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अंधेरा भी जरूरी है जिंदगी के लिए

मनुष्य ने प्रकाश के लिए कभी चांद और सूरज की तरफ देखा होगा।

अंधेरा भी जरूरी है जिंदगी के लिए

निर्देश निधि

अमेरिका के शिकागो में इंटरनेशनल डार्क स्काई एसोसिएशन द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार मनुष्य द्वारा रात में किया गया कृत्रिम प्रकाश पक्षियों के लिए अत्यधिक घातक सिद्ध हो रहा है। अध्ययन के अनुसार ऊंची इमारतों की खिड़कियों में जलने वाली बत्तियों के कारण रात में उड़ने वाले पक्षी भ्रमित हो जाते हैं। वे तेज रफ्तार से उड़ते हुए खिड़कियों से जा टकराते हैं, फिर गंभीर रूप से घायल होने के कारण उनकी मृत्यु हो जाती है।

मनुष्य ने प्रकाश के लिए कभी चांद और सूरज की तरफ देखा होगा। कभी अंधेरी रातों में जुगनू के चमकने पर कौतूहल से भर उठा होगा। विकास क्रम में उसने संसार की एक महत्त्वपूर्ण खोज कर डाली और वह थी ‘आग’। जल्दी ही वह जान गया कि आग के दूसरे कई प्रयोगों के साथ प्रकाश भी किया जा सकता। पर वह यहां भी ठहरा नहीं रह सका। वह सभ्यता के विकास की सीढ़ियां चढ़ता गया और प्रकाश के लिए दूसरे बेहतर साधनों की खोज करता रहा। हालांकि उसे सदियां लगीं पर एक दिन उसने बिजली से जलने वाले बल्ब का अविष्कार कर लिया। प्रकाश के क्षेत्र में मनुष्य ने यह बड़ी छलांग भरी थी। रात को दिन बना लेने की अपनी क्षमता पर गर्व स्वाभाविक था।

हालांकि तब किसी ने यह नहीं सोचा कि प्रकृति ने सारी व्यवस्थाएं देखभाल कर की हैं। जीवन के लिए जितना जरूरी प्रकाश है, उतना ही जरूरी है गहन अंधकार भी। पर मनुष्य ने रातों को भी अत्यधिक कृत्रिम प्रकाश से भर दिया। रिहायशी इलाके तो दूर, बिजली की चमचमाती रोशनी ने जंगलों की आंखें भी चौंधिया दीं। इस तरह अनेक प्रदूषणों के साथ ही धरती पर प्रकाश प्रदूषण भी एक भीषण समस्या बनता जा रहा है।

अमेरिका के शिकागो में इंटरनेशनल डार्क स्काई एसोसिएशन द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार मनुष्य द्वारा रात में किया गया कृत्रिम प्रकाश पक्षियों के लिए अत्यधिक घातक सिद्ध हो रहा है। अध्ययन के अनुसार ऊंची इमारतों की खिड़कियों में जलने वाली बत्तियों के कारण रात में उड़ने वाले पक्षी भ्रमित हो जाते हैं। वे तेज रफ्तार में उड़ते हुए खिड़कियों से जा टकराते हैं, फिर गंभीर रूप से घायल होने के कारण उनकी मृत्यु हो जाती है।

अक्तूबर 2020 में फिलाडेल्फिया में भी हजारों प्रवासी पक्षी ऊंची इमारतों की प्रकाशमान खिड़कियों से टकराने के कारण मर गए। भारत में प्रवासी पक्षियों के लिए यह प्रदूषण बहुत हानिकारक है। पक्षियों का भ्रमित होना कृत्रिम प्रकाश के आरंभिक दिनों से ही शुरू हो गया होगा। 1884 में मिसिसिपी घाटी में यह देखा भी गया था, जब एक प्रवासी जल पक्षी पोजार्ना कैरोलीना की लाईट टावर से टकराने से मृत्यु हो गई थी। तभी भविष्य द्रष्टाओं ने जान लिया था कि रात में किया जाने वाला अत्यधिक प्रकाश धरती पर विचरते जीवों के जीवन पर नकारात्मक असर भी डालेगा।

कृत्रिम प्रकाश के अत्यधिक और अनुचित प्रयोग का जब प्रकृति और जीवों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने लगता है तब यह प्रकाश, प्रदूषण बन जाता है। यह नकारात्मक प्रभाव कई तरीकों से आ सकता है। जिस स्थान पर मनुष्य का काम एक अकेली बत्ती से चल सकता है, वहां भी वह कई बत्तियां लगा कर चकाचौंध का वातावरण बना दिया जाता है, जिसके कारण जीवों की आंखें चौंधिया जाती हैं और वे अपनी सामान्य जीवन प्रक्रिया से भटक जाते हैं।
रात में शहरों के आसमान पर जो लाइट का ग्लोब जैसा घेरा दिखाई देता है उसे शहरी आकाशीय चमक या अर्बन स्काई ग्लो कहा जाता है।

सड़कों पर लगी तेज बत्तियों और वाहनों की बत्तियों या ऊंची अट्टालिकाओं में जलती तेज बत्तियों के कारण नगर का आकाश सामान्य से अधिक चमकीला दिखाई देता है। आकाश पर प्रकाश का एक गुंबद जैसा बन जाता है और आकाश में तारे दिखाई नहीं देते, आकाश गंगाएं भी दिखाई नहीं देतीं, जिसके कारण अंतरिक्ष संबंधी या खगोलीय खोज और शोध भी बुरी तरह प्रभावित होते हैं। खुले आकाश की दिशा में ऊपर को जलाई जाने वाली लाइट को अपलाइट कहा जाता है। यह प्रकाश प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण होती है। अपलाइट रात में उड़ने वाले पक्षियों के लिए सबसे अधिक घातक होती है।

अंधकार और प्रकाश का प्राकृतिक चक्र मनुष्य सहित सभी जीवों की नींद को सामान्य रखता है। अत्यधिक कृत्रिम प्रकाश मनुष्यों के मेलाटोनिन हार्मोन के स्राव में कमी लाता है। यह हार्मोन मनुष्य की नींद में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब मेलाटोनिन का स्राव कम होता है, तो मनुष्य के सोने-जागने की प्रक्रिया बाधित होती है। अनिद्रा की स्थिति पैदा होती है, जो प्रजनन की सामान्य प्रक्रिया को बाधित करती है। नींद पूरी न होना या बेसमय आना मनुष्य की कार्यक्षमता को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। कृत्रिम प्रकाश मनुष्य की सर्केडियन लय या बायोलोजिकल क्लाक को भी प्रभावित करता है, जिसके कारण मनुष्य को अवसाद, झुंझलाहट, बेचैनी, चिंता, चिड़चिड़ाहट और नींद का न आना आदि समस्याएं पैदा होती हैं। इससे कैंसर, हृदय रोग, मधुमेह, मोटापा और गेस्ट्रो एंटाइनल आदि रोगों का भय उत्पन्न होता है।

प्रकाश प्रदूषण मनुष्य के साथ-साथ पौधों पर भी बुरा असर डालता है। यह पौधों के फोटो पीरियड या दीप्तिकाल को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। फोटो पीरियड वह अवस्था होती है जब पौधा प्राकृतिक प्रकाश प्राप्त करके पुष्पन की प्रक्रिया पूरी करता है। इसके लिए उसे दिन और रात यानी प्रकाश और अंधकार का संतुलन चाहिए होता है। यह रात में खिलने वाले पौधों के परागण में भी बाधा बनता है।

दिन के समय शांत पड़े रहने वाले और सुबह-शाम या रात में सक्रिय होने वाले जीवों की प्रजनन क्रिया में भी कृत्रिम और अत्यधिक प्रकाश बाधा उत्पन्न कर सकता है। भारत के समुद्र तटों पर कुछ जीव, विशेषकर कछुए रात में ही प्रजनन क्रिया करते हैं। अत्यधिक कृत्रिम प्रकाश उन्हें समुद्र तटों की ओर जाने से रोकता है, जिससे उनकी प्रजनन दर प्रभावित होती है। मछलियां भी इससे प्रभावित होती हैं। यह कीड़ों की आबादी में कमी लाता है। कीड़े नहीं तो परागण नहीं, जिस पर दुनिया के खाद्य उत्पादन का लगभग एक तिहाई हिस्सा निर्भर है।

आकाश गंगाओं के तारे और चंद्रमा का प्रकाश पशुओं का भी मार्गदर्शन करते हैं, पर अत्यधिक कृत्रिम प्रकाश से पशुओं की देखने की क्षमता प्रभावित हुई है। रायल कमीशन आफ एनवायरमेंटल पोल्यूशन की रिपोर्ट बताती है कि अनेक जीव प्राकृतिक प्रकाश के उतार-चढ़ाव से अपनी जीवन प्रक्रिया साधते हैं, पर अत्यधिक प्रकाश उनके हाइबरनेशन और प्रजनन जैसी क्रियाओं को बाधित करता है, जिससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है।

जिन स्थानों पर कृत्रिम प्रकाश पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करता है वहां अत्यधिक कृत्रिम प्रकाश का प्रयोग वर्जित किया जाना चाहिए। फ्रांस ने ऐसा किया भी है। उसने स्काई बीम पर प्रतिबंध लगा दिया है। कई जगहों पर बत्ती जलाने का समय निश्चित है। खासकर वन क्षेत्रों से गुजरने वाली सड़कों आदि पर प्रकाश की व्यवस्था इस तरह की जानी चाहिए ताकि वह मात्र आवश्यक स्थान पर फैले। जहां कृत्रिम प्रकाश की आवश्यकता नहीं है, मनुष्य को उन स्थानों पर प्रकाश फैलाने से बचना चाहिए। साथ ही तेज बत्तियों की जगह हल्की बत्तियां लगा सकते हैं।

अगर प्रकाश प्रदूषण कम होगा तो कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आएगी और जैव-विविधता को पहुंचने वाला नुकसान रुकेगा। संसार के कई स्थानों पर अस्सी प्रतिशत आबादी को घने अंधेरे वाला आसमान दिखाई ही नहीं देता। 1994 में लास एंजिलिस में भूकम्प आने के कारण बिजली व्यवस्था ठप हो गई, तब न जाने कितने बरसों के बाद घुप्प अंधेरे के कारण आकाश दिखाई दिया। प्रकाश प्रदूषण की समस्या लगभग हर देश की है। पर यह समस्या सीरिया जैसे युद्ध प्रभावित देशों में नहीं है, क्योंकि उन देशों में शत्रु के आक्रमण के भय से रात में सभी तरह के प्रकाश स्रोत बंद कर दिए जाते हैं। भले अंधेरे को अज्ञानता से क्यों न जोड़ा गया हो, पर धरती के तमाम जीवों और माइक्रो आर्गेनिज्म के लिए अंधेरा भी आवश्यक है।

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First published on: 16-12-2021 at 05:51:30 am
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