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अपनी धुन पर हमें नचा रहा पाकिस्तान: रक्षा विशेषज्ञ

शहीद प्रेमसागर, शहीद परमजीत सिंह, शहीद प्रभु सिंह, शहीद मंदीप सिंह ये देश के उन जांबाजों के नाम हैं जो पिछले छह महीने के अंदर पाकिस्तानी सेना की बर्बरता के शिकार हुए।

Author May 6, 2017 01:26 am
पाकिस्तान के पूर्व पीएम नवाज शरीफ

शहीद प्रेमसागर, शहीद परमजीत सिंह, शहीद प्रभु सिंह, शहीद मंदीप सिंह ये देश के उन जांबाजों के नाम हैं जो पिछले छह महीने के अंदर पाकिस्तानी सेना की बर्बरता के शिकार हुए। पिछले डेढ़ साल के अंदर उरी, पठानकोट, पंपोर जैसे आतंकी हमलों को अंजाम देकर पाकिस्तान हमारे 35 सैनिकों को शहादत की भेंट चढ़ा चुका है। ऐसे में रक्षा विशेषज्ञों ने एक सुर में कहा कि समय आ गया है जब भारत, पाकिस्तान के प्रति अपने जवाबी रवैए को छोड़कर पूरी तरह से आक्रामक रुख अपनाए, ‘अब पहल हम करें, चुनाव हमारा हो, जवाब वो तय करे’। विशेषज्ञों ने ‘काउंटर जिहादी बल’ तैयार करने तक की सलाह दे डाली। हालांकि, पाकिस्तान के साथ बातचीत का रास्ता बंद किया जाए या नहीं – इस पर राय बंटी हुई है। लेकिन फौज के बजाय पुलिस सेवा से या राजनयिकों को राष्टÑीय सुरक्षा सलाहकार के पद बिठाए जाने की परंपरा भी सवालों के कठघरे में है।

मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) पीके सहगल ने कहा कि हमें कई स्तर पर सोचना होगा। बकौल सहगल, ‘पिछले 15-20 सालों से हम पाकिस्तान के मामले में केवल प्रतिक्रिया देते आए हैं। पहल वो करता है, हमें वो चुनता है, लक्ष्य, हथियार, हमले का पैमाना सब वो तय करता है। उसकी बैंड पर हम नाच रहे हैं। रणनीति में बड़े पैमाने पर बदलाव लाना होगा। पाकिस्तान ने अपने लांच पैड, आतंकी कैंप बना रखे हैं, उसकी मंशा जाहिर है, लेकिन वो संघर्षविराम का उल्लंघन कर घुसपैठ करे, उसके बजाय हर हफ्ते हमें तीन-चार जगहों पर कुछ ऐसी हरकत करने की जरूरत है कि वो जवाब की सोचे’।

लक्षित सैन्य हमले को एक सोची-समझी और नायाब जवाबी कार्रवाई करार देते हुए मेजर सहगल कहते हैं कि इसका आरंभिक असर तो पड़ा, पाक के आतंकी प्रशिक्षण कैंप बॉर्डर से पीछे कर लिए गए, लांच पैड हटाए गए, लेकिन कुछ समय ही ऐसा रहा। मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) अशोक मेहता ने भी कहा कि लक्षित हमला बार-बार नहीं कर सकते, इसकी अपनी सीमाएं हैं और युद्ध हम चाहते नहीं। ऐसे में हमें लगातार आक्रामक रुख अपनाना ही होगा। लेकिन अशोक मेहता ने यह प्रश्न भी रखा कि इस आक्रामकता को कौन अंजाम दे। हमारे पास केवल सेना है, वैसी काबीलियत नहीं, जैसे पाकिस्तान के पास जेहादी हैं। बकौल मेहता, ‘पूर्व सेना प्रमुख शंकर राय चौधरी सहित मेरी और कई लोगों की राय रही है कि जो आतंकी आत्मसमर्पण कर चुके हैं उन्हें लेकर कांउटर जेहाद बल बने, ऐसी सिविलियन फोर्स जो देश के लिए मर मिटने को तैयार हो’। मेहता ने कटाक्ष किया, ‘आजकल इतनी राष्टÑीयता, देशभक्ति की बात हो रही, कहां गए ये लोग, उनको प्रशिक्षण दे फौज खड़ी करें’।

पीके सहगल ने मौजूदा मोदी सरकार को पिछले 20 सालों का सबसे मजबूत सरकार बताया, लेकिन कहा कि वह अब तक बदलाव लाने में असमर्थ रही है। उन्होंने सवाल किए कि अमेरिका, यूरोपीय संघ, संयुक्त राष्टÑ को बोलने के बजाय हम पहले अपनी संसद से प्रस्ताव पारित कर पाकिस्तान को आतंक प्रायोजक राष्ट्र घोषित क्यों नहीं करते? इसके अलावा हम यूएन जनरल असेंबली, सार्क, जी-20 जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंक को प्रश्रय देने वाले राष्टÑ के रूप में पाकिस्तान का सीधे नाम लेने से क्यों कतराते हैं? क्यों नहीं अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष पाकिस्तान के खिलाफ एकजुट होकर वैसे बर्ताव की मांग रखते हैं जैसा आतंकी संगठन आइएस के साथ किया जा रहा है। ऐसी रणनीतियों को अंजाम देने के लिए अशोक मेहता ने राष्टÑीय सुरक्षा सलाहकार के पद पर फौजी को बिठाने की जरूरत बताई क्योंकि आइबी अधिकारी या डिप्लोमैट को सीमा पर की कार्रवाई की समझ नहीं होती। उनके मुताबिक, अमेरिकी सरकार में सुरक्षा सलाहकार सहित कई प्रमुख पदों पर पूर्व फौजी हैं।

वहीं सहगल के मुताबिक, भारत की एक कूटनीतिक कोशिश यह होनी चाहिए कि पाकिस्तान की आवाम, मीडिया और न्यायपालिका के बीच यह सच फैलाया जाए कि कैसे पाक सेना पैसे और वर्चस्व के लिए अपने ही देश के कुछ हिस्सों को चीन के पास गिरवी रख चुका है और गिलगिट व बाल्टिस्तान को भी रखने की कोशिश जारी है। ताकि वहां की फौज के खिलाफ आंदोलन हो क्योंकि पाक आवाम और सरकार, दोनों भारत के साथ कहीं न कहीं दोस्ती चाहते हैं।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और पूर्व राजनयिक एसडी मुनी ने कहा कि मोदी सरकार अभी तक यह निर्णय ही नहीं ले पाई है कि पाकिस्तान हमारा पड़ोसी है या दुश्मन। सरकार के सत्ता में आने के तुरंत बाद की गई पहल ‘नेबरहुड फर्स्ट’ को कठघरे में रखते हुए मुनी ने कहा कि कुल मिलाकर स्थिति निराशाजनक है। उन्होंने कहा, ‘हिंदुत्व के नाम पर वादा करते हैं नेपाल का, लेकिन उसके साथ हमारे रिश्ते आज किस स्थिति में हैं? श्रीलंका, मालदीव, म्यांमार के साथ भी कुछ बेहतर नहीं, बांग्लादेश से भी तीस्ता विवाद अभी अनसुलझा है’। बकौल मुनी, ‘आप छोटे मुल्कों से प्यार से नहीं बात करेंगे, धौंस दिखाएंगे तो कुछ ठीक नहीं हो सकता। देश के अंदर भी गोमांस के नाम पर कुछ ऐसा ही हो रहा है और कश्मीर के भी हालात ठीक नहीं हैं। जब आप अंदर में बिखराव करेंगे तो बाहर से कैसे सब कुछ संगठित कर पाएंगे’। अशोक मेहता के मुताबिक भी सीमा पर की 40-50 फीसद समस्या इस वजह से है कि अंदरूनी हालत ठीक नहीं जिसका फायदा पाकिस्तान को मिल रहा है।

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