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राजनीति: बुनियादी बदलाव की दरकार

भले कुछ मामलों में गिने-चुने राज्यों के आंकड़े देश के अन्य हिस्सों से बेहतर हैं, पर निचली कक्षाओं में मामूली सुधार को छोड़ दें, तो पूरे देश में शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है। ग्रामीण भारत लगातार सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्तर पर भयावह पिछड़ेपन से जूझ रहा है।

अपनी कक्षा में पढ़ते बच्‍चे। फाइल फोटो।

तमाम कोशिशों के बावजूद स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में कोई कांतिक्रारी सुधार नहीं दिखाई दे रहा है। देश में प्राथमिक शिक्षा का हाल यह है कि आज भी पांचवीं कक्षा के करीब आधे बच्चे दूसरी कक्षा की किताब ठीक से नहीं पढ़ सकते। आठवीं कक्षा के छप्पन फीसद बच्चे दो अंकों के बीच भाग नहीं कर पाते। स्कूलों में गुणवत्तापरक शिक्षा से हम अब भी कोसों दूर हैं।

यह ठीक है कि पिछली शिक्षा नीति की बहुत सारी त्रुटियां नई नीति में ठीक की गई हैं। फिर भी नई शिक्षा नीति को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं। मसलन, क्या ‘एजुकेशन 4.0’ के सभी घटकों पर यह नई शिक्षा नीति खरी उतरेगी? क्या यह भारतीय शिक्षा का भविष्य बदल देगी? क्या हम चौथी औद्योगिक क्रांति की प्रतिस्पर्द्धा में नंबर एक बन पाएंगे?

दुनिया के अधिकांश देशों में चौथी औद्योगिक क्रांति के मद्देनजर ‘एजुकेशन 4.0’ पर जोर दिया जा रहा है। वहीं भारत में रोजगारों के बदलते परिदृश्य के अनुरूप शिक्षा हम अपने छात्रों को नहीं दे पा रहे थे। निजी और सरकारी शिक्षा संस्थानों की शैक्षिक गुणवत्ता और संसाधनों के बीच की खाई सामाजिक असंतोष का कारण बन रही थी।

भले कुछ मामलों में गिने-चुने राज्यों के आंकड़े देश के अन्य हिस्सों से बेहतर हैं, पर निचली कक्षाओं में मामूली सुधार को छोड़ दें, तो पूरे देश में शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है। ग्रामीण भारत लगातार सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्तर पर भयावह पिछड़ेपन से जूझ रहा है। ऐसे में किसी कक्षा के आधे या एक फीसद छात्रों के अपने से निचली कक्षा के पाठ को पढ़ने में पहले की तुलना में सक्षम होने के आंकड़े से संतोष करना या उसे उपलब्धि मानना देश के भविष्य के प्रति आपराधिक लापरवाही होगी।

सर्व शिक्षा अभियान, शिक्षा का अधिकार कानून जैसे उपायों के बावजूद अगर ग्रामीण छात्र शिक्षित नहीं हो पा रहे हैं, तो यह सरकार और समाज की सोच और दिशा पर बड़ा सवालिया निशान है। यह सही है कि 2009 के शिक्षा को बुनियादी अधिकार मानने वाला कानून बनाने और सघन सर्व शिक्षा अभियान के कारण हमारे गांवों में लड़के-लड़कियों की स्कूली भर्तियां बढ़ी हैं और प्राइमरी के बाद पढ़ाई छोड़ने वालों की तादाद में भी कमी आई है, पर बड़ा सवाल कक्षा में उपस्थिति का नहीं, बल्कि यह है कि कक्षा में ग्रामीण बच्चे प्राथमिक शिक्षा तक की जो पढ़ाई कर रहे हैं उसका स्तर कैसा है?
आजादी के बाद हमारे यहां शिक्षा पर कई आयोग बैठे। दर्जनों रपटें आर्इं, जिनमें सचमुच कई क्रांतिकारी, पर साकार किए जा सकने वाले व्यावहारिक सुझाव थे। कुछ सुझावों पर अमल भी किए गए, फिर भी जितना सुधार कागजों में दिखा, उतना जमीन पर नहीं।

हालांकि यह कोई नई बात नहीं है। क्योंकि अपने संक्रमण काल से ही भारतीय शिक्षा को कई चुनौतियों और समस्याओं का सामना करना पड़ा। आज भी ये चुनौतियां और समस्याएं हमारे सामने हैं, जिनसे दो-दो हाथ करना है। स्वतंत्रता आंदोलन के साथ ही भारतीय शिक्षा को लेकर काफी जद्दोजहद चलती रही। आजादी के बाद भारत सरकार ने सार्वजनिक शिक्षा के विस्तार के लिए अनेक प्रयास किए। यह और बात है कि इन प्रयासों की अनेक खामियां भी सामने आई हैं, जिन्हें दूर करने का प्रयास किया जा रहा है।

बहरहाल, संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में इस बात का स्पष्ट जिक्र किया गया है कि निरक्षरता के कारण दुनिया भर की सरकारों को सालाना 129 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ रहा है। साथ ही दुनिया भर में प्राथमिक शिक्षा पर खर्च किया जाने वाला दस फीसद धन बर्बाद हो जाता है, क्योंकि शिक्षा की गुणवत्ता का ध्यान नहीं रखा जाता। इस कारण गरीब देशों में अक्सर चार में से एक बच्चा एक भी वाक्य पूरी तरह नहीं पढ़ सकता।

भले आजादी के बाद पिछले सात दशक में भारत ने बहुआयामी सामाजिक और आर्थिक प्रगति की है, लेकिन अगर साक्षरता की बात करें, तो इस मामले में आज भी हम कई देशों से पीछे हैं। आजादी के बाद देश की साक्षरता बढ़ाने के लिए कई कार्य किए गए और कानून बनाए गए, पर जितना सुधार कागजों में दिखा उतना असल में नहीं हो पाया।

भारत की सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को देखें तो एक सुव्यवस्थित व्यवस्था दिखती है, जिसमें एक सोच और संरचना है और यह व्यवस्था भली प्रकार से वांछित रूप से विकेंद्र्रीकृत भी है। मगर मौजूदा परिदृश्य को देखें तो पाते हैं कि इन सबके बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं दिख रहे हैं। व्यवस्था के सही तरह से काम न करने की गहराई में न जाकर ऐसी बातों पर विमर्श जारी है, जिनके आधार बहुत मजबूत नहीं दिखाई पड़ते। सच्चाई यह है कि राज्य सरकारें अब भी शिक्षा को लेकर पर्याप्त गंभीर नहीं हैं।

शायद इसलिए कि यह उनके वोट बैंक को प्रभावित नहीं करती। दरअसल, समाज के कमजोर तबके के बच्चे ही सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, जबकि संपन्न वर्ग के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। सरकारी स्कूलों की उपेक्षा का आलम यह है कि स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्तियां तक नहीं होतीं। एक या दो शिक्षक सभी कक्षाओं के बच्चों को पढ़ा रहे होते हैं। कई जगह तदर्थ या अंशकालिक शिक्षकों से काम चलाया जाता है।

इसके अलावा स्कूलों में ढांचागत सुविधाएं ठीक करने पर भी ध्यान नहीं दिया जाता। इन स्कूलों पर न तो कोई नियमन है और न ही गुणवत्ता सुनिश्चित करने की कोई व्यवस्था। ऐसा नहीं माना जा सकता कि सरकारी स्कूलों में सुधार नहीं हो सकता। असल बात दृढ़ राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की है।

गौर करने वाली बात यह है कि हमारा देश उन उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है, जो शिक्षा पर अपने सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) का मामूली हिस्सा ही खर्च करते हैं। इसे बढ़ाने की जरूरत है। इसके बिना शिक्षकों को जरूरी प्रशिक्षण देना और समुचित संसाधन उपलब्ध कराना संभव नहीं हो सकेगा। यह भी जरूरी है कि पाठ्यक्रम पूरा करने की जगह सीखने की क्षमता बढ़ाना पढ़ाई की प्राथमिकता बने।

बढ़ती युवा आबादी को रोजगार और जीवनयापन के बेहतर मौके उपलब्ध कराना फिलहाल एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। आज प्राथमिक शिक्षा में आमूल-चूल बदलाव की जरूरत है। उसमें निवेश बढ़ाया जाए, शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया बदली जाए। पाठ्यक्रम में परिवर्तन हो, छात्रों और अध्यापकों को कंप्यूटर और आधुनिक तकनीकी साधन उपलब्ध कराए जाएं। प्राथमिक शिक्षा को दुरुस्त करके ही समाज के हर वर्ग को विकास प्रक्रिया का साझीदार बनाया जा सकता है। गौरतलब है कि बेहतर साक्षरता दर से देश जनसंख्या बढ़ोतरी, गरीबी और लिंगभेद जैसी चुनौतियों से निपट सकता है।

बहरहाल, देश की बहुत सारी चुनौतियों और समस्याओं का समाधान करके एक बेहतरीन समाज बनाने का सपना तब तक साकार नहीं हो सकेगा, जब तक देश की एक बड़ी अशिक्षित आबादी साक्षर नहीं हो जाती। आज विश्व आगे बढ़ता जा रहा है और अगर भारत को भी प्रगति की राह पर कदम से कदम मिला कर चलना है तो शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करना होगा। असल में हमारे यहां की शिक्षा व्यवस्था में प्रयोगवादी सोच की कमी है।

देश में शिक्षा का कानून तो लागू कर दिया गया है, पर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य, जहां गरीबी अधिक है, वहां इसके सफल होने में काफी मुश्किलें आ रही हैं। लेकिन सरकारों को यह भी समझना होगा कि सिर्फ साक्षर बनाने से लोगों का पेट नहीं भरेगा, बल्कि शिक्षा के साथ कुछ ऐसा भी सिखाना होगा जिससे बच्चे आगे जाकर अपना पेट पाल सकें।

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