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तीसरी धारा और वामपंथ का विलोपवाद

जो लोग मैदान से बाहर बैठ कर मैच देख रहे हैं, क्या वे यह आश्वस्ति पाल सकते हैं कि वे भी तालियां बजाते हुए कभी मैच जीत जाएंगे? दर्शक अगर किसी खिलाड़ी की जीत पर तालियां बजाए, तो यह स्वाभाविक है। लेकिन किसी और की जीत पर तालियां बजाता दर्शक अगर वास्तव में खिलाड़ी हो […]

जो लोग मैदान से बाहर बैठ कर मैच देख रहे हैं, क्या वे यह आश्वस्ति पाल सकते हैं कि वे भी तालियां बजाते हुए कभी मैच जीत जाएंगे? दर्शक अगर किसी खिलाड़ी की जीत पर तालियां बजाए, तो यह स्वाभाविक है। लेकिन किसी और की जीत पर तालियां बजाता दर्शक अगर वास्तव में खिलाड़ी हो और अपनी खिलाड़ी वाली भूमिका को भूल चुका हो तो उसका ऐसा करना हास्यास्पद है और त्रासद भी।

भारत की वामपंथी और सामाजिक न्याय, समाजवाद तथा बहुजनवाद की तीसरी धारा में गिनी जाने वाली पार्टियों की हालत इस समय ठीक उन दर्शकों वाली हो गई है, जो दरअसल मैदान के बाहर हैं और किसी एक खिलाड़ी की जीत पर तालियां बजा रहे हैं। बल्कि देखें, तो उनकी तालियां किसी की जीत के कारण नहीं हैं। वे किसी की हार पर ताली पीट रहे हैं। यह खुशी कुछ वैसी है जो मोहल्ले के दादा को किसी और दादा के हाथों पिटता देख कर मिलती है और तब यह चिंता नहीं होती कि आखिर राज तो किसी दादा का ही चलना है। दरअसल, तीसरी धारा की राजनीतिक शक्तियां, बसपा और वामपंथी दल इस समय विलोपवाद के दौर से गुजर रहे हैं, जिसका सबसे बुरा पहलू यह है कि अपने क्षय पर इनकी न नजर है न इसे लेकर कोई चिंता।

बहरहाल, दिल्ली विधानसभा चुनाव नतीजों को लेकर उठे गुबार के शांत होने के बाद अब राजनीतिक दल क्या खोया क्या पाया का हिसाब जोड़ने में लगे हैं। ऐसे समय में कम्युनिस्ट पार्टियों और तीसरी धारा के दलों के नेताओं के चेहरे पर खुशी और आत्मतुष्टि का एक अद्भुत भाव नजर आता है। इन तमाम दलों में यह आत्मिक संतोष है कि इस चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को एक बेहद करारी हार का सामना करना पड़ा है। वे खुश हैं कि मोदी के अश्वमेध यज्ञ के रथ के घोड़े को किसी ने सही, पर रोक तो दिया है। भाजपा के बदन के कुछ कपड़े उतरता देख मुदित और प्रफुल्लित होते हुए वे शायद यह नहीं देख पा रहे हैं कि उनके अपने बदन पर तो कपड़े बचे ही नहीं हैं।

दिल्ली में 2014 से पहले तक राजनीति हमेशा कांग्रेस बनाम जनसंघ/भाजपा के ध्रुवों में बंटी रही थी। लेकिन गौर करने वाली बात यह भी है कि 1977 के बाद से यहां हमेशा एक तीसरी शक्ति जैसी चीज बनी हुई थी। अलग-अलग चुनावों में तीसरी धारा के दलों को बीस फीसद तक वोट भी मिले हैं। इक्कीसवीं सदी के पहले दशक तक बसपा दिल्ली की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी थी। 2015 में बसपा यहां डेढ़ फीसद की पार्टी भी नहीं रही। लंबे समय तक दिल्ली में जनता दल परिवार की पार्टियां भी सीटें जीतती रही हैं। लेकिन अब यहां उनका भी पराभव हो चला है।

बात सिर्फ चुनावों की नहीं है। सिर्फ दिल्ली के चुनावों की तो कतई नहीं। हार सिर्फ चुनावी हो तो इसमें जीत की संभावना भी छिपी हो सकती है। भाजपा ने लोकसभा चुनावों में दो सीट से अपने दम पर पूर्ण बहुमत का सफर सिर्फ तीस साल में पूरा कर दिखाया है। भाजपा के जब सारे दिग्गज खेत रहे थे और उसके पास जब सिर्फ दो लोकसभा सीटें थीं, तब भी उसने अपनी राजनीति को बचाए रखा था। राजनीतिक विचार के रूप में अपनी परिभाषा का उग्र राष्ट्रवाद उसके पास सुरक्षित रहा। सवर्ण नेतृत्व में हिंदू एकता के व्यापक दर्शन, पाकिस्तान-विरोध की भू-राजनीतिक रणनीति और दक्षिणपंथी आर्थिक दृष्टि के मूलमंत्र को उसने कभी नहीं गंवाया। इसलिए भाजपा हारे या जीते, भाजपा की राजनीति अपनी निरंतरता में जारी रही। भाजपा के लिए राजनीतिक हार एक पड़ाव साबित हुई, जहां से उबर कर वह आगे की यात्रा करने की कोशिश करती है।

जब पिछली सदी के आठवें और नौवें दशक में भारतीय राजनीति में पिछड़ी और दलित जातियों के राजनीतिक सशक्तीकरण की प्रक्रिया तेज हुई तो इसके जवाब में भाजपा ने धर्म को राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनाने का दांव चला। यह दांव इतना कामयाब रहा कि आज भी सेक्युलर बनाम कम्युनल की बहस भारतीय राजनीति की केंद्रीय धुरी है। पिछले तीन दशक में भाजपा की सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि उसकी तैयार की हुई वैचारिक भूमि पर सभी दल खेल रहे हैं। भाजपा की राजनीति के सही या गलत होने पर बहस हो सकती है। लेकिन इस बात पर शक जताने का कोई कारण नहीं कि वह अपनी राजनीति कर रही है।

लेकिन क्या यही बात सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले दलों, बहुजन संगठनों और वामपंथी संगठनों के बारे में भी कही जा सकती है? याद करने की कोशिश करें कि तीसरी धारा की पार्टियों ने आखिरी बार कब आरक्षण जैसा सामाजिक न्याय का कोई मुद््दा उठाया था? जाति-मुक्त भारत के निर्माण की दिशा में समाजवादी धारा की आखिरी पहल कब हुई थी? जमीनी व्यवहार की बात तो छोड़ दें, इन दलों ने नारे के तौर पर भी सामाजिक न्याय का नाम लेना अरसा पहले बंद कर दिया है।

बहुजन समाज पार्टी बहुजनवाद के बूते सिर्फ दो दशक में देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई थी। अब सर्वजनवाद अपनाकर वह एक आत्मघाती दौर में प्रवेश कर चुकी है। इसलिए अगर ये दल राजनीति के हाशिए पर चले भी जाते हैं तो इसे सामाजिक न्याय की राजनीति की हार कहना सही नहीं होगा, क्योंकि इन दलों ने सामाजिक न्याय की राजनीति से छुटकारा पा लिया है। समाजवादी पार्टी, जनता दल (एकी) या राष्ट्रीय जनता दल के लिए सामाजिक न्याय अब एक असहज मुद््दा बन चुका है। और यह बात किसी एक चुनाव में जीतने या हारने से बहुत बड़ी है।

वामपंथी दलों के लिए विलोपवाद और भी गंभीर समस्या है। खासकर आर्थिक मुद्दों पर वामपंथी दलों ने अपनी अलग पहचान नष्ट कर ली है। पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों ने सरकार में रहते हुए जिन नीतियों पर अमल किया, उन्हें किसी भी मायने में वामपंथी नहीं कहा जा सकता। जमीन अधिग्रहण जैसे मुद््दे पर सिंगूर और नंदीग्राम के अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि कांग्रेस और भाजपा ने भी कॉरपोरेट हित में इस कदर आगे बढ़ कर जनता पर जुल्म नहीं ढाए होंगे, जो बंगाल की वाममोर्चा सरकार ने किया था। वाममोर्चा अगर अपनी कमजोर पड़ती हालत के लिए सिर्फ सांगठनिक कारणों को जिम्मेदार मान रहा है, तो इसका यह भी मतलब है कि उसने अपनी राजनीतिक भूलों से न सीखने का फैसला कर लिया है। अपनी राजनीतिक गलतियों की वजह से वामपंथी दलों ने इस देश के वंचितों का नेतृत्व करने की अपनी स्वाभाविक भूमिका से खुद को विस्थापित कर लिया है। इंकलाब के वामपंथी नारे अब उसके अपने स्वाभाविक जनाधार को भी आश्वस्त नहीं करते और न ही कोई जोश जगाते हैं।

अब ऐसे सामाजिक न्यायवादी, समाजवादी, बहुजनवादी और वामपंथी दल अगर दिल्ली के विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार और आम आदमी पार्टी की जीत पर खुशियां जता रहे हैं, तो इसे त्रासदी के अलावा और क्या कहा जा सकता है? दिल्ली चुनाव के नतीजे साफ तौर पर दिखा रहे हैं कि आम आदमी पार्टी ने सेक्युलर धारा के राजनीतिक दलों की जमीन पर कब्जा करके अपनी जीत का करिश्मा दिखाया है। भाजपा के वोट बैंक में आम आदमी पार्टी ने कोई सेंध नहीं लगाई है। भाजपा और आप बेशक इस समय एक दूसरे से संघर्षरत नजर आती हों, लेकिन दोनों दलों के बीच विचारधारा के स्तर पर कोई अंतर्विरोध नहीं है। दोनों दलों के नेता आसानी से टहलते हुए एक दूसरे के दल में चले जाते हैं और विचारधारा के मामले में उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती और कोई उनसे इस बारे में सवाल भी नहीं पूछता। दिल्ली के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद के दोनों दावेदार तथाकथित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से उभर कर आए।

इस बात में संदेह का कोई कारण नहीं है कि अगर आम आदमी पार्टी का विस्तार अन्य राज्यों में होता है, तो यह सेक्युलर, बहुजनवादी और वामपंथी दलों की कीमत पर ही होगा। इसलिए तीसरी धारा के दलों और वामपंथी पार्टियों के लिए आम आदमी पार्टी की दिल्ली में जीत खुश होने का नहीं, सावधान हो जाने का मौका है। वामपंथ के लिए तो यह संकटकाल है क्योंकि दिल्ली चुनावों के फौरन बाद पश्चिम बंगाल में हुए उपचुनाव दिखा रहे हैं कि अपने इस ऐतिहासिक गढ़ में वामपंथी दल तीसरे पायदान पर खिसक रहे हैं और भाजपा वहां तृणमूल कांग्रेस के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के तौर पर उभर चुकी है।

सामाजिक न्यायवादी, समाजवादी, बहुजनवादी और वामपंथी दलों को इस बात पर गौर करना चाहिए कि लोकसभा चुनाव में भाजपा की भारी जीत और फिर दिल्ली के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की जीत के बाद आज सामाजिक न्याय के जरिए जातिमुक्त लोकतांत्रिक भारत बनाने के महान सपने की बात किस तरह हाशिए पर चली गई है। राष्ट्रीय विमर्श में सामाजिक लोकतंत्र की आज चर्चा तक नहीं हो रही है।

आम आदमी पार्टी के विचारक दिल्ली चुनाव में जीत की व्याख्या इस तरह कर रहे हैं कि दिल्ली में लोगों ने जाति और वर्ग से ऊपर उठ कर उसे वोट दिया है और इसे देश में जाति की राजनीति के अंत के तौर पर देखा जाना चाहिए। अपने जख्म चाटते आरएसएस के विद्वान भी इस बात में संतुष्टि महसूस कर रहे हैं कि जाति की राजनीति का अंत हो गया है। दोनों की खुशी का समान बिंदु जातिमुक्त भारत के सपने को लगे एक तात्कालिक झटके को लेकर है।

इसी तरह वामपंथी राजनीतिक वैचारिकी भी हाशिए पर पहुंच गई है। वर्गीय सवालों की जगह, भ्रष्टाचार-मुक्त भारत, मेक इन इंडिया और स्वच्छ भारत जैसे हवाई नारों ने ले ली है। काले धन की वापसी को भाजपा ने खुद ही एक चुनावी जुमला करार दिया है और आम आदमी पार्टी, बिजली कंपनियों के अपवाद के छोड़ दें तो, पूरे कॉरपोरेट इंडिया के साथ कदमताल करने में जुट गई है। आम आदमी पार्टी ने किसी भी अहम मुद््दे पर अपनी राय जाहिर न करने को अपनी ताकत के तौर पर इस्तेमाल करने की कला विकसित कर ली है और उसे फौरी तौर पर इसका फायदा भी मिला है।

आम आदमी की परिभाषा का विस्तार झुग्गी वालों से लेकर कंपनियों के चेयरमैन तक हो गया है और आम आदमी पार्टी एक साथ इन सबके हित पूरे करने के लिए योगासन की अजीब सी मुद्रा में नजर आ रही है। पार्टी की व्याख्या के अनुसार इस देश का हर नागरिक भ्रष्टाचार से पीड़ित है और दूसरे ग्रह के कुछ लोग आकर भारत में भ्रष्टाचार फैला रहे हैं। इसलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में कोई दुश्मन नहीं है। वैसे भी जो वंदे मातरम और भारत माता की जय बोलता है, वह भ्रष्ट हो ही नहीं सकता! सवाल ही नहीं उठता!

दिलीप मंडल

 

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