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विषमता की गहरे जाती जड़ें

अमेरिकी राष्ट्रपति के भाषण का पूरी दुनिया के बौद्धिक जगत में कई प्रकार से विश्लेषण हो रहा है।

रघु ठाकुर

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अपनी सरकार के लक्ष्य तय करते हुए नवंबर में बाल्टीमोर में अपनी सरकार के विकास के लिए तीन लक्ष्य रखे हैं- वस्तुओं के दाम कम करना, यह सुनिश्चित करना कि आवश्यक वस्तुएं बाजार में प्रचुरता से उपलब्ध हों और अमेरिकी नागरिकों के रोजगार वापस दिलाना।

अमेरिकी राष्ट्रपति के इस भाषण का पूरी दुनिया के बौद्धिक जगत में कई प्रकार से विश्लेषण हो रहा है। कुछ लोग उन्हें उनके समाजवाद के प्रति झुकाव के रूप में देख रहे हैं, तो वामपंथी बौद्धिक इसे पूंजीवाद की आम आदमी की तरफ केंद्रित होने की लाचारी के रूप में विश्लेषण कर रहे हैं। मगर गांधीवादी समाजवाद की दृष्टि से बाइडेन के भाषण को न समाजवाद की तरफ झुकाव माना जा सकता है और न ही पूंजीवाद की लाचारी, बल्कि इसे पूंजीवाद की अपनी सुरक्षा की रणनीति माना जा सकता है।

यह स्थापित सत्य है कि पूंजीवाद गरीबों और कमजोरों की लाश पर पनपता है, पर उनके जीवन को लाश बनने तक की यात्रा के लिए तथा उन्हें जिंदा रहने के लिए वस्तुओं के दाम कम रखना यानी उन्हें राज्य पोषित अनुदान के सहयोग से कम दरों पर उपलब्ध कराना या उनकी जरूरतों का एक हिस्सा उन्हें निशुल्क देना जरूरी होता है। यह गरीब तबके को जिंदा रखने और साथ ही सरकारों को खुद को भी जिंदा रखने का प्रयास होता है। मध्यवर्ग को भी खुश और प्रलोभित करने के लिए बाजार की महंगाई कम करना, प्रचुरता से आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराना जरूरी होता है।

यहां तक कि जो बाइडेन ने अमेरिकी नौजवानों को रोजगार देने की जो नीति तय की है, वह अब अमेरिका की जरूरत बन गई है। अमेरिकी नौजवानों को रोजगार के लिए अब अमेरिका वैश्विकरण से वापस लौटता तथा अमेरिकावाद की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। यह भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि भारत के कई लाख नौजवान अमेरिका में बड़े पदों और बड़ी-बड़ी तनख्वाहों पर काम कर रहे हैं, यह नीति उनके लिए कभी भी खतरे की घंटी बन सकती है।

7 दिसंबर, 2021 को दुनिया के सौ अर्थशास्त्रियों ने ‘विश्व असमानता’ रिपोर्ट जारी की है। पिछले कुछ वर्षों से आक्सफोर्ड और कैंब्रिज विश्वविद्यालय की ओर से ऐसी रिपोर्टों का नियमित वार्षिक प्रकाशन होता था, जो दुनिया में बढ़ती हुई विषमता के तथ्य दुनिया के सामने रखती थीं। पर अब इन अर्थशास्त्रियों को यह रपट अलग से क्यों जारी करनी पड़ी, इसकी भी पड़ताल होनी चाहिए। क्या इनके ऊपर कोई वैधानिक, इतर वैधानिक या आर्थिक अभाव कारण है या कोई और कारण है?

बहरहाल, सौ अर्थशास्त्रियों की रपट में भारत के संबंध में जो आंकड़े दिए गए हैं और जिनका कोई खंडन भारत सरकार ने अभी तक नहीं किया है, वे चौंकाने वाले हैं। इसके अनुसार भारत की पचास फीसद आबादी यानी पैंसठ करोड़ लोगों की कमाई इस वर्ष तेरह फीसद कम हुई है। पिछले वर्ष यह बंदी के दौर में लगभग तीस फीसद कम हुई थी। देश की आधी आबादी के पास संपत्ति के नाम पर लगभग कुछ नहीं जैसा है।

देश के सबसे नीचे की पचास फीसद आबादी के पास औसतन 66,230 रुपए प्रति व्यक्ति संपत्ति है, जो देश की कुल संपत्ति का मात्र छह फीसद है। पर संपत्ति का आज क्या अर्थ है? इतनी रकम से तो एक कमरा भी नहीं बन सकता। हम सब जानते हैं कि, औसत का आंकड़ा दिखने में कुछ और होता है पर वास्तव में कुछ और होता है जैसे हाथी के दांत दिखाने के और, खाने के और होते हैं।

जब गरीब की संपत्ति का औसत निकाला जाता है, तब उसमें अमीरों की संपत्ति भी शामिल होती है, जिनके पास लाखों करोड़ की संपत्तियां हैं और अमीरों की संपत्ति का औसत निकालते समय वे पचास फीसद गरीब भी शामिल होते हैं, जिनकी कहने को औसत संपत्ति छियासठ हजार के आसपास है, पर वास्तव में वह छह हजार रुपए की भी नहीं होती। यानी देश में संपूर्ण आबादी का मिलाजुला औसत निकालने से अमीर की संपत्ति कम और गरीब की संपत्ति ज्यादा आंकी जाती है।

देश के मध्यवर्ग, जिसकी आबादी लगभग बीस करोड़ बताई जाती है, के पास औसतन सात लाख उनतीस हजार प्रति व्यक्ति की संपत्ति है, जो देश की कुल संपत्ति का मात्र साढ़े उनतीस फीसद है। यानी देश की कुल सौ करोड़ आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का मात्र पैंतीस फीसद है और बकाया पैंसठ फीसद सब अमीरों के पास है। जो देश के शीर्ष संपत्तिवान हैं, उन तेरह करोड़ लोगों के पास औसतन तिरसठ लाख चौवन हजार रुपए प्रति व्यक्ति संपत्ति है, और देश के एक फीसद पूंजीपतियों के पास औसतन तीन करोड़ चौबीस लाख उनचास हजार रुपए की औसत प्रति व्यक्ति संपत्ति है, जो देश की कुल संपत्ति का तैंतीस फीसद है।

ऐसी ही स्थिति आमदनी की विषमता की है। देश में वयस्कों की औसत आय दो लाख रुपए है, जबकि पचास फीसद वयस्कों की आय मात्र तिरपन हजार रुपए सालाना, यानी साढ़े चार हजार प्रतिमाह है। यह भारत की विषमता की तस्वीर है। पर पूंजीवादी दुनिया और प्रचार तंत्र विषमता को मिटाने की या समता की चर्चा से बचना चाहता है। क्योंकि वह जानता है कि समता की चर्चा उसके लिए काल बन सकती है।

देश में पिछले दो वर्षों में रोजगार तेजी से घटे हैं, जबकि भारत सरकार अर्थव्यवस्था के विकास का दावा कर रही है। सरकारी पक्ष का कहना है कि हमने न केवल महामारी के दौर को पार कर लिया है, बल्कि महामारी के पहले देश में आर्थिक विकास की दर 7.1 फीसद थी, अब उसे पार कर विकास की वृद्धि दर 8.4 फीसद हो गई है। अब एक तरफ आर्थिक वृद्धि की दर डेढ़ फीसद ज्यादा बताई जा रही है और दूसरी तरफ रोजगार कम हो रहे हैं, इस रहस्य को समझना होगा। अनेक वैश्विक संस्थाओं के आकलन के अनुसार पिछले दो वर्षों में बारह करोड़ से अधिक रोजगार घटे हैं और 2025 के आते-आते लगभग इतने ही रोजगार और कम होंगे। यानी पच्चीस करोड़ लोग नए बेरोजगार हो जाएंगे। यह कैसा विकास है कि अर्थव्यवस्था उछाल मार रही है और बेरोजगारी छलांग मार रही है!

सरकारी आंकड़ों की धोखेबाजी इसी से समझ में आ जाती है कि सरकार के मुताबिक उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पिछले लंबे समय से चार-पांच फीसद पर स्थिर बना हुआ है, पर थोक मूल्य सूचकांक बारह फीसद को पार कर गया है। अब अगर थोक मूल्य बढ़ेंगे तो उपभोक्ता मूल्य सूचकांक अपने आप बढ़ना चाहिए। दरअसल, यह सरकारी पक्ष का तितरफा षड्यंत्र है।

पिछले दो वर्षों में भारत सरकार ने लगभग आठ लाख करोड़ रुपए केवल डीजल-पेट्रोल के दामों के कर में वृद्धि कर कमाए हैं, गैस सिलेंडर आदि के दामों की वृद्धि तो अलग है। एक तरफ सरकार का डिजिटलाइजेशन का कार्यक्रम और दूसरी तरफ रिलायंस और अन्य मोबाइल कंपनियों द्वारा एकदम बढ़ाए गए इंटरनेट की दरों की दुरभिसंधि को समझना होगा। अब जब शिक्षा से लेकर अन्य हर काम आनलाइन और डिजिटलाइज होना है, तब एक मुश्त सौ से लेकर दो सौ रुपए तक का मासिक इंटरनेट शुल्क बढ़ा दिया है। अकेले इसी नवंबर माह में लगभग चालीस हजार करोड़ रुपए उपभोक्ताओं की जेब से इंटरनेट के मालिक लोगों ने निकाल लिया।

पूंजीवाद और सत्ता आज के दौर में एक सिक्के दो पहलू बन गए हैं। अब आवश्यकता पूंजीवाद को आम आदमी केंद्रित बनाने की नहीं, बल्कि विषमता को मिटा कर समता का समाज बनाने की है। एक तरफ आर्थिक वृद्धि की दर डेढ़ फीसद ज्यादा बताई जा रही है और दूसरी तरफ रोजगार कम हो रहे हैं, इस रहस्य को समझना होगा। अनेक वैश्विक संस्थाओं के आकलन के अनुसार पिछले दो वर्षों में बारह करोड़ से अधिक रोजगार घटे हैं और 2025 के आते-आते लगभग इतने ही रोजगार और कम होंगे। यानी पच्चीस करोड़ लोग नए बेरोजगार हो जाएंगे। यह कैसा विकास है कि अर्थव्यवस्था उछाल मार रही है और बेरोजगारी छलांग मार रही है!

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