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राजनीतिः अंतरिक्ष में होंगे भविष्य के युद्ध

दरअसल चीन के पास उपग्रहों को जाम करने की क्षमता है। अब वह पूर्ण स्पेक्ट्रम क्षमता विकसित करने की ओर बढ़ रहा है। टोही विमानों, संचार उपग्रहों को नुकसान पहुंचाने पर भी उसका ध्यान है। इस दिशा में चीन के लगातार प्रयास और उपग्रह प्रतिरोधी हथियारों के परीक्षण से अमेरिका चिंतित है। दरअसल, चीन अंतरिक्ष को अतिसंवेदनशील क्षेत्र की तरह देख रहा है। अमेरिका ने अंतरिक्ष में चीन की बढ़ती क्षमताओं पर चिंता जताई है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुल कर एलान कर दिया है कि वे अमेरिकी सेना की छठी शाखा बनाना चाहते हैं जो अंतरिक्ष सेना यानि ‘स्पेस फोर्स’ होगी।

अंतरिक्ष में से जंग की तैयारी अमेरिका, रूस और चीन बहुत पहले से कर रहे हैं। लेकिन अब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुल कर एलान कर दिया है कि वे अमेरिकी सेना की छठी शाखा बनाना चाहते हैं जो अंतरिक्ष सेना यानि ‘स्पेस फोर्स’ होगी। देश की सुरक्षा के लिए यह जरूरी है कि अंतरिक्ष में अमेरिका की केवल मौजूदगी नहीं, बल्कि दमदार और प्रभावी मौजूदगी हो। इसलिए अंतरिक्ष में यह अलग सेना होगी और इससे न केवल देश की सुरक्षा बढ़ेगी, बल्कि नई नौकरियां बनेंगी और अर्थव्यवस्था में भी सुधार आएगा।’ दरअसल अमेरिका, रूस या चीन जैसे दूसरे देशों को इस मामले में आगे बढ़ते हुए नहीं देख सकता। ट्रंप ने कहा है- ‘ये बेहद अहम है। मैं रक्षा विभाग और पेंटागन को अमेरिकी सेना की छठी शाखा के रूप में स्पेस सेना तैयार करने के मद्देनजर तुरंत काम शुरू करने का निर्देश देता हूं। वायुसेना के अलावा भी अमेरिका की एक अंतरिक्ष सेना होगी, जो अलग होगी। लेकिन वायुसेना के समान होगी।’

ट्रंप ने अपने बयान से यह संकेत भी दे दिया है कि वे तेजी से उभर रहे अंतरिक्ष उद्योग के साथ कदम से कदम मिला कर काम करेंगे। इसके साथ ही वे अमीर नागरिकों को देश की संपत्ति का इस्तेमाल करके रॉकेट छोड़ने की अनुमति भी देंगे। हालांकि ये सब कैसे होगा, नई अंतरिक्ष सेना का स्वरूप क्या होगा और यह कैसे काम करेगी, इन सबके बारे में फिलहाल कोई जानकारी नहीं है। सेना की एक नई शाखा बनाने के लिए अमेरिकी कांग्रेस को इस संबंध में एक कानून भी पारित करना होगा, जो उनके इस फैसले को वैध करार दे। हालांकि ये कोई नया विचार नहीं है। अंतरिक्ष में जंग की तैयारी अमेरिका, रूस और चीन पहले से ही कर रहे हैं।

पर अब अमेरिकी अंतरिक्ष एजंसी- नासा के प्रभुत्व को चीन चुनौती दे रहा है। चीन के नेशनल स्पेस साइंस सेंटर में खुफिया अंतरिक्ष परियोजनाओं पर तेजी से काम चल रहा है। हाल ही में शेजोऊ-11 अंतरिक्ष यान के सफल प्रक्षेपण ने चीन के अंतरिक्ष मिशन को कई कदम आगे बढ़ा दिया है। भविष्य में अंतरिक्ष परियोजनाओं के लिए चीन अपने बजट में तीन गुना इजाफे की तैयारी में है। चीन का अंतरिक्ष बजट इस समय लगभग सत्तर करोड़ डालर है और सन 2026-30 तक यह सवा दो अरब डॉलर से ऊपर निकल जाएगा। अमेरिकी नेताओं और अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का मानना है कि चीन अंतरिक्ष मिशनों को राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहता है। इन मिशनों के जरिए वह अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहता है।

चीन अगले चार साल में अंतरिक्ष स्टेशन बनाने, चंद्रमा की अंधेरी सतह पर उतरने और मंगल ग्रह पर मनुष्य को भेजने जैसी परियोजनाओं पर तेजी से काम कर रहा है। यह योजना नासा की योजना से काफी आगे है। चीन अंतरिक्ष परियोजनाओं के लिए घरेलू तकनीक विकसित कर रहा है। सन 2025 तक चीन अंतरिक्ष मिशन में इस्तेमाल होने वाले सत्तर फीसद उपकरणों जैसे सेमी कंडक्टर और साफ्टवेयर बना लेने की तैयारी में है। वर्ष 2036 तक चीन चंद्रमा पर ताइकोनाट्स (चीनी वैज्ञानिक) भेजने की तैयारी कर रहा है। इसके साथ ही अंतरिक्ष मिशनों की सफलता से रोबोटिक्स, विमानन और कृत्रिम बौद्धिकता के क्षेत्र में भी नए प्रयोग होंगे। चीन की अर्थव्यवस्था 1990 के बाद से सबसे सुस्त दौर से गुजर रही है। लगातार सातवें महीने निर्यात में भारी गिरावट हुई है। चीनी शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर स्वदेशी कंपनियां अंतरिक्ष मिशन के लिए नई तकनीक विकसित करेंगी तो इससे अर्थव्यवस्था में सुधार होगा। चीनी अंतरिक्ष प्रयोगशाला अगले दो साल में तैयार हो जाने की उम्मीद है।

चीन और अमेरिका के बीच कई मामलों को लेकर विवाद है। अमेरिका को अंतरिक्ष में भी चीन से खतरा महसूस हो रहा है। इसीलिए वह अपने उपग्रहों को सुरक्षित रखने के लिए एक कवच तैयार कर रहा है। अमेरिकी सुरक्षा विभाग पेंटागन और खुफिया एजंसियां अरबों डॉलर की परियोजनाओं पर काम कर रही हैं। अमेरिकी वायुसेना के जनरल जॉच हाइटन ने उपग्रहों की सुरक्षा वाली इस परियोजना को ‘अंतरिक्ष में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संपत्ति’ बताया है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि अंतरिक्ष में उसके उपग्रहों को कोई बंधक बना सकता है, इसीलिए अमेरिकी सुरक्षा विभाग और खुफिया एजंसियां अपने उपग्रहों को और सक्षम बनाने पर विचार कर रही हैं, ताकि उन पर आने वाले किसी भी खतरे से वे निपट सकें और उस यंत्र को ही जाम कर दें। साल 2013 में चीन के एक राकेट ने अमेरिका की नींद उड़ा दी थी। चीन अपना राकेट अंतरिक्ष में बाईस हजार मील तक ले गया था। अंतरिक्ष में इतनी ही ऊंचाई पर अमेरिका अपनी सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील उपग्रह स्थापित करता है। वह इन उपग्रहों का इस्तेमाल अन्य देशों के बमों का पता लगाने और खुफिया जानकारी हासिल करने में करता है। इसके पहले 2007 में चीन ने अपने ही एक निष्क्रिय पड़े उपग्रह को मिसाइल से उड़ा दिया था। इसलिए अमेरिका अब अपने सारे कार्यक्रम चीन को ध्यान में रख कर तैयार कर रहा है।

दरअसल, चीन के पास उपग्रहों को जाम करने की क्षमता है। अब वह पूर्ण स्पेक्ट्रम क्षमता विकसित करने की ओर बढ़ रहा है। टोही विमानों, संचार उपग्रहों को नुकसान पहुंचाने पर भी उसका ध्यान है। इस दिशा में चीन के लगातार प्रयास और उपग्रह प्रतिरोधी हथियारों के परीक्षण से अमेरिका चिंतित है। चीन अंतरिक्ष को अतिसंवेदनशील क्षेत्र की तरह देख रहा है। अमेरिका ने अंतरिक्ष में चीन की बढ़ती क्षमताओं पर चिंता जताई है। इसका मुकाबला करने के लिए उसने भारत से करीबी सहयोग की इच्छा जताई है।
चीन, अमेरिका और रूस के बीच अंतरिक्ष पर वर्चस्व की जंग शुरू हो चुकी है। अमेरिका की तत्कालीन विदेश मंत्री कोंडोलीजा राइस और चेक गणराज्य के विदेश मंत्री ने आठ जुलाई, 2008 को राजधानी प्राग में एक करार पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत अमेरिकी सेना को प्राग के दक्षिण-पश्चिम में एक राडार स्टेशन बनाने की अनुमति मिली थी। रूस को आशंका है कि अमेरिका ने टोह लेने के लिए ऐसा किया है। जल, जमीन, आकाश के बाद बड़े देशों की नजर अब अंतरिक्ष पर टिकी है। तीनों सीमाओं पर अपने बर्चस्व से आश्वस्त ये देश अब अंतरिक्ष फतह पर निकल पड़े हैं। वहां जो भी अपनी बादशाहत कायम कर लेगा, वही विश्व विजेता होगा।

प्रशांत महासागर में मौजूद अमेरिकी जंगी जहाज ‘यूएसएस लेक एरी’ ने कुछ वर्ष पहले ‘एसएम-3’ प्रक्षेपास्त्र से स्काई लैब की तरह पृथ्वी की ओर आ रहे उसके जासूसी उपग्रह को तीन मिनट के अंदर पृथ्वी से एक सौ तैंतीस मील ऊपर ध्वस्त कर दिया था। चीन ने 11 जनवरी, 2007 को अंतरिक्ष में मौजूद अपने मौसमी उपग्रह को इसी तरह प्रक्षेपास्त्र से निशाना बनाया था। इससे वह अमेरिका व रूस के बाद ऐसा कारनामा दिखाने वाला तीसरा देश हो गया। चिंता की बात यह है कि प्रक्षेपास्त्र हमले के खिलाफ कवच तैयार करने की इस प्रणाली को दोनों ही देश विकसित कर रहे हैं। पर दोनों ही स्वयं इसके खिलाफ हैं। रूस भी ऐसे प्रयोग करने में सक्षम है, तो क्या वह पीछे रहेगा! ऐसे में यही लगता है कि सामूहिक विनाश के हथियारों को अंतरिक्ष में ले जाने की होड़ बढ़ने का खतरा बढ़ता ही जा रहा है। अंतरिक्ष में इस तरह के प्रयोगों से लगता है कि यह एक तरह की महत्त्वाकांक्षा है, जो जमीन, जल और आकाश से निकल कर अब अंतरिक्ष की ओर कदम बढ़ा रही है। इससे आकलन किया जा रहा है कि कौन कितनी दूर मार कर सकता है।

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