हिंसा पर चुप्पी के खतरे

हिंसा और आक्रामकता को मौन स्वीकृति मिलने से संस्थागत ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है।

सांकेतिक फोटो।

ज्योति सिडाना

हिंसा और आक्रामकता को मौन स्वीकृति मिलने से संस्थागत ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है। सवाल है कि हम ऐसा क्या करें जिससे हिंसा का माहौल खत्म हो और भारतीय समाज शांतिपूर्ण व्यवस्था का हिस्सा बन सके। ऐसे कौन से विकल्प हैं जो समाज को भय और हिंसा मुक्त बनाने में सक्षम हो सकते हैं, यह विचारणीय विषय है।

हाल के वर्षों में समाज में हिंसक घटनाएं जिस तेजी से बढ़ी हैं, उससे लगता है कि हर तरफ हिंसा, क्रोध, भय, असत्य और आक्रामकता का न केवल वर्चस्व स्थापित हुआ है बल्कि इनको वैधता भी मिल रही है। ज्यादा चिंता की बात यह है कि इस तरह की घटनाओं को सामान्य मान कर नजरअंदाज किए जाने की प्रवृत्ति भी तेजी से बढ़ी है। समाज और शासन दोनों ही स्तरों पर यह देखने को मिल रहा है। महात्मा गांधी ने हिंसा को परिभाषित करते हुए कुविचार, मिथ्या, द्वेष, किसी का बुरा चाहना, जातिगत विद्वेष आदि सब हिंसा का ही रूप बताया था। साथ ही यह भी कि संसार के लिए जो वस्तु आवश्यक है उस पर कब्जा रखना भी हिंसा है। लेकिन आज हमारे सामने ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनकी चर्चा इस संदर्भ में की जा सकती है।

समाज में समय-समय पर हिंसा के कई स्वरूप उभरते रहे हैं। मौखिक, शारीरिक और भावनात्मक हिंसा, शक्ति तथा धन के अहंकार में की जाने वाली हिंसा, बेरोजगारी, गरीबी, निरंतर उत्पीड़न और हताशा के कारण उत्पन्न होने वाली हिंसा, हम बनाम वे और इसका हिंसा से संबंध, पुलिस के व्यवहार के प्रति आक्रोश और हिंसा इत्यादि। घर-परिवारों के भीतर निजी संबंधों में मनमुटाव के कारण होने वाली हिंसा, परिवार में संपत्ति व प्रभुत्व के लिए हिंसा इत्यादि भी इसके रूप और कारण हैं जिन्होंने औपचारिक एवं अनौपचारिक संस्थाओं को या तो तोड़ दिया है या फिर टूटने के कगार पर पंहुचा दिया है। इतना ही नहीं, राजनीतिक, प्रशासनिक और धन-बल का उपयोग करके झूठे मुकदमे दायर करना भी हिंसा का ही रूप हैं।

इस प्रकार की हिंसा समाज को प्रतिशोध की ओर धकेलती है। यह भी एक तथ्य है कि भ्रष्टाचार हमेशा से ही हिंसा का एक रूप रहा है। छोटी-सी बात पर जान ले लेने, निजी रिश्तों में संदेह के आधार पर मारपीट व हत्या, प्रेम-प्रसंग या जाति के इतर विवाह करने पर हत्या कर देने जैसी घटनाएं अब जैसे सामान्य बात हो गई हैं। इसलिए हिंसा किसी भी प्रकार की क्यों न हो, समाज के विकास और प्रगति में बाधा ही उत्पन्न करती है। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि आज देश लोकतंत्र, खुशहाली, मानव विकास, लैंगिक समानता आदि के वैश्विक सूचकांकों में निम्न स्तर पर बना हुआ है तो उसके मूल कारण भी कहीं न कहीं बढ़ती हिंसक प्रवृत्तियों में मौजूद हैं।

हाल के दिनों में जिस तरह की हिंसक घटनाएं देखने को मिली हैं वे और ज्यादा गंभीर हैं। मसलन, उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में प्रदर्शनकारी किसानों को एक काफिले की गाड़ियों ने कुचल दिया। आरोप है कि इनमें एक वाहन एक मंत्री-पुत्र था। प्रतिशोध में हिंसा भड़क उठी और चार और लोग मारे गए। देश में बलात्कार की बढ़ती घटनाएं बताती हैं कि हमने महिलाओं के सम्मान को खत्म कर डाला है। चुनावी हिंसा की बात करें तो पश्चिम बंगाल में चुनाव नतीजों के बाद हुई हिंसा ने लोकतंत्र और कानून-व्यवस्था के अहम सवाल एक बार फिर खड़े कर दिए। अल्पसंख्यकों और दलितों के विरुद्ध बढ़ती हिंसा समाज में बढ़ती विघटन की प्रवृत्ति का प्रमाण है।

हिंसा की तमाम ऐसी घटनाएं एक आध्यात्मिक एवं शांति प्रिय समाज को हिंसक समाज में परिवर्तित करने पर उतारू हैं। आतंकवाद की बात करें तो आज यह समस्या वैश्विक हिंसा के सबसे भयावह रूप में मौजूद है और दुनिया के ज्यादातर देश इससे त्रस्त हैं। सवाल यह है कि क्या आतंकवाद को ताकत से ही समाप्त किया जा सकता है? विवेक-सम्मत जवाब तो यही होगा कि कदापि नहीं। अगर ऐसा हो सकता तो दुनिया से आतंकवाद, उग्रवाद या अपराध कब के समाप्त हो चुके होते। कहने को तमाम देश आतंकी संगठनों के खिलाफ अभियान चला रहे हैं, लेकिन यह समस्या खत्म होने के बजाय बढ़ती जा रही है।

भारत एक बहु-संस्कृति वाला राष्ट्र रहा है। देश में ‘हमारी संस्कृति’ और ‘उनकी संस्कृति’ के सवाल इतने महत्त्वपूर्ण और गंभीर पहले कभी नहीं हुए, जितने वर्तमान दौर में देखने को मिल रहे हैं। समूचा संचार माध्यम इन पक्षों पर केंद्रित दिख रहा है। देखने में आ रहा है कि परंपरा को गर्व के साथ जोड़ कर अनेक व्यक्ति या समूह अपने क्रोध एवं अपनी आक्रामकता को पेश करने में गौरव समझ रहे हैं। वस्तुत: परंपरा की गर्व के साथ स्वीकृति कुछ लोगों या समूहों में हिंसा की उपस्थिति का परिचायक है जो उनके विचारों, चर्चा और उनकी गतिविधियों में उभर कर आता है।

यह स्थिति उन व्यक्तियों में धीरे-धीरे ऐसा सत्तावादी चरित्र विकसित करती जाती है जिनमें स्वयं का प्रभुत्व एवं स्वयं का सम्मान ही सर्वश्रेष्ठ होता है। संभवत: यही पक्ष उन्हें लोकतंत्र व सहिष्णुता के मूल्यों से परे ले जाता है। ऐसे लोग क्रोध व आक्रामकता के साथ अपनी श्रेष्ठता को सिद्ध करते हैं और दूसरे समूहों को व उनकी सहिष्णुता को उनकी कमजोरी बताते हैं। पर वे ये भूल जाते हैं कि आक्रामकता व हिंसा के सहारे कोई भी समूह या व्यक्ति अल्पकालिक समय के लिए प्रभावी तो हो जाता है लेकिन लंबे समय तक ऐसा नहीं हो सकता। उसके अपने समूह ही डरने लगते हैं कि उनकी आक्रामकता और हिंसात्मक प्रतिक्रिया कहीं उनके समूह को ही नुकसान न पहुंचा दे।

एक विकसित लोकतंत्र में विरोध और असहमति किसी भी नागरिक का अधिकार है। उसके इस अधिकार की रक्षा करना राज्य एवं प्रशासन का दायित्व है, न कि उसके विरुद्ध हिंसा या आक्रामक कदम उठा कर उसे भयभीत करने का प्रयास करना अथवा उसके इस अधिकार का बलपूर्वक दमन करना। नोबल पुरस्तार विजेता भारतीय अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने एक बार इस तरह की बढ़ती घटनाओं पर रोष व्यक्त करते हुए कहा भी था कि देश में चर्चा और असहमति की गुंजाइश कम होती जा रही है। साथ ही इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि तुलनात्मक रूप से अब हिरासत में मौत की घटनाओं में भी वृद्धि हुई है।

यह विरोधाभास ही है कि गांधी जी के सत्य व अहिंसा के जिन मूल्यों को मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला जैसे व्यक्तित्वों ने अपनी जीवन शैली व कार्य प्रणाली में शामिल किया, वही मूल्य अपने देश में हाशिए पर नजर आ रहे हैं। यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि मानव शोषण के विरुद्ध सतत वैश्विक संघर्ष के इतिहास में महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला मील के वे पत्थर हैं जो विश्व सभ्यता के इतिहास को स्वर्णिम बनाते हैं और हिंसा, संघर्ष व शोषण के विरुद्ध सक्रियता के परिचायक बन जाते हैं। सवाल है कि क्यों हम अब तक सत्य, अहिंसा, शांति, न्याय और समानता के मूल्यों को प्रत्येक नागरिक की जीवन शैली और व्यक्तित्व का हिस्सा नहीं बना पाए?

हिंसा और आक्रामकता को मौन स्वीकृति मिलने से संस्थागत ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है। सवाल है कि हम ऐसा क्या करें कि हिंसा का माहौल खत्म हो और भारतीय समाज शांतिपूर्ण व्यवस्था का हिस्सा बन सके। ऐसे कौन से विकल्प हैं जो समाज को भय और हिंसा मुक्त बनाने में सक्षम हो सकते हैं, यह विचारणीय विषय है। इसके साथ ही यह भी सोचना होगा कि समाज को हिंसा मुक्त बनाने में शिक्षा कैसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है? समाज में फैलती हिंसा की संस्कृति को वैधता न मिले, इसके लिए कौन से प्रयास किए जाएं? ये ऐसे अहम सवाल हैं जिन पर सामूहिक चिंतन की तत्काल आवश्यकता है।

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