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राजनीतिः बैंक की बीमारी का निदान

एनपीए वसूल नहीं होने या उसमें हो रही देरी के पीछे वजह यह भी है कि राजनीतिक लोग यह तय करते हें कि बैंकों को कैसे चलाया जाए। बैंक स्वायत्तशासी नहीं हैं। जब तक राजनेताओं, व्यावसायिक घरानों और बैंकों का गठजोड़ बना रहेगा, बैंकों को बढ़ते एनपीए की समस्या से छुटकारा दिलाना आसान नहीं होगा। सारा खेल राजनीतिक दखल का है।

Author March 4, 2016 2:41 AM
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया

सुधीश कुमार पटेलः

भारत में बैंकों की बैलेंस शीट (वित्तीय स्थिति विवरण) भले ही प्रतिवर्ष लाभ दर्शाती हो, लेकिन डूबते खातों के आंकड़ों को सिलसिलेवार देखा जाए तो सवा करोड़ आबादी वाले देश के केवल तीस रसूखदारों के ऊपर नब्बे हजार करोड़ रुपए से अधिक बकाया है। देश में बैंकों की गैर-निष्पादित संपत्ति (नॉन परफार्मिंग एसेट्स- एनपीए) में वृद्धि और घटते मुनाफे के कारण बैंक खतरे में चल रहे हैं। सरकार की जन धन और बैंक खातों में सीधे लाभ स्थानांतरण (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) जैसी योजनाओं के लिए बैंकिंग सेवाओं का दायरा बढ़ाना जरूरी है। पर अभी बैंकिंग के विस्तार में बड़ी समस्या तो बढ़ता एनपीए है। सवाल है कि इन बैंकों की ऐसी दशा कैसे हुई और इसके लिए जिम्मेदार कौन है? कभी वित्तीय बाजार को अपनी अंगुली पर नचाने वाले बैंक आज पूंजी के लिए बीमा और म्युचुअल फंड कंपनियों से कर्ज के मोहताज हैं। यह एक नए तरह का (लिक्विडिटी डेफिसिट) संकट है।
भारतीय रिजर्व बैंक के दिशा-निर्देशों के मुताबिक जब कोई ऋण लेने वाला तीन माह से अधिक समय तक अपनी किस्त नहीं चुकाता तो उसका ऋण एनपीए घोषित कर दिया जाता है। एक कंसल्टेंसी कंपनी के अनुसार भारत में खराब कर्ज के मर्ज में वर्ष 2010-15 के बीच पांच गुना वृद्धि हो गई। ऐसे ऋण 2011 में सत्ताईस अरब डॉलर (करीब अठारह खरब रुपए) थे, जो 2015 में बढ़ कर एक सौ तैंतीस अरब डॉलर (करीब नियानबे खरब रुपए) हो गए। कर्ज की वसूली के प्रति उदासीनता पर रिजर्व बैंक के गवर्नर का चिंतित होना स्वाभाविक है। कर्ज माफी, बट्टा खाता, राहत-अनुदान में वृद्धि जैसी सुविधाएं कर्ज का मर्ज बढ़ाने में सहायक साबित हुई हैं। फंसे कर्जों में इस्पात, कपड़ा, ऊर्जा, चीनी, एल्युमीनियम और निर्माण सेक्टर की हिस्सेदारी पचास फीसद से अधिक है। जब तक इनकी हालत नहीं सुधरती, बैंकों के एनपीए में सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती।
अर्थव्यवस्था की अच्छी सेहत के लिए बैंकों का मजबूत होना बहुत जरूरी होता है। पर भारत के बैंकों का डूबता कर्ज (एनपीए) अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में बढ़ते राजनीतिक दखल को एनपीए के लिए मोटे तौर पर जिम्मेदार माना ही जाना चाहिए। लेकिन हम देख रहे हैं कि निजी क्षेत्र के बैंक भी इससे अछूते नहीं हैं। यह बात जरूर है कि उनकी एनपीए रकम अपेक्षाकृत कम है। एनपीए की अधिकांश राशि 2897 डिफाल्टरों के पास बकाया है। दिसंबर 2015 में (आरबीआई की फाइनेंशियल स्टैबिलिटी रिपोर्ट के मुताबिक) बैंकों का 4,43,691 करोड़ का कर्ज डूबने के कगार पर है। इसमें करीब सत्तर फीसद हिस्सा कंपनियों को दिया गया कर्ज है।
बैंक हमेशा दोहरी नीति अपनाते हैं। पचास-साठ हजार का कर्ज नहीं लौटाने वाले ग्राहकों के नाम तो शहर के चौक पर चस्पा कर दिए जाते हैं, लेकिन हजारों करोड़ रुपए नहीं लौटाने वालों के नाम बैंक नहीं बताते। अब सुप्रीम कोर्ट ने पांच सौ करोड़ रुपए से ज्यादा कर्ज लेकर न लौटाने वाले सभी ग्राहकों के नाम सौंपने का निर्देश रिजर्व बैंक को दिया है। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश की गूंज बैंकों से लेकर उद्योग चैंबरों तक में सुनाई दे रही है। अब तक आए नतीजे दिखा रहे हैं कि कम से कम छह सरकारी बैंकों का एनपीए मार्केट कैप यानी बाजार में उनकी वैल्यू से भी ज्यादा हो गया है। यह खतरे की घंटी है। कुछ बैंकों का एनपीए तो दस फीसद के करीब है। यही वजह रही है कि बाजार में राष्ट्रीयकृत बैंकों के शेयर गोता खाने लगे हैं।
जब सरकार ने किसानों के कर्ज माफ किए थे तो उसकी आलोचना में कहा गया था कि इससे देश की अर्थव्यवस्था पर घातक प्रभाव पड़ता है, राजस्व का नुकसान होता है, राजकोषीय घाटे में इजाफा होता है। यही लोग उर्वरकों पर दी जाने वाली सबसिडी का विरोध करते हैं लेकिन खुद लाखों करोड़ डकार कर भी जुबान नहीं खोलते। आज कॉरपोरेटरों के डिफॉल्टर होने पर उस स्तर पर विरोध होता नजर नहीं आता। किसानों से बैंक छोटे-छोटे कर्ज भी सख्ती से वसूलते हैं, वहीं पिछले साल करीब चालीस हजार करोड़ रुपए का कॉरपोरेट कर्ज बट्टे खाते में डाल दिया गया।
आंकड़ों के अनुसार एनपीए का सबसे बड़ा हिस्सा कॉरपोरेट कर्ज का है। वित्तवर्ष 2014-15 में 441 गैर-वित्तीय कंपनियों का कुल कर्ज 28.5 लाख करोड़ रुपए था, जो सभी 654 गैर-वित्तीय कंपनियों के कुल कर्ज का लगभग 98.1 प्रतिशत है। दूसरी तरफ इसी वित्तवर्ष में कर्ज लेने वाली कंपनियों का कुल कर्ज उनकी कुल शुद्ध बिक्री के 80.7 प्रतिशत, परिचालन लाभ के 68.9 और कुल 654 कंपनियों के शुद्ध लाभ के 39.4 प्रतिशत के बराबर है। इन कंपनियों का पूंजी निवेश पर रिटर्न (आर.ओ.सी.ई.) वित्तवर्ष 2014-15 में घट कर 7.4 प्रतिशत पर आ गया है, जो दशक का न्यूनतम स्तर है। यह 7.1 प्रतिशत की औसत ब्याज लागत से कुछ आधार अंक ही अधिक है। इस दर पर कई कंपनियां कर्ज अदायगी में चूक कर सकती हैं, क्योंकि बैंक कर्ज की किस्त तथा ब्याज लागत अदा करने के लिए उनका परिचालन लाभ पर्याप्त नहीं होगा। आज इनके समर्थक अर्थशास्त्री भी इस मुद््दे पर मूकदर्शक बने हुए हैं। क्या इससे देश की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी?
अर्थव्यवस्था को रचनात्मक रूप से गति देने के लिए सभी समझदार सरकारों द्वारा कॉरपोरेट जगत को विशेष सुविधा दी जाती है और कॉरपोरेट जगत से उम्मीद की जाती है कि वे आर्थिक सुधार की बुनियाद खड़ी करेंगे। लेकिन वे आज स्वयं बैंक कर्ज में डूब गए है या डूबने वाले हैं। विकास के लिए निजी क्षेत्र में निवेश आवश्यक है लेकिन बढ़ते एनपीए से उद्योग जगत के लिए पूंजी जुटाना मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि बैंक अब उद्योग जगत को कर्ज देने से परहेज कर सकते हैं। जबकि अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और विकास दर में इजाफा करने के लिए आवश्यक है कि बैंक कंपनियों को कर्ज वितरण में कोताही न बरतें क्योंकि उद्योग जगत को कर्ज मिलने से ही विनिर्माण क्षेत्र में तेजी, रोजगार में बढ़ोतरी, विविध उत्पादों की बिक्री में तेजी आदि संभव हो सकती है।
दस बड़ी कंपनियों के पास बैंकों का 7.32 लाख करोड़ रुपया फंसा हुआ है। बैंक कर्ज को पचाने के लिए कुछ कंपनियों द्वारा खुद को दिवालिया घोषित करने के मामले में बढ़ोतरी हुई है। भ्रष्टाचार के साथ-साथ कर्ज वसूली में बैंकों तथा सरकार का ढीला-ढाला रवैया भी कॉरपोरेट कर्ज के एनपीए में तब्दील होने का अहम कारण है।
कल तक ठोस धरातल पर खड़े अधिकतर सार्वजनिक बैंकों की हालत बेहद नाजुक हो गई है। जहां एनपीए का स्तर बेकाबू होता जा रहा है वहीं साइबर अपराधों और धोखेबाजी के जो मामले सामने आ रहे हैं उनमें डेबिट या क्रेडिट कार्ड का क्लोन बना कर आॅनलाइन खरीदारी या एटीएम से धन निकालने और फर्जी ऋण वितरण जैसे मामले शामिल हैं। बैंक प्रतिनिधि बन कर, कार्ड के सत्यापन, ब्लॉक होने या अन्य भय दिखा कर लोगों से फोन पर जानकारी प्राप्त कर, बैंकों से पैसे निकालने के मामले आए दिन सामने आते रहते हैं।
आज लाख प्रयासों के बावजूद धोखाधड़ी और फर्जी ऋण वितरण के चलते बैंकों को करोड़ों रुपयों का नुकसान हो रहा है। सरकारी बैंकों की तुलना में निजी बैंकों को अधिक जागरूक और सक्रिय माना जाता है। लेकिन पूंजी बाजार में निजी बैंकों की तीस प्रतिशत भागीदारी होने के बावजूद बैंकों में धोखाधड़ी से होने वाले नुकसान में उनकी भागीदारी अधिक है। देश का आर्थिक विकास इस कदर प्रभावित हो रहा है कि इन लाखों करोड़ रुपए को देश में आधारभूत सुविधाओं के विस्तार में खर्च किया जा सकता है। बैंकों में बढ़ते धोखाधड़ी के मामले निश्चित रूप से बैंकिंग व्यवस्था की कमजोरी को भी उजागर कर रहे हैं।
जो बैंक छात्रों को शिक्षा-ऋण देने के लिए थकाऊ कागजी कार्यवाही पूरी कराता है, गारंटर की गारंटी मांगता है, वही बैंक उद्योगपतियों पर इस कदर मेहरबान कैसे हो जाता है कि हजारों करोड़ रुपए बट्टे खाते में डालने की नौबत आ जाती है? अगर बैंकिग व्यवस्था लड़ाखड़ाई, तो अर्थव्यवस्था को लड़खड़ाते देर नहीं लगेगी। अमेरिका में बैंकिंग व्यवस्था के लड़खड़ाने से उसे भीषण मंदी के दौर से गुजरना पड़ा, जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ा। एनपीए वसूल नहीं होने या उसमें हो रही देरी के पीछे वजह यह भी है कि हमारे यहां राजनीतिक लोग यह तय करते हें कि बैंकों को कैसे चलाया जाए। बैंक स्वायत्तशासी नहीं हैं। जब तक राजनेताओं, व्यावसायिक घरानों और बैंकों का गठजोड़ बना रहेगा, बैंकों को बढ़ते एनपीए की समस्या से छुटकारा दिलाना आसान नहीं होगा। सारा खेल राजनीतिक दखल का है। बैंकों के प्रबंध मंडल तक में राजनीतिक नियुक्तियां होती हैं। प्रत्येक बैंक के प्रबंधन में रिजर्व बैंक व वित्त मंत्रालय के प्रतिनिधि भी होते हैं। बड़े कर्जों की मंजूरी बैंकों के बोर्ड ही करते हैं।
राजकोषीय घाटे को पाटने के लिए हर तरह की सबसिडी की सीमा बांधी जा रही है, लेकिन अर्थव्यवस्था की छाती पर एनपीए के रूप में जो सबसे बड़ा बोझ है उससे मुक्ति के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? एनपीए न सिर्फ बैंकों के लिए बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह है। वित्तमंत्री ने पिछले साल बैंकों के साथ बैठक के बाद उम्मीद जताई थी कि एनपीए की समस्या धीरे-धीरे खत्म होगी। लेकिन बैंकों के आंकड़े बताते हैं कि यह समस्या और गहराती जा रही है।

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