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राजनीतिः जानलेवा गड्ढे और हमारी नीतियां

देश में रोजाना दस से ज्यादा लोग सिर्फ सड़क पर गड्ढे होने की वजह से जान गंवा रहे हैं। ऐसे में क्या इन मौतों के जिम्मेदार वे लोग नहीं हैं जो इस तरह की घटिया सड़कें बनाते हैं, ऐसी सड़कें जो कुछ ही महीनों में या जरा-सी बारिश में गड्ढों में तब्दील हो जाती है। इससे तो लगता है कि लोकतंत्र में आम जिंदगी की कोई कीमत नहीं रह गई है। सवाल यह भी है कि क्यों कोई सड़क ऐसी नहीं बनाई जाती जो पांच साल तक तो चल सके।

Author July 23, 2018 3:35 AM
स्मार्ट और आधुनिकता का दंभ भरते हमारे देश की सड़कों को देख कर तो कभी-कभी यह लगने लगता है कि सड़कों में गड्ढे हैं या फिर गड्ढों में सड़कें।

महेश तिवारी

पिछले दिनों एक चौंकाने वाली रिपोर्ट आई। इसमें कहा गया है कि देश में आतंकवाद और नक्सलवाद से भी ज्यादा जान को कई गुना खतरा सड़क के गड्ढों के कारण होता है। वैसे देखें तो आतंकवाद वाकई देश के लिए बड़ा संकट है, जिससे निपटने का प्रयास पहले होना चाहिए। पर लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी जेब भरने के लिए दूसरे की जान पर खेलने का जो खतरनाक खेल लंबे समय से चला आ रहा है, वह भी देश और देशवासियों के साथ कम छल नहीं है। जनता के पैसे से ही देश चलता है। फिर भी अगर चलने के लिए आज तक अच्छी सड़कें मयस्सर नहीं हो सकी हैं तो यह न सिर्फ देश की जनता, बल्कि लोकतंत्र के साथ भद्दा मजाक और अन्याय है।

स्मार्ट और आधुनिकता का दंभ भरते हमारे देश की सड़कों को देख कर तो कभी-कभी यह लगने लगता है कि सड़कों में गड्ढे हैं या फिर गड्ढों में सड़कें। कहने को देश में एक्सप्रेस-वे बन रहे हैं। लेकिन आम जिंदगी का आए दिन जिन सड़कों और रास्तों से सामना होता है, बरसात के मौसम में उन्हें छोटे तालाब में तब्दील होने में देर नहीं लगती। लेकिन जैसे ही बारिश का मौसम खत्म होता है, इन गड्ढों को जो भरने का काम चल निकलता है। जगजाहिर है कि यह काम राजनीतिक भ्रष्टाचार का एक बड़ा औजार बन चुका है। सड़कें किसी भी देश की तरक्की की पहली सीढ़ी होती हैं। पर हमारे देश के सभी हिस्सों में जो एक बात सामान्य तौर पर नजर आ सकती है, वह है- गड्ढे युक्त सड़कें जो जानलेवा साबित हो रही हैं।

बेहतर सड़कें देश की अर्थव्यवस्था को आधार प्रदान करती हैं। न केवल शहरों, गांवों और महानगरों को जोड़ने, बल्कि शहरों-कस्बों के भीतर भी सुचारू जीवन के लिए आज अच्छी सड़क सबसे पहली बुनियादी जरूरत है। विकास के लिए यह सबसे जरूरी बुनियादी ढांचा है। लेकिन हमारे यहां इसकी हकीकत कुछ और ही है। हम स्मार्ट सिटी की बात करते हैं। तो क्या स्मार्ट सिटी और न्यू इंडिया का खाका सड़क पर खुदे पड़े गड्ढे द्वारा खींचा जा रहा है? देश में ऐसा कोई भी चुनाव नहीं होता जिसमें सड़कों का जाल बिछाने, गांव-गांव तक सड़क बनाने का दावा किया नहीं किया जाता हो। पर ऐसा कोई साल नहीं बीतता जब देश में सड़कों के गड्ढों से होने वाली मौतों का आंकड़ा सीमापार से होने वाली गोलीबारी और आतंकवाद में हुई मौतों को पीछे न छोड़ देता हो। आज हमारे लोकतांत्रिक परिवेश में सरकारी दावे तो इतने खोखले हो गए हैं कि इन पर से जनता का भरोसा पूरी तरह से उठ गया है।

सरकारी आंकड़े बता रहें हैं कि देश में पिछले वर्ष सबसे अधिक मौतें सड़कों के गड्ढों की वजह से हुई हैं। पिछले वर्ष सरकारी आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में सड़कों पर गड्ढों के कारण नौ सौ सत्तासी लोगों की जानें गई। अगर सड़क के गड्ढे में गिर कर देश में पिछले वर्ष हुई मौतों के आंकड़ों पर नजर डालें तो गड्ढों की वजह से जान गंवाने के मामले में हरियाणा और गुजरात क्रमश: दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं। पिछले साल जानलेवा गड्ढों की वजह से महाराष्ट्र में लगभग सात सौ तीस लोगों की मौत हुई थी। यह 2016 के मुकाबले दोगुनी थी। इसी महीने यानी महाराष्ट्र में छह लोग सड़क पर गड्ढों की वजह से मारे गए। पर महाराष्ट्र के राज्य लोकनिर्माण मंत्री का मानना है कि सड़क पर लोगों की मौत सिर्फ गड्ढों की वजह से ही नहीं होती। लेकिन इसका मतलब तो यह नहीं कि बेहतर सड़क बनाने की चुनौती ही सरकारें न स्वीकार करें।

जिस हिसाब से देश में गड्ढे वाली सड़कों की वजह से हर साल होने वाली मौतों का आंकड़ा बढ़ रहा है, वह सरकारों के कामकाज की प्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। सभी प्रदेशों की सरकारों ने गड्ढेयुक्त सड़कों की चपेट में आकर हुई मौतों का जो आंकड़ा केंद्र सरकार को सौंपा है, उसके मुताबिक देश में प्रतिवर्ष गड्ढा बनती सड़कों की वजह से मौतें बढ़ रहीं हैं। पिछले साल सड़क के गड्ढों ने लगभग साढ़े तीन हजार से ज्यादा लोगों की जिंदगी छीन ली। वर्ष 2016 में यह आंकड़ा दो हजार तीन सौ चौबीस का था। देश में रोजाना दस से ज्यादा लोग सिर्फ सड़क पर गड्ढे होने की वजह से जान गंवा रहे हैं। ऐसे में क्या इन मौतों के जिम्मेदार वे लोग नहीं हैं जो इस तरह की घटिया सड़कें बनाते हैं, ऐसी सड़कें जो कुछ ही महीनों में या जरा-सी बारिश में गड्ढों में तब्दील हो जाती है। इससे तो लगता है कि लोकतंत्र में आम जिंदगी की कोई कीमत नहीं रह गई है। सवाल यह भी है कि क्यों कोई सड़क ऐसी नहीं बनाई जाती जो पांच साल तक तो चल सके। हकीकत यह है कि इधर सड़क बनी नहीं कि उधर उखड़नी चालू हो जाती है। क्या हमारे रहनुमाओं को जनता की जान की कोई परवाह नहीं?

सड़कों की मरम्मत के नाम पर देश में आए दिन लीपापोती करके जनता के पैसे का नुकसान किया जाता है। सड़कें बेहतर हैं या नहीं, या बारिश के दिनों में सड़कों का क्या हाल है, यह देखना सरकारी महकमों की जिम्मेदारी होती है। लेकिन अधिकारी-कर्मचारी इतनी लापरवाही बरतते हैं कि महीनों सड़कों पर गड्ढे बने रहते हैं, लेकिन उन्हें सुधरवाने की जरा भी जिम्मेदारी नहीं समझते। जनप्रतिनिधि भी इस ओर ध्यान देने की तकलीफ नहीं करते। अफसरों और जनप्रतिनिधियों की मेहरबानी से ही ऐसे ठेकेदार पनपते हैं जो घटिया सड़कें बनाते हैं। ऐसे में कौन किस पर और कैसी कार्रवाई करने की हिम्मत कर पाएगा, यह गंभीर प्रश्न है। अपने पसंदीदा ठेकेदारों से सड़क निर्माण के पीछे भ्रष्टाचार का बड़ा खेल रहता है। इसीलिए बार-बार सड़कें बनती हैं और जल्द ही टूट जाती हैं। सड़क निर्माण के नाम पर ठेकेदार, शासन-प्रशासन के लोग और जांच एजंसियां, तीनों की ऐसी मिलीभगत से घटिया सड़कें बनती हैं और जमकर सरकारी पैसों की बंदरबाट होती है। ऐसे में कोई अगर जान और माल दोनों से ठगा महसूस करता है, तो वे हैं सड़क पर चलने वाले लोग, जो कभी भी गड्ढे की चपेट में आकर अपनी जान गंवा बैठते हैं।

वैसे एक नजरिए से देखा जाए, तो गड्ढे युक्त सड़क की चपेट में आकर होने वाली मौत के जिम्मेदार हम लोग भी हैं। हम लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनी शक्ति का एहसास कराने से कतराते हैं। साथ में समाज के भी कुछ संवैधानिक उत्तरदायित्व हैं, जिसे वह निभाने से कतराता है। देश की जर्जर सड़क व्यवस्था में सुधार लाना कोई असंभव कार्य नहीं। पर इसके लिए अगर तैयार व्यवस्था नहीं दिखती तो देश की अवाम को जन-आंदोलन खड़ा करना चाहिए, क्योंकि गड्ढे की चपेट में कब कौन आएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं। अगर सड़क पर चलने के बाद घर सुरक्षित आना है तो हमें अपनी सुरक्षा खुद करनी होगी।

मोटर वाहन अधिनियम में संशोधन के लिए प्रस्तावित विधेयक में गड्ढों के लिए जिम्मेदार व्यक्ति पर मुकदमा दर्ज करने का भी जिक्र है। यह संशोधन संसद में लंबित पड़ा है। आखिर क्या कारण हैं कि इतने महत्त्वपूर्ण विषय को संसद से मंजूरी नहीं मिली है। लोग गड्ढों में गिर कर जिंदगी गंवा रहे हैं। ऐसे में सनद रहे, कि अगर हमारे राजनेता सच में बेहतर सामाजिक ढांचा निर्मित करना चाहते हैं तो उन्हें अपनी नीति और नीयत में बदलाव करना ही होगा। वरना स्थिति जस की तस बनी रहेगी, और सड़क ही गड्ढे हैं, या गड्ढे ही सड़क, इसी फेर में सबकुछ उलझा हुआ रहेगा।

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