अंधेरे का गहराता संकट

एक अध्ययन के अनुसार 2050 तक दुनिया में ऊर्जा की मांग तीन गुना ज्यादा बढ़ जाएगी।

सांकेतिक फोटो।

अभिषेक कुमार सिंह

एक अध्ययन के अनुसार 2050 तक दुनिया में ऊर्जा की मांग तीन गुना ज्यादा बढ़ जाएगी। भारत-चीन जैसे विकासशील देशों में तो यह मांग इतनी तेजी से बढ़ेगी कि इसे पूरा करने में पसीने छूट जाएंगे। विकास की राह पर तेजी से बढ़ने की कोशिश करते भारत जैसे देश के लिए ऊर्जा में स्वावलंबन हासिल करना सबसे बड़ी जरूरत है। हमें कारखाने लगाने हैं, उत्पादन बढ़ाना है, करोड़ों युवाओं के लिए रोजगार पैदा करना है। ये सारे लक्ष्य जिस एक जरूरत की तरफ इशारा करते हैं, वह है ऊर्जा यानी बिजली। देश में कोयले की कमी के कारण बिजली संकट गहराता जा रहा है। हालात ये हैं कि केंद्र के आश्वासन के बावजूद कोई इस बात पर यकीन करने को तैयार नहीं है कि कोयले की कमी के चलते देश के ज्यादातर इलाके जल्द ही अंधेरे में डूबे नजर नहीं आएंगे।

बीते कुछ समय से ऐसी खबरें लगातार आ रही हैं कि कोरोना काल में बिजली की मांग कई गुना बढ़ने और अन्य कारणों से ताप बिजलीघरों में कोयले की कमी हो गई है। कहा तो यहां तक गया है कि ज्यादातर संयंत्रों के पास कुछ ही दिनों का कोयला बचा है। अगर वाकई ऐसा है तो महामारी की मार के बाद पटरी पर लौटती अर्थव्यवस्था के लिए यह किसी झटके से कम नहीं होगा। इस स्थिति में देश के सामने यह सवाल खड़ा होगा कि आखिर हमारी सरकार एक सौ चालीस करोड़ की आबादी वाले मुल्क की जरूरतों का आकलन करने में कैसे विफल हो गई और उसने बिजली जैसी आवश्यक चीज के संकट का पहले से आकलन कर हालात से निपटने का उपाय क्यों नहीं किया।

लेकिन यहां दो बुनियादी सवाल हैं। पहला तो यह कि आखिर देश में कितनी बिजली कोयले से बन रही है और भयानक प्रदूषण पैदा करने वाले कोयले से बनने वाली बिजली का विकल्प अब तक क्यों नहीं तैयार किया गया। और दूसरा सवाल यह कि दुनिया में सबसे ज्यादा कोयला उत्पादन करने वाले देश में इसका अकाल क्यों है? असल में जब बात लागत और कीमत की होती है तो कोयले से चलने वाले ताप बिजलीघर बाजी मार ले जाते हैं। कोयले से मिलने वाली बिजली सस्ती होती है। कोयले की उपलब्धता का आकलन करें, तो मौजूदा संकट से एक चिंताजनक भविष्य सामने उपस्थित हो जाता है। भारत सहित दुनिया के कई देशों में पच्चीस साल पहले की तुलना में हजारों टन ज्यादा कोयला धरती के भीतर से निकाला जा रहा है। लेकिन ऊर्जा की बढ़ती मांग कोयले के भविष्य को धुंधला कर देती है।

मेसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी (एमआइटी) के एक अध्ययन के अनुसार 2050 तक दुनिया में ऊर्जा की मांग तीन गुना ज्यादा बढ़ जाएगी। भारत-चीन जैसे विकासशील देशों में तो यह मांग इतनी तेजी से बढ़ेगी कि इसे पूरा करने में पसीने छूट जाएंगे। हाल में चीन से भी ये खबरें आ रही थीं कि वहां बिजली का गंभीर संकट खड़ा हो गया है क्योंकि कोयले का मौजूदा जमा भंडार खत्म हो रहा है। चीन के इकतीस में से सोलह प्रांतों में बिजली की कटौती की गई, रेस्टोरेंट और शापिंग माल बंद करने पड़े और कई फैक्ट्रियों को अपना उत्पादन धीमा करना पड़ा क्योंकि उन्हें पर्याप्त मात्रा में बिजली नहीं मिल पा रही थी। चीन में दुनिया का अकेला देश है जो ताप बिजलीघरों से सबसे ज्यादा बिजली बनाता है।

भारत की स्थिति चीन से अलग नहीं हैं। हमारे देश में भी कोयले से मिलने वाली बिजली कुल विद्युत उत्पादन की बहत्तर फीसद है। यही बिजली आम जनता के उपभोग से लेकर उद्योगों को दी जाती है। देश में पहले भी ऐसे कई मौके आए हैं, जब मानसून के दौरान कोयला खदानों में पानी भर जाने के कारण प्राय: सितंबर-अक्तूबर में कोयले का भंडार कम हो जाता था और बिजली उत्पादन में कटौती की नौबत आ जाती थी। लेकिन इस साल यह संकट अभूतपूर्व स्तर तक पहुंचने की आशंका है। ऐसा क्यों हुआ, इसके कई कारण हैं। पहली वजह बिजली की खपत में बेतहाशा बढ़ोत्तरी होना है। बताया जा रहा है कि महामारी प्रतिबंधों के हटने के बाद उद्योग-धंधों में रफ्तार आई है और बिजली की मांग बढ़ी है।

इसके अलावा घरेलू बिजली की भी मांग बढ़ी है क्योंकि अभी भी ज्यादातर लोग घरों से काम कर रहे हैं, इसलिए एअर कंडीशनर व अन्य उपकरणों में बिजली खपत बढ़ी है। आंकड़े बताते हैं कि इस साल अगस्त में बिजली की खपत एक सौ चौबीस अरब यूनिट थी, जबकि दो साल पहले यानी महामारी से पूर्व अगस्त 2019 में यह खपत एक सौ छह अरब यूनिट थी। बिजली की मांग में करीब बीस फीसद की इस बढ़ोत्तरी ने आपूर्ति में कटौती का संकट पैदा कर दिया है। सरकार का एक और तर्क है। केंद्र सरकार के मुताबिक इसी अवधि के दौरान ‘सौभाग्य’ कार्यक्रम के तहत देश के दो करोड़ अस्सी लाख घरों को बिजली कनेक्शन दिया गया। हालांकि इस कार्यक्रम में इन करोड़ों घरों में बिजली का सिर्फ एक बल्ब लगाया था, लेकिन इन ज्यादातर परिवारों ने पंखे, कूलर, टीवी आदि का भी इस्तेमाल शुरू कर दिया। यही नहीं, अब अंदाजा लगाया जा रहा है कि नए उपभोक्ता जुड़ने का यह सिलसिला आगे भी चलता रहेगा, इससे बिजलीघरों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।

ताप बिजलीघर चूंकि पूरी तरह से कोयले पर निर्भर हैं और कोयले की आपूर्ति कई कारणों से प्रभावित होती है, इसलिए इस काले सोने से मिलने वाली बिजली और इसकी कीमत में आगे भी इसी तरह की खींचतान जारी रह सकती है। मालूम हो कि खदानों से निकलने वाले या बाहर से आयातित कोयले की मात्रा में घट-बढ़ आपूर्ति के मुताबिक होती रहती है। मानसून में बारिश के दौरान खदानों में पानी भरने से आपूर्ति में कमी आ जाती है। इसके अलावा भले ही हमारे देश में दुनिया का चौथा सबसे बड़ा कोयला भंडार है, लेकिन जरूरत की भरपाई के लिए हमें विदेशों से कोयला मंगाना पड़ता है। चीन के बाद भारत कोयले का सबसे बड़ा आयातक है।

एक समस्या यह भी है कि देसी खदानों से निकलने वाला कोयला खराब गुणवत्ता का होता है जो जलाने पर ऊर्जा कम, और धुएं के रूप में प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन ज्यादा पैदा करता है। इसलिए आयात घटाने की कोशिशों के बावजूद यह बढ़ता जा रहा है। इधर इसमें समस्या यह आई कि चीन से बिगड़े संबंध आयातित आस्ट्रेलियाई कोयले के रास्ते में अड़चन बन गए। दावा है कि भारत का बीस लाख टन से अधिक आस्ट्रेलियाई कोयला चीन के बंदरगाह पर महीनों से अटका पड़ा है। हमारे देश में सीमेंट और इस्पात बनाने वाली कंपनियां सस्ती दरों पर अच्छी गुणवत्ता वाला आस्ट्रेलियाई कोयला आयात करती हैं। चूंकि उन्हें यह कोयला नहीं मिला तो उन्होंने बिजलीघरों को दिए जा रहे कोयले से अपनी जरूरत की पूर्ति की। इससे बिजली पैदा करने वाले बिजलीघरों के लिए ईंधन कम पड़ गया है।

असल में, ऊर्जा के सारे स्रोतों की क्षमता और उनके सकारात्मक-नकारात्मक पहलुओं का अध्ययन जिस एक निष्कर्ष पर जाकर ठहरता है, वह यह है कि भविष्य में सूरज ही हमारा कल्याण करेगा। पवन चक्कियां लगाने की दिशा में भी प्रगति हुई है। लेकिन तमाम खूबियों के बावूजद दुनिया में अभी इन विकल्पों का ज्यादा प्रचलन नहीं हुआ है। ऐसे में कोयले से मिलने वाली बिजली अगले कुछ वर्षों तक हमारी ऊर्जा का सबसे जरूरी अंग बनी रह सकती है। इसलिए उचित यही है कि इसके रास्ते में आने वाली बाधाओं को दूर किया जाए और अच्छी गुणवत्ता वाले कोयले की आपूर्ति सुनिश्चित करने के ठोस प्रयास किए जाएं।

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