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राजनीतिः नौनिहालों की सुध कौन लेगा

शिशुओं की मौतों के पीछे केवल आर्थिक कारण नहीं हैं, बल्कि और भी कई कारण हैं। ऐसी ज्यादातर मौतें संसाधनों की कमी की वजह से हो रही हैं। डॉक्टरों और नर्सों की संख्या में कमी भारत की एक प्रमुख स्वास्थ्य समस्या है। स्त्री अशिक्षा, बाल विवाह, बेटा-बेटी में भेदभाव जैसे पहलू भी शिशु मृत्यु की बड़ी वजहें हैं। कम उम्र में लड़कियों की शादी के बाद मां बनने पर मां और शिशु दोनों को ही जान का खतरा रहता है।

Author May 5, 2018 03:57 am
जब एक लड़की शारीरिक रूप से अपरिपक्व होती और ऐसी स्थिति में मां बन जाती है तो शिशु पर जान का खतरा बढ़ जाता है।

रिजवान अंसारी

पिछले दिनों जब यूनिसेफ ने ‘एवरी चाइल्ड अलाइव’ नामक रिपोर्ट जारी की, तब भारत में नवजात शिशुओं की दयनीय स्थिति सामने आई। हालांकि भारत के लिहाज से स्थिति में कुछ सुधार आया है, पर भारत को उन देशों के साथ रखा गया है जहां वर्ष 2016 में नवजात मृत्यु दर, तथा मरने वाले नवजात बच्चों की कुल संख्या, दोनों उच्चतम स्तर पर रहीं। नवजात मृत्यु दर प्रति एक हजार पर मरने वाले बच्चों की उस संख्या को कहते हैं जो जन्म के चार हफ्तों के भीतर दम तोड़ देते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक हर साल छब्बीस लाख शिशु एक महीने की जिंदगी भी नहीं जी पाते हैं। इन 26 लाख शिशुओं में दस लाख तो जन्म लेने के दिन ही अपनी जान गंवा देते हैं। जापान, आइसलैंड, सिंगापुर, फिनलैंड जैसे उच्च आय वाले देशों में औसत नवजात मृत्यु दर महज तीन है, जबकि भारत, पाकिस्तान, नाइजीरिया वगैरह में नवजात की औसत मृत्यु दर सत्ताईस है, जो कि एक नाजुक स्थिति है। इसी प्रकार, यूनिसेफ ने दक्षिण एशिया के लिए भी कई गंभीर तथ्य उजागर किए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण एशिया में प्रतिदिन अट्ठाईस सौ नवजात शिशु दम तोड़ देते हैं। नवजात मृत्यु दर के मामले में दक्षिण एशिया की स्थिति विश्व में सबसे दयनीय है।

यह सही है कि उच्च आय वाले देशों के मुकाबले दूसरे देशों की हालत बेहद नाजुक है। लेकिन यह गौरतलब है कि यूनिसेफ ने नवजात मृत्यु दर उच्च होने के कारकों में केवल आय को बड़ा कारण नहीं माना है, बल्कि दूसरे और भी कई कारणों को अहम माना है। यूनिसेफ के मुताबिक नवजात शिशुओं की अधिकांश मौतें रोकी जा सकती हैं, लेकिन जागरूकता और शिक्षा के अभाव के कारण यह मुमकिन नहीं हो पाता है। रिपोर्ट के मुताबिक अस्सी फीसद मौतों के पीछे समय से पूर्व जन्म, जन्म के समय होने वाली जटिलता, निमोनिया तथा संक्रमण जैसे कारण जिम्मेदार हैं।

इस रिपोर्ट में भारत को निम्न मध्य आय वाले देशों की श्रेणी में रखा गया है। इस श्रेणी में भारत को बारहवां दर्जा मिला है। जिस देश का दर्जा जितना कम होता है उसकी हालत उतनी ही ज्यादा खराब होती है। भारत में नवजात मृत्यु दर 25.4 है और इसकी हालत श्रीलंका, नेपाल तथा भूटान जैसे पड़ोसी देशों से भी खराब है। भारत की स्थिति इस लिहाज से भी खराब है कि इसकी नवजात मृत्यु दर कुछ देशों से तो बेहतर है लेकिन कुल मौतों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है। दरअसल, नवजात मृत्यु दर प्रति एक हजार नवजात बच्चों में मरने वाले बच्चों की संख्या होती है, लेकिन जब जन्म दर अधिक हो या जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या ज्यादा हो तो नवजात मरने वाले बच्चों की संख्या भी ज्यादा होगी। भारत में प्रतिवर्ष छह लाख से ज्यादा नवजात शिशु जन्म लेने के एक महीने के भीतर मर जाते हैं और यह संख्या विश्व में सबसे ज्यादा है। चीन, भारत से ज्यादा आबादी वाला देश है, लेकिन वहां नवजात मृत्यु दर महज 51 है; वहां प्रतिवर्ष मरने वाले कुल नवजात शिशुओं की संख्या छियासी हजार है।

शिशुओं की मौतों के पीछे केवल आर्थिक कारण नहीं हैं, बल्कि और भी कई कारण हैं। ऐसी ज्यादातर मौतें संसाधनों की कमी की वजह से हो रही हैं। भारत की गिनती दुनिया के उन देशों में होती है जहां स्वास्थ्य के मद में सरकारी व्यय बहुत कम होता है। इसका परिणाम हमारे यहां सार्वजनिक चिकित्सा व्यवस्था की बदहाली के रूप में साफ दिखाई देता है। डॉक्टरों और नर्सों की संख्या में कमी भारत की एक प्रमुख स्वास्थ्य समस्या है। एक संसदीय समिति की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में प्रति दस हजार की आबादी पर केवल पांच डॉक्टर उपलब्ध हैं, जबकि नार्वे में प्रति दस हजार लोगों पर 218 डॉक्टर और ब्राजील में 93 डॉक्टर हैं। भारत के अस्पतालों में बिस्तरों की संख्या भी संतोषजनक नहीं है। प्रति हजार लोगों पर ब्राजील में जहां इलाज के लिए बिस्तरों की संख्या 2.3 है, वहीं पड़ोसी देश श्रीलंका में 3.6 और भारत में केवल 0.7 है। लिहाजा डॉक्टर, नर्स और बेड की बात करें तो आबादी के लिहाज से इनकी संख्या बेहद कम है। एक अध्ययन के अनुसार भारत के अस्पतालों में चार लाख डॉक्टरों, चालीस लाख नर्सों और सात लाख बिस्तरों की कमी है।

‘नई स्वास्थ्य नीति, 2017’ के तहत जीडीपी का मात्र ढाई फीसद ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करने का प्रावधान है, जबकि भारत से लाखों डॉलर सहायता पाने वाला अफगानिस्तान जीडीपी का 8.3 फीसद स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता है। एक आंकड़े के मुताबिक, 2011 में भारत में स्वास्थ्य पर प्रतिव्यक्तिकुल व्यय 62 डॉलर था, जबकि अमेरिका में 8 हजार 467 डॉलर और नार्वे में 9 हजार 908 डॉलर। इतना ही नहीं, हमारा पड़ोसी देश श्रीलंका भी हमसे प्रतिव्यक्ति लगभग पचास फीसद ज्यादा खर्च करता है। स्त्री अशिक्षा, बाल विवाह, बेटा-बेटी में भेदभाव जैसे पहलू भी शिशु मृत्यु की बड़ी वजहें हैं। अशिक्षित महिला मां बनने पर शिशु की बेहतर देखभाल नहीं कर पाती। दूसरी तरफ कम उम्र में लड़कियों की शादी के बाद मां बनने पर मां और शिशु दोनों को ही जान का खतरा रहता है।

जब एक लड़की शारीरिक रूप से अपरिपक्व होती और ऐसी स्थिति में मां बन जाती है तो शिशु पर जान का खतरा बढ़ जाता है। बेटा-बेटी में भेदभाव भी नवजात मृत्यु दर में वृद्धि का एक बड़ा कारण है। यूनिसेफ के मुताबिक, दुनिया के बड़े देशों में भारत एकमात्र देश है जहां लड़कों की अपेक्षा लड़कियों में मृत्यु दर अधिक है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे और सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम की रिपोर्टों से पता चला है कि 2015 के मुकाबले 2016 में पांच वर्ष से कम उम्र की लड़कियों की मृत्यु दर में 11 फीसद का इजाफा हुआ है। आर्थिक सर्वे 2018 में ‘ट्वेंटी वन मिलियन अनवांटेड गर्ल’ की चर्चा इसी समस्या का दूसरा पहलू है। साथ ही, ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ जैसी योजना भी इसी समस्या की ओर इशारा करती है।

ऐसा नहीं है कि नवजात शिशुओं की मौत रोकने के लिए भारत ने प्रयास नहीं किए हैं। इस दिशा में सरकार ने कई प्रयास किए हैं, लेकिन ये प्रयास अभी निर्णायक मोड़ पर नहीं पहुंच पाए हैं। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना, मिशन इंद्रधनुष, आशा कार्यकर्ता, प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान आदि भारत सरकार की कुछ ऐसी पहलें हैं जिनसे न केवल गर्भवती महिलाओं की देखभाल होती है, बल्कि नवजातों की देखभाल के भी विशेष प्रयास किए जाते हैं। इन प्रयासों का ही परिणाम है कि पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में होने वाली मृत्यु दर को छियासठ फीसद तक कम किया जा सका है। इसी कारण हम ‘सहस्राब्दी विकास लक्ष्य’ के करीब पहुंचने में सफल हो पाए हैं। इतना ही नहीं, हम वर्ष 2030 तक सतत विकास लक्ष्य को भी प्राप्त कर लेने की राह पर हैं जिसमें पांच वर्ष से कम उम्र के प्रति हजार बच्चों में होने वाली मौत की संख्या को पच्चीस तक लाने का लक्ष्य है। गौरतलब है कि फिलहाल यह दर प्रति हजार पर उनतालीस है। नवजात मृत्यु दर रोकने की अपनी कोशिशों में हमें तेजी लाने की जरूरत है। हमें समझना होगा कि एक भी बच्चे की मृत्यु हमारे विकास के सामने एक सवालिया निशान है और जीने के हक के संवैधानिक प्रावधान के खिलाफ है।

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