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राजनीतिः अनाज पैदावार पर गहराता संकट

भारत के संदर्भ में कृषि की अनदेखी की बात करें तो आजादी के सात दशकों में विकास की तमाम योजनाओं के बाद भी किसानों की दशा में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। उसका नतीजा यह है कि किसानों का कृषि से मोहभंग हो रहा है और वे कृषि के बजाए अन्य कार्यों के प्रति उन्मुख हो रहे हैं। इससे देश में किसानों की संख्या घट रही है और इसका सीधा असर अनाज की पैदावार पर पड़ रहा है।

Author August 8, 2018 3:05 AM
यूरोपीय आयोग के ज्वाइंट रिसर्च सेंटर (जेआरसी) की रिपोर्ट- वर्ल्ड एटलस ऑफ डेजिटीफिकेशन- ने एक बड़े खतरे की ओर इशारा किया है।

अभिजीत मोहन

यूरोपीय आयोग के ज्वाइंट रिसर्च सेंटर (जेआरसी) की रिपोर्ट- वर्ल्ड एटलस ऑफ डेजिटीफिकेशन- ने एक बड़े खतरे की ओर इशारा किया है। चिंतित करने वाली बात यह है कि आने वाले कुछ वर्षों में दुनिया भर में अनाज की पैदावार घटेगी और खाने के लाले पड़ सकते हैं। सबसे गंभीर और भयावह स्थिति भारत, चीन और उप-सहारा अफ्रीकी सहित उन देशों की होगी जहां जलवायु परिवर्तन, भू-क्षरण और सूखा पड़ने की वजह से भूमि क्षेत्र की गुणवत्ता खत्म हो रही है। रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ है कि पृथ्वी के तीन चौथाई भूमि क्षेत्र की गुणवत्ता पहले ही खत्म हो चुकी है और सदी के मध्य तक यह आंकड़ा अधिक व्यापक हो सकता है जिसका सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव अनाज पैदावार पर पड़ेगा।

कुछ साल पहले संयुक्त राष्ट्र के टिकाऊ विकास एजेंडे के तहत दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्षों ने भूमि क्षेत्र को रेगिस्तान बनने से बचाने और भूमि व मिट्टी की गुणवत्ता लौटाने के प्रयास करने की प्रतिबद्धता जताई थी। इस एजेंडे के तहत उस भूमि पर भी अनाज पैदा करने का संकल्प जाहिर किया गया था जो मरुस्थल बन चुकी है और जो सूखे व बाढ़ से प्रभावित रहती है। लक्ष्य यह था कि 2030 तक समूची पृथ्वी के भूमि क्षेत्र को उसकी गुणवत्ता लौटाई जा सके। लेकिन विडंबना है कि वर्षों गुजर गए, मगर अभी तक किसी भी देश ने इस संबंध में ठोस कदम नहीं उठाया है। अगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो दुनिया के विभिन्न हिस्सों में खाद्यान्न व्यवस्था ठप पड़ जाएगी और लोगों को अपना घर-बार छोड़ कर दूसरे इलाकों में शरण लेनी पड़ेगी। यह देखा भी जा रहा है कि दुनिया के कई देशों में भुखमरी का संकट उत्पन्न हो गया है और वहां के नागरिक दूसरे हिस्सों में पलायन कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट से भी यह सामने आ चुका है कि विश्व में भुखमरी के शिकार लोगों की तादाद कम होने के बजाए लगातार बढ़ रही है।

रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2015 में सतहत्तर करोड़ लोग भूख पीड़ित थे, जो 2016 में बढ़ कर इक्यासी करोड़ हो गए। इसी तरह 2015 में अत्यधिक भूख पीड़ित लोगों की संख्या आठ करोड़ और 2016 में दस करोड़ थी, जो 2017 में बढ़ कर बारह करोड़ से ज्यादा हो गई है। भारत की बात करें तो यहां हर वर्ष तीन हजार से अधिक लोगों की मौत भूख की वजह से होती है। वर्ल्ड एटलस ऑफ डेजिटीफिकेशन रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन, भूमि-क्षरण और सूखे से बचाव नहीं किया गया तो 2050 तक वैश्विक अनाज उत्पादन घट जाएगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि अनाज उत्पादन पर मंडराते संकट के लिए कृषि की अनदेखी, जंगलों का कटाव और शहरों का अंधाधुंध विकास भी जिम्मेदार है।

भारत के संदर्भ में कृषि की अनदेखी की बात करें तो आजादी के सात दशकों में विकास की तमाम योजनाओं के बाद भी किसानों की दशा में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। उसका नतीजा यह है कि किसानों का कृषि से मोह भंग हो रहा है और वे कृषि के बजाए अन्य कार्यों के प्रति उन्मुख हो रहे हैं। इससे देश में किसानों की संख्या घट रही है और इसका सीधा असर अनाज पैदावार पर पड़ रहा है। आंकड़ों पर गौर करें तो 2001 में देश में बारह करोड़ तिहत्तर लाख किसान थे, जिनकी संख्या वर्ष 2011 में घट कर ग्यारह करोड़ सत्तासी लाख रह गई। यानी दस वर्षों में ही छियासी लाख किसान कृषि कार्य से विरत हो गए। अगर सरकार ने कृषि कार्य के प्रति संवेदनशीलता नहीं दिखाई तो आने वाले वर्षों में किसानों की संख्या और घटेगी जिसका प्रतिकूल प्रभाव अनाज पैदावार पर पड़ेगा।

अनाज पैदावार में कमी का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारण विश्व की जनसंख्या में लगातार वृद्धि होना है। अगर जनसंख्या वृद्धि के अनुपात के मुताबिक अनाज नहीं हुआ तो सबको भोजन मिलना मुश्किल होगा। यहां समझना होगा कि जब तक जनसंख्या वृद्धि पर लगाम नहीं लगेगी, तब तक अनाज की मांग बढ़ती रहेगी। विकास के नाम पर उद्योग-धंधे, सड़कें और कल-कारखाने लगाने के लिए हर वर्ष लाखों हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि का अधिग्रहण भी अनाज उत्पादन को प्रभावित कर रहा है। भारत की ही बात करें तो विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) और हाइवे के निर्माण के नाम पर अब तक लाखों हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि का अधिग्रहण किया जा चुका है।

इकोनॉमिक सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि देश में उदारीकरण की नीतियां लागू होने के बाद 1990 से लेकर 2005 के बीच लगभग साठ लाख हेक्टेयर खेती की जमीन का अधिग्रहण किया गया। मौजूदा समय में यह आंकड़ा सत्तर लाख हेक्टेयर के पार पहुंच चुका है। जाहिर है, जब जमीनें सिकुड़ेंगी तो अनाज भी कम होगा। दुनिया के जिन हिस्सों में खेती की जमीन को अधिग्रहीत किया जा रहा है, उन क्षेत्रों में विस्थापन को लेकर विकट समस्या उत्पन हो गई है। अपनी जमीन गंवाने के बाद किसानों के पास जीविका का कोई साधन नहीं रह गया है। लिहाजा, वे खानाबदोशों की तरह जिंदगी गुजारने को विवश हैं।

अनाज उत्पादन में कमी के असर को कम करने के लिए यह आवश्यक है कि अनाज की बर्बादी को रोका जाए। एक आंकड़े के मुताबिक भारत में हर साल उतना अन्न बर्बाद होता है, जितना ब्रिटेन उपभोग करता है। भारत में कुल पैदा किए जाने वाले भोज्य पदार्थ का तकरीबन चालीस प्रतिशत बर्बाद हो जाता है। दुनिया के अन्य देशों की भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही है। बेहतर होगा कि अनाज की बर्बादी रोकने की ठोस पहल हो। अनाज पैदावार में कमी के लिए क्षेत्रवार विषमता का बढ़ना, प्राकृतिक बाधाओं से पार पाने में विफलता, भूजल का खतरनाक स्तर तक पहुंचना, जलवायु परिवर्तन जैसे कारक भी जिम्मेदार हैं। लेकिन आश्चर्य की बात है कि इस दिशा में सुधार की कोई पहल नहीं हो रही है।

अनाज उत्पादन पर जलवायु परिवर्तन का प्रतिकूल असर देखने को मिल रहा है। तापमान में वृद्धि से पौधों में कई प्रकार के रोग फैल रहे हैं और पीड़क जंतु, खरपतवार और श्वसन क्रिया की दर में वृद्धि हो रही है। इन सभी के कारण अनाज उत्पादन घटता जा रहा है। यह तथ्य है कि भूमंडलीय तापमान में वृद्धि से खाद्य उत्पादन गिरता है। अगर इस पर नियंत्रण नहीं किया गया तो खाद्य संकट और गहराएगा। इसके अलावा ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की बढ़ती मात्रा ने धरती पर हवा और पानी का तापमान बढ़ा कर एक नया संकट उत्पन्न कर दिया है। कार्बन उत्सर्जन की दर भी बढ़ रही है। अगर इसमें कमी नहीं आई तो 2050 तक न केवल अनाज का उत्पादन कम होगा, बल्कि दुनिया भर में पंद्रह करोड़ लोग प्रोटीन की कमी के भी शिकार होंगे। हार्वर्ड टीएच चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2050 तक भारतीयों की प्रमुख खुराक से 5.3 प्रतिशत प्रोटीन गायब हो जाएगा। इस कारण करोड़ों भारतीय प्रोटीन की कमी से जूझेंगे।

अब तक वायुमंडल में छत्तीस लाख टन कार्बन डाइआक्साइड की वृद्धि हो चुकी है और चौबीस लाख टन आक्सीजन खत्म हो चुकी है। कृषि वैज्ञानिकों का दावा है कि इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य और अनाज उत्पादन पर पड़ रहा है। इस भयावह स्थिति से बचने के लिए मिट्टी संरक्षण, टिकाऊ जमीन और जल के सीमित उपयोग की नीतियां कृषि, जंगल और जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में लागू करनी होंगी। साथ ही, अमूल्य संसाधनों के उपयोग के तौर-तरीके भी बदलने होंगे। चूंकि खेती-बाड़ी का काम लगातार जटिल होता जा रहा है, इसे देखते हुए आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जाए और साथ ही किसानों को सूचना व्यवस्था से जोड़ा जाए, ताकि बेहतर कृषि के जरिए अनाज के उत्पादन में वृद्धि कर सकें।

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