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राजनीतिः बाढ़ और सूखे का चक्रव्यूह

देश में विशेषरूप से बिहार, झारखंड और असम ऐसे तीन राज्य हैं जिन्हें हर वर्ष बाढ़ से सबसे अधिक क्षति पहुंचती है। उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल को हर दूसरे-तीसरे वर्ष बाढ़ से भारी क्षति होती है। लेकिन इस ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया और न ही इसकी रोकथाम के लिए कोई स्थायी उपाय किए गए। भारी जन और धन की क्षति होते हुए भी सरकार और राजनीतिक दल इस गंभीर विपदा के प्रति उदासीन रहे हैं।

आधे-अधूरे संकल्पों और नीहित स्वार्थों के कारण हम बाढ़ के विस्तार को रोकने में तो असफल रहे ही हैं, बल्कि इससे होने वाली क्षति को भी कम करने में विफल रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और केरल में इस साल भारी वर्षा और बाढ़ से जो तबाही हुई, उससे यह साबित हो गया है कि जलवायु चक्र बदल रहा है। खनन और वृक्षों को काट कर पर्यावरण को जो क्षति पहुंचाई गई है, उसका हमें खमियाजा भोगना पड़ रहा है। दुनिया के कई देशों के साथ भारत भी बाढ़ और जलवायु परिवर्तन से परेशान है। इसके कारण हर साल लगभग दस अरब डालर की चपत लग रही है। केरल के अलावा उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, असम, नगालैंड सहित देश के कुछ हिस्से जहां भारी वर्षा और बाढ़ से तस्त्र रहे, वहीं कुछ राज्यों में औसत से काफी कम बारिश हुई। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार 1953 से 2017 के बीच भारत में बाढ़ से एक लाख से ज्यादा लोग मारे गए और साढ़े तीन लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हुआ। इस साल बाढ़ से अब तक आठ सौ से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।

बाढ़ आज भी हमारे किसानों और गांव वालों के लिए एक बड़ी समस्या है। बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश और पूर्वोत्तर के राज्यों को हर साल बाढ़ का सामना करना पड़ता है। पर अब तक बाढ़ रोकने और नियंत्रित करने के लिए हम किसी कारगर योजना को अंजाम नहीं दे सके हैं। इसलिए जब वर्षा कम होती है तो सूखा पड़ जाता है और जब अधिक हो जाती है तो बाढ़ आ जाती है। गंगा और उसकी सहायक नदियां ऐसे क्षेत्रों में बहती हैं जहां वर्षा मुख्यतया दक्षिण-पश्चिम मानसून के द्वारा जून से सितंबर तक होती है। बाढ़ और नदी के तटों का कटाव का सबसे अधिक प्रभाव ओड़ीशा, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल पर पड़ता है। उत्तरी बिहार की नदियां तो अपने मार्ग बदल कर अपने तट को काटती हुई सड़कों को भी काट देती हैं। देश के इस भाग में तो बाढ़ का प्रकोप हर वर्ष के लिए आम बात है।

उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र और हरियाणा के कुछ हिस्सों में जलोत्सारण के रुकावट से पानी एकत्र हो जाने के कारण बाढ़ आ जाती है। महानदी में तो ज्वार-भाटे की लहरों के कारण और भागीरथी, अजोय एवं दामोदर में तट के कटाव के कारण बड़े-बड़े क्षेत्र जलमग्न हो जाते हैं। सतलुज, व्यास, चिनाब तथा झेलम में जल की अत्यधिक मात्रा से तलछट मानसून के समय बह निकलता है। ये नदियां अक्सर अपना रास्ता बदल देती हैं जो नए क्षेत्रों में बाढ़ और तबाही के कारण बनता है। लेकिन अब कम वर्षा वाले राज्यों गुजरात और राजस्थान में भी बाढ़ आने लगी है। यह जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ हमारी नई विकास नीतियों और बड़े-बड़े बांधों का नतीजा है। इसका सबसे अधिक नुकसान किसानों और ग्रामीणों को भोगना पड़ता है। कहीं तटबंध टूटने से बाढ़ आती है, तो कहीं बांधों में दरार पड़ जाने से बहुत-सा इलाका जलमग्न हो जाता है। बाढ़ के प्राकृतिक कारण तो हमेशा से रहे हैं, लेकिन विकास की विसंगतियों से भी यह समस्या गहराई है। अब तक बाढ़ रोकने के जितने उपाय किए गए हैं, उनसे यह समस्या और जटिल हो गई है।

आधे-अधूरे संकल्पों और नीहित स्वार्थों के कारण हम बाढ़ के विस्तार को रोकने में तो असफल रहे ही हैं, बल्कि इससे होने वाली क्षति को भी कम करने में विफल रहे हैं। देश में विशेषरूप से बिहार, झारखंड और असम ऐसे तीन राज्य हैं जिन्हें हर वर्ष बाढ़ से सबसे अधिक क्षति पहुंचती है। उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल को हर दूसरे-तीसरे वर्ष बाढ़ से भारी क्षति होती है। लेकिन इस ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया और न ही इसकी रोकथाम के लिए कोई स्थायी उपाय किए गए। भारी जन और धन की क्षति होते हुए भी सरकार और राजनीतिक दल इस गंभीर विपदा के प्रति उदासीन रहे हैं।

केंद्र एवं राज्यों के सहयोग से चार हजार किलोमीटर का जो तटबंध बनाया गया था, शुरू में तो उसका अच्छा परिणाम रहा, लेकिन बाद में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से शरणार्थी भाग कर नदियों के क्षेत्र में आ गए। इन शरणार्थियों ने वहां के हरे-भरे क्षेत्रों में से पेड़-पौधे काट कर साफ कर दिए। इसके बाद भारी वर्षा के कारण मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए जमीन पर कोई चीज नहीं रही। इससे नदियों के किनारे कटने और टूटने लगे और आसपास का क्षेत्र अब फिर बाढ़ की समस्या से जूझ रहा है। ब्रह्मपुत्र की बाढ़ से असम के कई जिलों में भीषण क्षति हुई है। बांग्लादेश के बाद भारत ही दुनिया का सबसे ज्यादा बाढ़ प्रभावित देश है। देश की लगभग चार करोड़ हेक्टेयर जमीन बाढ़ की आशंका वाली है। एक अध्ययन के अनुसार, भारत में हर साल बाढ़ से औसतन सैकड़ों लोग मर जाते हैं और खरबों की संपत्ति का नुकसान हो जाता है। ये आंकड़े जहां लगातार बिगड़ती स्थिति का संकेत देते हैं, वहीं प्रकृति से छेड़छाड़ के भयावह परिणामों से निपटने की दिशा में सही तैयारी के अभाव को उजागर भी करते हैं।

वास्तव में बाढ़ और सूखे की समस्याएं एक-दूसरे से जुड़ी हैं। इसलिए इनका समाधान भी जल प्रबंधन की कारगर और बेहतर योजनाएं बना कर एक साथ किया जा सकता है। राष्ट्रीय बाढ़ नियंत्रण कार्यक्रम के तहत डेढ़ करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र को बाढ़ से बचाने की व्यवस्था की जा चुकी है। पिछले पचास साल में कुल मिला कर बाढ़ पर एक सौ सत्तर हजार करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। लेकिन हमारे देश में जिस बड़े पैमाने पर बाढ़ आती है, उस हिसाब से अभी बहुत-सा काम बाकी है। बाढ़ निरोध के उपायों की अधिकांश जिम्मेदारी अभी राज्यों पर ही है। केंद्र सरकार विभिन्न योजनाओं के माध्यम से राज्य को सहयोग करती है।

भारत में बाढ़ की रोकथाम के बारे में सबसे अधिक काम वैज्ञानिक डा. मेघनाद साहा ने किया है। उन्होंने भारत की नदियों की समस्या की व्याख्या की और बताया कि जर्मनी, अमेरिका और रूस में कैसे नदियों को नियंत्रित किया जाता है। बाढ़ नियंत्रण योजनाएं तभी सफल हो सकती हैं जब बाढ़-पीड़ित क्षेत्रों की नदियों के जल विज्ञान व स्थलाकृति संबंधी विज्ञान का गहन अध्ययन किया जाए। आवश्यकता इस बात की है कि नदी के विशेष स्थानों पर बाढ़ का सही अनुमान लगाया जाए। प्राकृतिक रूप से कई निचले स्थानों को और गहरा कर बरसाती व बाढ़ के पानी को जमा करके सूखे की समस्या भी हल की जा सकती है। बाढ़ संबंधी समस्याएं प्राय: बाढ़ के समय या उसके तत्काल बाद ही उग्र रूप से सामने आती हैं। जब बाढ़ की बला टल जाती है तो अन्य बड़ी योजनाओं में बाढ़ की समस्याएं भी समा जाती हैं। बाद में उनकी ओर यथोचित ध्यान नहीं दिया जाता। अतएव जहां बाढ़ द्वारा जान-माल की क्षति प्रति वर्ष होती रहती है, वहां की समस्याओं का समाधान क्षेत्रीय आयोग और बाढ़ नियंत्रण बोर्डों की देखरेख में ही होना चाहिए।

अक्सर यह कहा जाता है कि भूमि संरक्षण यदि उचित रूप से किया जाए तो बाढ़ के खतरे को कम किया जा सकता है। ऐसा कहना साधारण बाढ़ के बारे में उपयुक्त हो सकता है। लेकिन जहां बड़ी बाढ़ आती है, वहां छोटी-मोटी भूमि संरक्षण योजनाएं काम नहीं कर सकतीं। फिर भी, भूमि संरक्षण एक बड़ा महत्त्वपूर्ण कार्य है और हमारे देश में यह किया जाना आवश्यक है। लेकिन बाढ़ नियंत्रण की योजनाएं गहन छानबीन के बाद शुरू की जानी चाहिए। इससे हमारे देश की ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था जुड़ी हुई है, इसलिए बाढ़ नियंत्रण योजनाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता भी दी जानी चाहिए। बाढ़ के खतरे वाले क्षेत्रों में पानी की निकासी की व्यवस्था का प्रबंध समय रहते करने में कितना भी खर्च हो, वह स्थानीय लोगों की सुरक्षा, जान-माल की क्षति बचाने के लिए बाढ़ में किए गए खर्चीले आपात प्रयासों से ज्यादा प्रभावी होगा।

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