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टिकाऊ विकास के लिए

उत्तर आधुनिक दौर में हमने विकास की जिस आर्थिक नीति को स्वीकार किया हुआ है, वह औद्योगिक सभ्यता के मूल्यों का परिणाम है। पूर्णत: मशीन पर निर्भरता की वजह से श्रम का महत्त्व दिनोंदिन कम होता और पूंजी का महत्त्व बढ़ता जा रहा है..

प्रतिकात्मक तस्वीर।

उत्तर आधुनिक दौर में हमने विकास की जिस आर्थिक नीति को स्वीकार किया हुआ है, वह औद्योगिक सभ्यता के मूल्यों का परिणाम है। पूर्णत: मशीन पर निर्भरता की वजह से श्रम का महत्त्व दिनोंदिन कम होता और पूंजी का महत्त्व बढ़ता जा रहा है। और व्यक्ति के गुणों की पूछ घटती जा रही है। तभी तो मशीनीकरण के इस पागलपन को गांधीजी ने नकारा था। गांधीजी कहते हैं, प्रकृति के पास इतने पर्याप्त संसाधन हैं कि वह सभी लोगों की आवश्यकताएं पूरी कर सके, लेकिन वह एक आदमी के भी लोभ की पूर्ति नहीं कर सकती।

हम मानव समाज से तकनीक को अलग करके नहीं देख सकते। जैसे खेती करना लक्ष्य या साध्य है तो तकनीक हल-बैल हैं। तलाब, नदी, कुआं आदि जल संरक्षण की प्राकृतिक तकनीक रहे हैं, जिन्हें आधुनिक तकनीक ने बर्बाद कर दिया है। हजारों साल से इस शरीर को प्रकृति के साथ रखकर मनुष्य ने जिन प्रविधियों को आत्मसात किया है, वह भी तकनीक ही है। तकनीक जीवन को सरल बनाती है। गांधीजी ने इस व्यावहारिक तकनीक को स्वीकार किया तभी तो खादी, पशुपालन, कृषि एवं ग्रामोद्योग को स्वदेशी उत्पादन के रूप में स्थापित कर पुनर्निर्माण की दिशा में वे लगातार प्रयोग करते रहे।

जबसे प्राकृतिक जीवन-शैली की जगह कृत्रिम जीवन-शैली ने मानव समाज में स्थान बना लिया है, तब से जिसे मनुष्य ने मानक बना रखा था उसका महत्त्व बढ़ गया और जो जीवन-मूल्य था उसका महत्त्व घटता चला गया। जैसे रुपए-पैसे, सोने-चांदी या अन्य पदार्थ अनमोल हो गए और मानवीयता का कोई मोल ही न रहा। आज मशीन के बिना कोई काम संभव नहीं है। यों कहें, आज कोई भी क्षेत्र मशीनीकरण से अछूता नहीं है, बल्कि हर दिन नई-नई मशीन व तकनीक ईजाद हो रही है। आज मशीन के प्रति जैसा सम्मोहन दिखाई देता है, गांधीजी उसके खिलाफ थे। इसलिए उन्होंने समाज-निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करने वाली शिक्षा-व्यवस्था को वैकल्पिक तकनीक से जोड़ते हुए बुनियादी तालीम की बात की थी, जिसमें मस्तिष्क के विकास के साथ-साथ हृदय और हाथ का विकास का होना आवश्यक माना था। क्योंकि उनकी नजर में मानव शरीर स्वयं में एक मशीन है। उसकी संवेदनाओं को बनाए रखने के लिए शारीरिक श्रम निहायत आवश्यक माना गया है।

आज विकास जो पूर्णतया मशीनों के द्वारा संचालित हो रहा है, हमें संवेदनहीनता के साथ-साथ बेरोजगारी की भी सौगात दे रहा है। इस कारण आज तरह-तरह की सामाजिक-मानसिक बीमारियां फैल रही हैं, जैसे अनिद्रा, अकेलापन, अवसाद, अविश्वास और अनास्था। आज सवाल यह है कि जहां हम समय की गति के साथ आगे तो बढ़े हैं, वहीं आत्म-विकास की अपनी गति को हमने कम कर लिया है। और इसका नतीजा सामने दिख रहा है। तकनीकी शिक्षा को लेकर भी हमारी सोच इन्हीं पहलुओं पर केंद्रित है। तकनीक संबंधी गांधी की सोच पर सिर्फ छिटपुट चर्चा होकर रह गई है, वरना अब तक गांधी मॉडल ने दुनिया को इन सामाजिक बीमारियों के दलदल में फंसने नहीं दिया होता।

यह विकास मुट्ठी भर लोगों के लिए है। इस विकास में पर्यावण का विनाश हो रहा है। एसी, कल-कारखानों से निकलने वाली जहरीली गैसें हमारे वर्तमान के साथ-साथ भविष्य की भी दुश्मन हैं। इस तकनीक के आने के बाद बेरोजगारी बढ़ गई। लोग पेट तथा परिवार की खातिर अमर्यादित कार्य करने को मजबूर हो रहे हैं। परिवार टूट रहे हैं, पड़ोसी दुश्मन होते जा रहे हैं, प्रकृति रोज दोहन का शिकार हो रही है। मानवीय आस्थाओं का गला घोंटा जा रहा है। गांवों के लोग आज भी उन सारी चीजों का उत्पादन कर रहे हैं, जिनसे मानव और जीव-जगत बचा है। फिर भी गांव का महत्त्व दिनोंदिन कम किया जा रहा है। गांव के द्वारा उत्पादित चीजों का महत्त्व शहरों में उत्पादित वस्तुओं के सामने फीका नजर आता है। जेसीबी मशीन पच्चीस लोगों का काम कर सकती है लेकिन हमें निर्धारित करना होगा कि इसका प्रयोग कहां करें।

अगर हम सामान्य जगह पर उसका प्रयोग करते हैं तो वह गलत है, वह मानवता के हित में नहीं है। वास्तव में सारी स्थितियों का निर्धारणहम स्वयं ही कर सकते हैं जो हमारी नैतिकता से परिचालित होती हैं। सबके केंद्र में नैतिकता ही है। विज्ञान वरदान भी है और अभिशाप भी। उसे वरदान या अभिशाप हम ही बनाते हैं। तकनीक अगर आग है तो हम उससे चूल्हा जलाएं या घर को ही आग में झोंक दें, यह हमारे रुख और निर्णय पर निर्भर करता है। गांधीजी तकनीक के संतुलित प्रयोग के पक्षधर थे, जिसमें मनुष्य की उपेक्षा न हो। मनुष्य को उपेक्षित करके तकनीक को बढ़ावा देना उनकी समझ में मानवता को विनाश की ओर धकेलना है। गांधीजी तकनीक के खिलाफ नहीं थे, बस जरूरत के हिसाब से और सीमित प्रयोग को स्वीकार करते थे।

ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो मानते हैं कि तकनीक निरपेक्ष है, यानी न तो वह किसी विचारधारा से संचालित होती है न किन्हीं उद्देश्यों या स्वार्थों से। लेकिन यह धारणा भ्रामक है। तकनीक विचार-दृष्टियों से भी प्रभावित होती और उद्देश्यों तथा निहित स्वार्थों से भी। किसी भी तकनीक को अनिवार्य नियति की तरह नहीं माना जा सकता। अगर दुनिया में उग्र राष्ट्रवादी और साम्राज्यवादी रुझान न होते, तो क्या इतने विनाशक हथियारों का विकास हुआ होता? जाहिर है, तकनीकी विकास पर हमेशा तत्कालीन व्यवस्थाओं के न्यस्त स्वार्थों का दबाव रहता है। पर्यावरणीय संकट बढ़ रहा है। इसी के साथ-साथ प्रदूषण-रहित तकनीक की तलाश भी। पर इस दिशा में बहुत पहले बहुत सारे कदम उठाए जा सकते थे। वैसा नहीं हो सका तो इसीलिए कि विकास की चकाचौंध के लिए कुदरती संसाधनों का तेजी से दोहन जरूरी है और जो तकनीक इसे अंजाम दे सकती है उस पर निर्भरता भी। अगर हमें हरित तकनीक को अपनाना और अधिक से अधिक स्वीकार्य बनाना है तो विकास के प्रचलित मॉडल की जगह विकास की नई अवधारणा के बारे में सोचना होगा। विकास की नई सोच का मूल आधार यही हो सकता है कि तकनीक ऐसी हो जो प्रदूषण से निजात दिलाए, और दूसरे, प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग इस तरह हो कि वे आने वाली पीढ़ियों के लिए भी बचे रहें।

आज फिर से गांधीजी द्वारा बताई गई मूलभूत अवधारणा को आत्मसात करने की जरूरत महसूस हो रही है। उनके एकादश व्रत और रचनात्मक कार्यक्रम का वर्तमान संदर्भों के अनुसार पाठ करने की आवश्यकता है। एकादश व्रत का 1930 में प्रकाशित ‘मंगल प्रभात’ नामक पुस्तक में गांधीजी ने विस्तार से उल्लेख किया है, जिनमें सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, अस्वाद, अभय, शरीर श्रम, स्वदेशी, अस्पृश्यता निवारण, सर्वधर्म समभाव आदि हैं। इन सारे बिंदुओं पर नए सिरे से समग्र परिप्रेक्ष्य में विचार करने और रचनात्मक कार्यक्रम को भी आत्मसात करने की आवश्यकता है, जिनमें कौमी एकता, अस्पृश्यता निवारण, शराबबंदी, खादी, ग्रामोद्योग, गांवों की सफाई, नई या बुनियादी तालीम, स्त्री शिक्षा, प्रांतीय भाषाएं, राष्ट्रभाषा आदि को चिह्नित किया गया था।

तकनीक को प्रविधि भी कहते हैं। कोई भी प्रविधि नए सामाजिक ढांचे का निर्माण करती है जो आगे चल कर पुरानी समाज-व्यवस्था में बसी उन रूढ़ियों को बाहर निकालने के साथ-साथ नयापन लाती है। गांधी की प्रविधि को उनके उद्देश्य को ध्यान में रख कर ही समझा जा सकता है। गांधीजी का उद्देश्य अहिंसक समाज का निर्माण करना था, जिसमें सभी का उदय हो तथा उसमें न्याय और बंधुता के साथ समानता भी हो। इस तरह की समाज रचना के लिए गांधीजी के पास जो प्रविधि थी उसी के अंग थे सत्याग्रह, एकादश व्रत, रचनात्मक कार्यक्रम, ग्राम स्वराज, विकेंद्रीकरण, ट्रस्टीशिप आदि। इनका हर कोई अपने जीवन में पालन करना शुरू कर दे तो सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक तथा सांस्कृतिक व्यवस्था अपने आप सहिष्णुता से लैस हो जाएगी।

विकेंद्रीकरण का सिद्धांत तमाम तरह के केंद्रीकरण से निजात दिलाने तथा गांवों के सशक्तीकरण के लिए दिया गया था। पर आधुनिक मशीनीकरण आधारित विकास पर्यावरण के साथ-साथ गांवों को नष्ट करता जा रहा है। ट्रस्टीशिप के सिद्धांत के माध्यम से गांधीजी ने संसाधनों के न्यायसंगत इस्तेमाल का मंत्र दिया हैृ। संसार में कमजोर और बलवान सभी तरह के प्राणी हैं। जो जितना बलवान होता है, वह उतना अधिक संसाधनों का इस्तेमाल करना चाहता है। यहीं से व्यवस्था में अराजकता की स्थिति उत्पन्न होती है। गांधीजी यह मानते थे कि जिस तरह सूर्य की रोशनी, हवा, पानी पर किसी एक का हक नहीं है, वैसे ही सभी जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति से वास्ता रखने वाली व्यवस्थाओं में भी सबको बराबर का हक मिले। संपत्तिवान सिर्फ संपत्ति का रक्षक है, मालिक नहीं।

सत्याग्रह गांधीजी की सबसे उत्कृष्ट प्रविधि है। समाज में परिवर्तन तथा साथ ही मूल्यों को स्थापित करने के लिए यह बहुत ही उपयोगी है। पर सत्याग्रह को लागू करने के लिए इसके सभी आयामों का सही-सही इस्तेमाल जरूरी है, वरना अपेक्षित रूप में सत्याग्रह का प्रभाव समाज के सामने नहीं आ सकता। हम इसे आत्म-शुद्धि के लिए व्यक्तिगत जीवन में इस्तेमाल कर सकते है तथा जिस चीज की चाहत हो उसे प्राप्त करने के लिए भी। बस ध्यान इतना रखना पड़ेगा कि उस चीज को पाने की जल्दबाजी न हो। पर्यावरण को नष्ट करते जाने और कुदरती शैली से दूर होते जाने के परिणामस्वरूप तरह-तरह की बीमारियां पनप रही हैं। सामाजिक अशांति भी। इस सब को रोकने की कुंजी गांधी के विचारों में है।

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