scorecardresearch

तालिबान राज में गहराते संकट

पिछले साल 15 अगस्त को तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा कर अपनी सत्ता कायम कर ली थी।

तालिबान राज में गहराते संकट

अभी हालत यह है कि महिलाओं को महीनों से वेतन नहीं मिल रहा है, क्योंकि इन विभागों का बजट विदेशी अनुदान से मिलता था, जो अब बंद हो चुका है। सबसे बुरी स्थिति तो यह है कि लड़कियों को माध्यमिक और उच्च शिक्षा से वंचित कर दिया गया है। अफगानिस्तान में इस समय पैंतालीस फीसद से ज्यादा लड़कियां माध्यमिक शिक्षा से वंचित हो गई हैं।

हाल में अफगानिस्तान में तालिबान शासन का एक साल पूरा हो गया। अपने शासन की पहली वर्षगांठ को विजय दिवस के रूप में मनाते हुए काबुल में तालिबान लड़ाकों ने कहा कि उन्होंने विदेशी ताकतों से अफगानिस्तान को आजाद करवा कर एक बड़ी मंजिल हासिल की। पर इस खोखले विजय दिवस का स्याह पक्ष यह भी है कि तालिबान की वजह से ही इस वक्त अफगानिस्तान एक नहीं, कई संकटों से गुजर रहा है।

इनमें मानवीय संकट कहीं ज्यादा गंभीर हैं। देश भयानक सूखे का सामना कर रहा है। आबादी का बड़ा हिस्सा भुखमरी के कगार पर पहुंच गया है। महिलाओं के सारे हक छीन लिए गए हैं। जो महिलाएं अधिकार बहाली की मांग कर रही हैं, उन्हें सरेआम पीटा जा रहा है और जेलों में बंद किया जा रहा है। महिलाओं के गायब होने के मामले भी तेजी से बढ़े हैं। तालिबान के कठोर शासन के कारण फिर से लाखों लोग ईरान और पाकिस्तान में पनाह ले चुके हैं। एक बड़ा संकट यह भी कि तालिबान शासन के बावजूद अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर तनाव बढता जा रहा है।

पिछले साल 15 अगस्त को तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा कर अपनी सत्ता कायम कर ली थी। दरअसल तालिबान की वापसी की आहट के साथ ही कुदरत भी इस मुल्क से नाराज दिख रही थी। तालिबान के सत्ता में आने से पहले ही यह देश भयानक सूखे की चपेट में आ चुका था। यह मार अभी भी कम नहीं पड़ी है। कंधार, हेलमंद जैसे प्रातों में पीने का पानी भी आसानी से नहीं मिल रहा। खेत भी सूखे पड़े हैं। इन सबका नतीजा यह हुआ कि आज इस मुल्क की आबादी का बड़ा हिस्सा खाद्य संकट का सामना कर रहा है। यहां के चौंतीस में से पच्चीस राज्य सूखे के शिकार हैं।

लेकिन समस्या सूखे तक ही सीमिति नहीं है। इस वक्त अफगानिस्तान जिन संकटों से जूझ रहा है, उसके मूल में राजनीतिक कारण कहीं ज्यादा हैं। तालिबान के सत्ता हथियाने के बाद यहां हालात बदतर ही होते गए। अफगानिस्तान को पश्चिमी देशों से मिलने वाली विदेशी सहायता रोक दी गई। मानवीय आधार पर सिर्फ जरूरी दवाइयां और खाद्य पदार्थ ही अफगानिस्तान को मिल रहे हैं, लेकिन ये पूरी आबादी के लिए तो पर्याप्त नहीं हैं। फिर, साल भर में तालिबानी नीतियों के कारण आंतरिक हालात भी काफी बिगड़ गए। देश की अर्थव्यवस्था चरमरा चुकी है।

तालिबान के सत्ता में आने से पहले अफगानिस्तान का बजट विदेशी मदद से चलता था। सरकार के सालाना बजट का पचहत्तर फीसद विदेशी अनुदान से आता था। लेकिन विदेशी मदद अब पूरी तरह से बंद हो गई है। इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस देश की माली हालत कैसी होगी। देश में रोजगार हैं नहीं। इससे नौजवान आबादी भी मुश्किल में है। एक मोटा अनुमान बताता है कि इस समय डेढ़ करोड़ अफगानी नागरिक रोजाना खाने के संकट से जूझ रहे हैं।

सेव द चिल्ड्रन की रिपोर्ट के अनुसार तालिबान शासन में नब्बे फीसद से ज्यादा अफगानी परिवारों को बच्चों के लिए खाना जुटा पाना भारी पड़ रहा है। पिछले एक साल में महंगाई ने सारे रेकार्ड तोड़ डाले हैं। तालिबान शासन से पहले अफगानिस्तान में एक अंडा छह अफगानी में मिलता था, जो अब तेरह अफगानी में मिल रहा है। पहले एक कुंतल गेहूं छह हजार अफगानी में मिल रहा था, लेकिन अब दस हजार अफगानी में मिल रहा है। सेंट्रल बैंक आफ अफगानिस्तान अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग व्यवस्था से कट चुका है। इससे बैंकिंग व्यवस्था चौपट हो चुकी है।

अमेरिका और तालिबान के बीच जब दोहा में शांति वार्ता हो रही थी तो उसमें महिला अधिकार भी एक अहम मुद्दा था। पिछले दो दशकों में अफगानी महिलाओं को खासे अधिकार हासिल हुए थे। सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक में महिलाओं ने अपनी हिस्सेदारी हासिल की थी। सरकारी कार्यालयों में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ी थी। लेकिन तालिबान के सत्ता में आते ही महिलाओं के सारे अधिकार खत्म कर दिए गए। सरकारी दफ्तरों से उन्हें बाहर कर दिया गया। स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे कुछ जरूरी महकमों में ही महिलाओं को काम करने की इजाजत दी गई।

तालिबान ने आदेश जारी कर दिया था कि महिलाएं कार्यस्थलों को छोड़ घर में रहें और अपने घर के पुरुष सदस्यों को नौकरियों में आवेदन करने के लिए कहें। फिर, जहां महिलाओं को काम करने की अनुमति मिली, वहां उनके स्मार्टफोन रखने और पुरुषों से बात करने पर पाबंदी लगा दी गई। अभी हालत यह है कि महिलाओं को महीनों से वेतन नहीं मिल रहा है, क्योंकि इन विभागों का बजट विदेशी अनुदान से मिलता था, जो अब बंद हो चुका है। सबसे बुरी स्थिति तो यह है कि लड़कियों को माध्यमिक और उच्च शिक्षा से वंचित कर दिया गया है। अफगानिस्तान में इस समय पैंतालीस फीसद से ज्यादा लड़कियां माध्यमिक शिक्षा से वंचित हो गई हैं।

तालिबान अपने शासन की पहली वर्षगांठ भले मना रहा हो, लेकिन उसके लिए बुरी खबरें दूसरे मोर्चों पर भी हैं। पंजशीर, बगलान आदि प्रांतों में तालिबान विरोधी लड़ाकों की सक्रियता बढ़ गई है। तालिबान ने पंजशीर घाटी में पूर्ण नियंत्रण का दावा तो किया है, लेकिन समय-समय पर तालिबान विरोधी अहमद मसूद के नेतृत्व में प्रतिरोधी बल (नेशनल रेसिस्टेंस फ्रंट आफ अफगानिस्तान) तालिबान पर हमले कर रहा है। दो महीने पहले ही इस बल ने तालिबान का एक हेलिकाप्टर गिरा दिया था और उसके कई लड़ाकों को बंदी बना लिया था। इस हमले में कई तालिबान लड़ाके मारे गए थे। इसके अलावा अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट (आइएस) भी पूरी तरह सक्रिय है और वह भी हमलों को अंजाम देता रहा है।

अफगानिस्तान में तालिबान के एक साल के शासन के बाद अफगान-पाकिस्तान संबंधों की समीक्षा भी जरूरी है। काबुल पर तालिबान के नियंत्रण के बाद पाकिस्तानी सत्ता तंत्र प्रसन्न था, क्योंकि भारत अफगानिस्तान से उस समय बाहर हो गया था। लेकिन बीते एक साल में तालिबान शासित अफगानिस्तान और पाकिस्तान के आपसी संबंधों में कड़वाहट बढ़ी है। पाकिस्तान के लिए अफगान तालिबान उत्साही नतीजे नहीं दे रहा है। पाक-अफगान सीमा पर बाड़बंदी को लेकर दोनों मुल्कों के बीच तनाव है।

तालिबान लड़ाकों ने पाकिस्तानी सैनिकों को बाड़बंदी से रोकने की कोशिश की है। दोनों तरफ से गोलाबारी की भी खबरें आती रही हैं। पर सबसे दिलचस्प खबर यह है कि अफगान तालिबान ने डूरंड लाइन को लेकर पाकिस्तान के कहे अनुसार अपना आधिकारिक दृष्टिकोण नहीं बदला है। अफगान तालिबान ने पूर्ववर्ती अफगान सरकारों के आधिकारिक नजरिए को ही कायम रखने का फैसला किया। इससे पाकिस्तान का निराश होना स्वाभाविक है। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान को लेकर भी अफगान तालिबान का रुख नरम है। इससे भी पाकिस्तान उससे नाराज है। पाकिस्तान के अनुरोध के बावजूद अफगान सीमा में मौजूद पाकिस्तानी तालिबान के आतंकियों पर कार्रवाई नहीं किए जाने से भी तनाव बढ़ रहा है।

आने वाले वक्त में अफगान तालिबान की मुश्किलें और बढ़ेंगी। देश के पास पैसा नहीं है। विदेशी अनुदान बंद है। विदेशी अनुदान देने वाले मुल्क तालिबान की सोच में बदलाव चाहते हैं। पर तालिबान ऐसा करने से रहा। अफगान तालिबान के अंदर भी कट्टर धड़े और उदारवादी धड़े के बीच महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर टकराव है। कुछ उदारवादी तालिबान कमांडर महिलाओं को अधिकार देने की वकालत कर रहे हैं। दरअसल ये कमांडर हर मोर्चे पर उदारवादी रवैया अपनाने की वकालत कर रहे हैं। लेकिन कट्टर कमांडर और पाकिस्तान समर्थक हक्कानी नेटवर्क के कमांडर उदारवादी गुट की राह में बाधा हैं। मतलब साफ है, अफगान जनता को आने वाले दौर में और कठिन समय का सामना करना पड़ेगा।

पढें राजनीति (Politics News) खबरें, ताजा हिंदी समाचार (Latest Hindi News)के लिए डाउनलोड करें Hindi News App.

अपडेट