पहले निर्देशित भीड़ को अमेरिकी संसद में घुसने को प्रेरित करके और अमेरिकी लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुनौती देकर जिस प्रकार अराजकता फैलाई है, उससे दुनिया ने यह देखा कि प्रभुत्ववादी सत्ता की चाह में हिंसा का तांडव मध्य पूर्व या विकासशील राष्ट्रों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह अमेरिका जैसे अति विकसित राष्ट्रों में भी संभव है।

ट्रंप की इस हिमाकत को अमेरिकी लोकतांत्रिक इतिहास का काला दिन माना गया। उनकी विरोधी डेमोक्रेटिक पार्टी ने महाभियोग से ट्रंप को सत्ता से बेदखल करने की ओर मजबूती से कदम आगे बढ़ा दिए हैं जिसे ट्रंप की पार्टी रिपब्लिकन के कुछ सांसदों ने भी समर्थन दिया है। लेकिन ट्रंप इन सब घटनाओं से विचलित नहीं दिखाई पड़ते, बल्कि वे इसे अपनी लोकप्रियता के रूप में देख रहे हैं।

परंपरा के अनुसार आगामी 20 जनवरी को बाइडेन अमेरिका के नए राष्ट्रपति की शपथ लेने वाले हैं। लेकिन एफबीआइ ने चेतावनी जारी कर दी है कि उस दिन पूरे देश में ट्रंप समर्थक हथियारों के साथ विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं। इसे अमेरिका में बड़े पैमाने पर हिंसा भड़कने की आशंकाओं के रूप में देखा जा रहा है। महाभियोग के प्रस्ताव के बाद भी ट्रंप खामोश नहीं हैं और उन्होंने वाशिंगटन डीसी में आपातकाल लगा दिया है। महाभियोग के प्रस्ताव पर 19 जनवरी को यदि सीनेट में भी मुहर लग गई तो ट्रंप फिर कभी अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं बन पाएंगे। इसके साथ ही वे पूर्व राष्ट्रपति को दिए जाने वाले विशेषाधिकारों से भी वंचित हो जाएंगे।

लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या सीनेट जहां रिपब्लिकन पार्टी को बहुमत हासिल है, वहां इस प्रस्ताव पर मुहर लग पाएगी। ट्रंप को अमेरिका के परंपरावादी समाज में जो लोकप्रियता हासिल है, उसे नजरअंदाज करना रिपब्लिकन सदस्यों के लिए आसान नहीं होगा। 2016 में सत्ता में आने वाले ट्रंप पर अमेरिकी खुफियां एजेंसी सीआइए ने चुनाव जीतने के लिए रूस की मदद लेने जैसे संगीन आरोप लगाए थे। इसे लेकर 2019 में उन पर महाभियोग लाया गया था और तब भी रिपब्लिकन सांसदों ने ट्रंप के खिलाफ वोट नहीं दिया था।

इस समय अमेरिका में सब कुछ सामान्य नहीं है और इसके दूरगामी परिणाम दुनिया की राजनीति को व्यापक रूप से प्रभावित कर सकते हैं। लोकतंत्र के बारे में यह सामान्य विचार है कि इस शासन प्रणाली में लोगों को शासन व्यवस्था तक अपने विचार पहुंचाने के व्यापक अवसर मिलते हैं और वे जनमत को संगठित करके शासन के दृष्टिकोण को प्रभावित करने में समर्थ होते हैं, इसलिए विद्रोह की संभावनाएं कम हो जाती हैं।

बाइडेन के सामने यह गहरा दबाव होगा कि वे ट्रंप की नीतियों को खारिज न करें और इसकी छाया से उनका उबरना आसान भी नहीं होगा। ट्रंप ने 2016 का चुनाव अमेरिका के बहुप्रचारित बहुसांस्कृतिक परिवेश के समाज को चुनौती देकर लड़ा था और उन्होंने अपनी चुनावी रैलियों में अमेरिका की मूल पहचान बनाए रखने के नाम पर लोगों का समर्थन मांगा था। ट्रंप ने राष्ट्रपति की दावेदारी में राष्ट्रवाद, बुर्जुआ तंत्र, संकीर्णता और अतिवाद पर आधारित नीतियों को उभारा था।

पूरी दुनिया में अमेरिका की छवि साझा संस्कृति वाले एक ऐसे राष्ट्र की रही है जहां सभी मिलजुल कर जीवन जीते हैं। लेकिन ट्रंप ने अमेरिका के हितों के लिए व्यापक सुधारों की बात कहते हुए मुसलिमों के अमेरिका में प्रवेश को प्रतिबंधित करने शुरूआत उन सात देशों से की, जिन्हें दुनिया कथित तौर पर आतंक में मददगार समझती है। अमेरिका का ग्रामीण समाज मुसलमानों को संदेह की नजर से देखता है और उनमें रंगभेद की भावना अभी भी विद्यमान है। अमेरिकी समाज के बड़े तबके ने इसका खुल कर समर्थन किया, जबकि ट्रंप की नीतियां नस्लवाद और भेदभाव पर आधारित थीं।

राष्ट्रपति के तौर पर भी ट्रंप की नीतियां आक्रामक ही रहीं। पिछले साल अमेरिका में एक अश्वेत नौजवान की गोरे पुलिस अधिकारी के हाथों निर्मम हत्या के बाद पूरा देश हिंसा की चपेट में आ गया था और चालीस शहरों में कर्फ्यू लगाना पड़ा था। इस घटना को लेकर अमेरिकी लोग चाहते थे कि राष्ट्रपति देश को संबोधित करें। लेकिन ट्रंप ने अपने पद और दायित्व को दरकिनार कर अपनी परंपरावादी नीतियों का इजहार अपनी बातों में भी किया। उन्होंने विरोध-प्रदर्शनों की आलोचना करते हुए इसे आतंकवादी और अमेरिकी विरोधी ताकतों द्वारा पोषित बताया। उन्होंने देश में सेना तैनात करने की बात कह डाली।

एक अश्वेत की मौत से उठे बवाल में ट्रंप ने राष्ट्रवाद का पासा फेंक कर अपने को उत्कृष्ट मानने वाले गोरे अमेरिकियों का समर्थन हासिल करने की कोशिश की। अमेरिका में नस्लवाद की हकीकत से बराक ओबामा भी बच नहीं पाए थे। उन्होंने यह स्वीकार किया था कि नस्लभेद अमेरिका के डीएनए में है और लोग नस्लीय मानसिकता से नहीं उबर पाएं हैं। लेकिन नस्लवाद का फायदा उठा कर अमेरिकी समाज को कोई राष्ट्रपति बांटने की कोशिश करे, तो इससे अमेरिका का अस्तित्व ही संकट में पड़ेगा।

वास्तव में ट्रंप ने आधुनिक समाज की उस नब्ज को पकड़ कर अमेरिका की राजनीति में जगह बनाने में कामयाबी हासिल की, जिसे लोकतंत्र का अधिनायकवादी दांव कहा जा सकता है। सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए दुनिया भर के कई राजनेता अपने देश में इस प्रकार की राजनीति को बढ़ावा दे रहे हैं, जहां अतिराष्ट्रवाद को राष्ट्रीय हितों के रूप में उभार कर उदारवाद को व्यापक संकट के रूप में पेश किया जाता है और जनता इसे अपना अस्तित्व का संकट समझ कर नेतृत्व पर अंधा भरोसा करने लगती है।

ट्रंप चुनाव हार गए, फिर भी वे चुनाव की वैधता को लेकर सवाल खड़े करते रहे। चुनावी अधिकारी से लेकर अदालतों तक ने ट्रंप के दावों को खारिज कर दिया। इसके बाद भी ट्रंप चुप नहीं रहे और उन्होंने चुनाव नतीजों के खिलाफ वाशिंगटन डीसी में एक रैली में अपने समर्थकों से कहा था कि लड़ाई करो। इसकी परिणीति ही कैपिटोल हिल में हिंसा के रूप में सामने आई।

अब अमेरिका की राजनीति उस दौर में प्रवेश कर गई है जहां अमेरिका के ग्रामीण समाज की उस भावना को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा जो मुसलमानों को संदेह की नजर से देखती है और रंगभेद की भावना उनमें मजबूती से बनी हुई है। ट्रंप सत्ता से बाहर होकर भी अमेरिका के समाज से खारिज नहीं हुए हैं। ऐसे में वे अमेरिका की आगामी नीतियों को प्रभावित करने में मजबूत दबाव समूह की तरह काम कर सकते हैं।

अतिराष्ट्रवाद की भावना को हथियार बना कर सत्ता के शीर्ष पर बने रहने के इतिहास में कई उदाहरण हैं, जिसमें जनता को भ्रमित कर उसका विश्वास जीत लिया जाता है और लोक कल्याण की भावना गौण हो जाती है। तानाशाहों के लिए सत्ता में बने रहने का यह प्रमुख अस्त्र माना जाता था। अब लोकतांत्रिक देशों में भी अधिनायकवाद मजबूत होकर कबीलाई संस्कृति को बढ़ावा दे रहा है और यह दुनिया में अशांति बढ़ाने वाला प्रमुख कारक बन सकता है।

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