परिवहन में प्राथमिकता - Jansatta
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परिवहन में प्राथमिकता

इतिहास में ऐसा विरले ही होता है जब एक प्रचंड बहुमत से चुनी हुई सरकार जनाकांक्षा पर खरी उतरी हो या जन-दबाव को एक सही दिशा दे पाई हो। आज यही दिल्ली में दिखाई दे रहा है। तमाम आंकड़े और अध्ययन बता रहे हैं कि दिल्ली में प्रदूषण की समस्या गहराती जा रही है और […]

Author July 29, 2015 8:31 AM

इतिहास में ऐसा विरले ही होता है जब एक प्रचंड बहुमत से चुनी हुई सरकार जनाकांक्षा पर खरी उतरी हो या जन-दबाव को एक सही दिशा दे पाई हो। आज यही दिल्ली में दिखाई दे रहा है। तमाम आंकड़े और अध्ययन बता रहे हैं कि दिल्ली में प्रदूषण की समस्या गहराती जा रही है और हद से ज्यादा जानें लील रही है। सड़क हादसे महामारी की तरह बढ़ रहे हैं। रोडरेज में कोई न कोई जान हर रोज जा रही है। राजधानी के तमाम प्राकृतिक संसाधन धीरे-धीरे कारों के आगोश में समाते जा रहे हैं।

आम नागरिक के लिए पैर पसारने की जगह नहीं है लेकिन मोटरगाड़ियां पसरती ही जा रही हैं। ऐसे में सत्तर में से सड़सठ सीटों पर विजय हासिल करने वाली पार्टी की सरकार ‘बीआरटी का सार्वजनिक ढांचा’ तोड़ने के निर्णय को उचित ठहराते हुए कह रही है कि इसकी मांग उस इलाके के चुने हुए कुछ विधायकों और समाज के कुछ वर्गों की थी।

दिल्ली सरकार यह भी कहने से नहीं चूकती है कि ‘बीआरटी शहरी सार्वजनिक परिवहन के लिए बहुत ही उपयोगी है और दुनिया के जिन शहरों में यह लागू किया गया है वहां बहुत सफल हुआ है लेकिन दक्षिण दिल्ली में यह सफल नहीं है इसलिए यहां तोड़ने का निर्णय लिया गया है।’

दिल्ली के परिवहन मंत्री के द्वारा बुलाई गई एक बैठक में जब सरकार के आला अधिकारी बीआरटी के बारे में अपनी राय, आंकड़ों और अनुभवों को रखते हुए इसे सुधारने के बारे में बता रहे थे तब एक विधायक ने कहा कि ‘आज दिल्ली के हर घर में दो-तीन गाड़ियां हैं, इसलिए बस के बारे में बात करने की कोई जरूरत नहीं है।’ दूसरे विधायक ने कहा, ‘क्यों परेशान हो रहे हो, हमारी तो पजेरो बीआरटी बस लेन में इठलाते हुए चलती है।’ इस स्थिति में पार्टी और सरकार के मुखिया का यह फर्ज है कि वे सही दिशा दें और जन-दबाव को एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया की ओर ले जाएं, अन्यथा लोकतंत्र में जन-दबाव के नाम पर शक्तिशाली समूहों का ही हित सधने लगता है।

इसी जन-दबाव का बहाना बना कर पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने इस पूरे कॉरिडोर को सिर्फ 5.8 किलोमीटर पर छोड़ दिया और भाजपा कभी इसके पक्ष में नहीं आई। आज जब आम आदमी पार्टी की सरकार पूर्व की सरकारों से भिन्न होने का दावा कर रही है और अपने विधायकों को भ्रष्टाचार के रास्ते पर बहकने से रोके रखने के लिए तमाम तरकीबें अपना रही है तब इस जनहित के मामले में क्यों उनके दबाव में आ गई है? क्या इसका मतलब यह है कि बाकी पार्टियों की तरह ‘आप’ भी अपने सत्ता-हित में जनता का इस्तेमाल कर रही है?

लेकिन यह सनद रहे कि जो नेतृत्व अपने सिद्धांत को आम जनता के बीच जितना सान चढ़ाता है वह उतना ही जनप्रिय होता है और वह अपनी पार्टी के अंदर और बाहर के दबावों से हमेशा पार पाते हुए बाकियों से आगे निकलता रहता है। इसकी नजीर सियोल शहर में और उसके राजनीतिक नेतृत्व में देखी जा सकती है। आज जो हालत दिल्ली में है, वही सियोल में बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में थी। छान्गेचन नदी उस शहर की मुख्य और बड़ी नदी थी जिसमें कई सहायक नदियां आकर मिलती थीं।

शहर नियोजकों ने आधुनिकीकरण और औद्योगीकरण के नाम पर छान्गेचन और इसकी सहायक नदियों को सीवरेज में परिवर्तित कर दिया और कालांतर में इसे ढंक कर उस पर चार लेन का फ्लाइओवर और सड़कें बना दीं और आसपास की गरीब आबादी को जबरन हटा दिया। उनके स्थान पर आधुनिकीकरण और औद्योगीकरण के प्रतीक के रूप में शॉपिंग सेंटर और मॉल बना दिए गए। यह प्रक्रिया 1955 में शुरू हुई और 1977 में पूरी हुई। लेकिन कुछ ही दशक बाद वर्ष 2000 आते-आते पूरा इलाका वायु प्रदूषण, शोर और सड़क जाम का प्रतीक बन गया। इस इलाके में लोग जाने से कतराने लगे और वहां की रौनक गायब हो गई।

वर्ष 2001 में सियोल में मेयर का चुनाव था। ली म्युंग बाक मेयर पद के उम्मीदवार थे। उन्होंने वायदा किया कि अगर वे चुनाव में जीतते हैं तो फ्लाइओवर को तोड़ देंगे और नदी की धारा को पुनर्जीवित कर देंगे। ली मेयर चुनाव भारी बहुमत से जीत गए।
अब समय आया चुनाव में किए गए वायदे को पूरा करने का। औद्योगिक घरानों और समाज के संपन्न तबकों ने इसका विरोध शुरू कर दिया।

अपनी मुहिम को लेकर ली ने पूरे सियोल में अभियान चलाया। फिर नगर की सरकार ने इस पर जनमत करवाया। 79.1 प्रतिशत नागरिकों ने इसके पक्ष में मतदान किया। इस काम को पूरा करने में ली थोड़ा भी समय बर्बाद नहीं करना चाहते थे । वे जून 2001 में मेयर बने, फरवरी 2003 में छान्गेचन नदी के पुनर्जीवन का मास्टर प्लान बन कर तैयार हो गया। जून 2003 में फ्लाइओवर गिराने का काम आरंभ हुआ और सितंबर 2003 में पूरा हो गया। नदी को पुनर्जीवित करने का काम जुलाई 2003 में चालू हुआ और सितंबर 2005 में नदी में धारा आ गई।

दूसरी ओर, वहां 2003 में ही इसके समांतर बस रैपिड ट्रांजिट (बीआरटी) लाइन का काम भी चल रहा था और यह उसी फ्लाइओवर के विकल्प के रूप में बन रही थी जिस पर हर दिन सवा लाख से ज्यादा कारें गुजरती थीं। यह कॉरिडोर भी जून 2003 में बन कर तैयार हो गया, जो 14.5 किलोमीटर लंबा था। नगर निगम ने सियोल शहर में अठारह बस लेन बनाने की घोषणा की, जिनमें नौ में प्रतिबद्ध बस लेनें थीं। बस कॉरिडोर को मेट्रो के साथ जोड़ा गया जिससे शहर में निजी मोटरवाहनों पर निर्भरता कम हो गई और लोगों का सफर आसान हो गया। इन सबके बन जाने से कारों का उपयोग आधे से भी कम हो गया और शहर का गौरव लौट आया।

वर्ष 2007 में कोरिया में राष्ट्रपति का चुनाव हुआ जिसमें ली भारी बहुमत से चुन कर आए। चुनाव से पूर्व ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने लिखा था कि ‘इस बार का चुनाव उस व्यक्ति के लिए है जिसने मेयर के रूप में 1970 के दौरान बनाए गए किसी भी शर्त पर विकास के प्रतीक बदसूरत फ्लाइओवर को तोड़कर नदी की धारा को पुनर्जीवित किया है और जिसने शहरवासियों को उच्चस्तरीय जीवन दिया है।’

सियोल पूरे एशिया के लिए मानक हो सकता है और भारतीय शहरों में इसकी सख्त जरूरत है। दिल्ली न सिर्फ देश का रोल मॉडल है, बल्कि दक्षिण एशिया का भी। खुद सरकारी आंकड़े इसके गवाह हैं कि सड़क आधारित सार्वजनिक परिवहन को ठीक किए बगैर शहर के लोगों को सुचारु परिवहन की सुविधा नहीं दी जा सकती है।

दिल्ली में बसों की खस्ता हालत और जाम के बाद भी इनमें हर दिन पैंतालीस लाख से ज्यादा लोग सफर करते हैं। दिल्ली में सड़कों का फैलाव तैंतीस हजार किलोमीटर है और शहर चौदह सौ चौरासी वर्ग किलोमीटर में फैला है। ऐसी हालत में सरकार चाह कर भी मेट्रो से बस का विकल्प नहीं दे सकती। दूसरी ओर मेट्रो को बनाना, चलाना और रखरखाव काफी महंगा है, जो अंतत: आम जनता की जीवनचर्या के बजट से काट कर ही पूरा किया जाएगा; वह पैसा आपके शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी मूल सुविधाओं के बजट से काटा जाएगा। आज पूरी दुनिया में मेट्रो का फैलाव रुक गया है और बीआरटी का विस्तार रोज-ब-रोज बढ़ रहा है। हम आधुनिकता के नाम पर पुरानी पड़ी प्रणालियों को अपना रहे हैं।

आज दुनिया के तीन सौ शहरों में बीआरटी है और हमारी सरकार इसे उखाड़ने पर आमादा है। आज यह जरूरी है कि कोरिया ने जो गलती बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में की थी उससे सबक लेते हुए हमारी सरकार भी कार के मोह को त्याग कर समाज के सभी तबकों के लिए सोचे और सबके लिए उच्चस्तरीय सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था करे, न कि मोटर लॉबी के दबाव में फ्लाइओवर, सिग्नल फ्री कॉरिडोर, रिंग रोड और बाइपास बनाए और कुछ वर्षों बाद उसे तोड़ कर बस लेन बनाए।

दिल्ली बीआरटी सही दिशा में देर से उठाया गया कदम है। इसे तोड़ कर नहीं, ठीक से चला कर ही सुधारा जा सकता है। हमारे यहां सकारात्मक पक्ष यह भी है कि हाइकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का फैसला इसके पक्ष में है और समाज का समर्थन भी। आज जरूरत ली जैसे एक जनप्रिय और जनपक्षीय नेतृत्व की है, जो न सिर्फ वादा करे बल्कि वादा निभाने का राजनीतिक कौशल और साहस भी दिखाए।

हर पार्टी बीआरटी को तकनीक और डिजाइन का मामला बता कर इससे पल्ला झाड़ लेती है और कारों के लिए रास्ता बनाती है और जनता को उलझाए रखती है। यह शुद्ध रूप से राजनीतिक समस्या है और इसे राजनीतिक तौर पर ही सुलझाना पड़ेगा। देखना यह भी है कि हमारे देश का राजनीतिक नेतृत्व संसाधनों को लुटा कर सचेत होता है या संसाधनों को बचाते हुए विकास की दिशा और समाज की दशा बदलता है।

राजेंद्र रवि

 

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