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बर्फ के अकाल का खतरा

जलवायु परिवर्तन के अनेक दुष्परिणाम देखने में आ रहे हैं।

बर्फ के अकाल का खतरा
सांकेतिक फोटो।

प्रमोद भार्गव

जलवायु परिवर्तन के अनेक दुष्परिणाम देखने में आ रहे हैं। इनमें से एक उत्तरी व दक्षिणी धु्रव क्षेत्रों में बढ़ते तापमान के कारण बर्फ का पिघलना भी है। अत्यधिक गर्मी अथवा सर्दी का पड़ना भी इसी के कारक माने जा रहे हैं। वैज्ञानिकों की यह चिंता तब और ज्यादा बढ़ गई, जब अंटार्कटिका में तैर रहे फ्रांस से भी बड़े आकार के हिमनद टाटेन के पिघलने की जानकारी अनुमानों से कहीं ज्यादा निकली।

जलवायु परिवर्तन धीरे-धीरे दुनिया में बड़े बदलाव ला रहा है। इसका असर अमेरिका सहित दुनिया के कई क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर स्पष्ट रूप से दिखने भी लगा है। हाल में इसका एक बड़ा प्रभाव पश्चिमी अमेरिका में देखने को मिला है, जो भविष्य में अमेरिका में बर्फ के अकाल का संकेत दे रहा है। यह शोध विज्ञान पत्रिका नेचर में ‘रिव्यूज अर्थ एंड एनवायरमेंट’ शीषर्क से प्रकाशित हुआ है। शोध के अनुसार पश्चिमी अमेरिका के कैलिफोर्निया जैसे राज्यों में हिम की उपलब्धता का संकट पैदा हो सकता है। इससे यहां के पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, नदी-तालाब और जंगल में आग की घटनाएं तेजी से बढ़ सकती हैं। शोधकर्ताओं का दावा है कि यदि जीवाश्म र्इंधन का उत्सर्जन नहीं रोका गया, तो कुछ पर्वत शृंखलाओं की बर्फ 2050 तक पैंतालीस प्रतिशत तक घट सकती है। बर्फीले मौसम या तो बहुत कम दिनों के रह जाएंगे या फिर बिना बर्फ के ही रह जाएंगे। भारत के कुछ हिमालयी क्षेत्रों में भी बर्फ तेजी से छीज रही है।

अमेरिका के पश्चिमी इलाकों में चिंता पैदा करने वाले बदलाव दिख रहे हैं। शोध के मुताबिक, सिएरा में करीब सत्तर प्रतिशत से ज्यादा स्थानीय जल प्रबंधकों का मानना है कि पश्चिमी अमेरिका में अपनाई जा रही जल-प्रबंधन की नीतियां भविष्य के जलवायु परिवर्तन के लिहाज से उपयुक्त नहीं हैं। नतीजतन पश्चिमी अमेरिका के सिएरा-नवेदा में गिरी बर्फ कैलिफोर्निया के पानी की तीस फीसदी मांग पूरी करती है। लेकिन अब इस राज्य में बर्फ के अकाल के कई दौर देखने में आ रहे हैं। साल 2021 के वसंत में सिएरा को केवल उनसठ प्रतिशत ही बर्फीला पानी मिल पाया। मई के महीने में पड़ी भीषण गर्मी ने दस प्रतिशत बर्फ को वाष्प में बदलने का काम किया। जून में समूची बर्फ पिघल कर पानी में बदल गई और बह गई। ये बर्फ के अकाल के स्पष्ट संकेत हैं। इस अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता एलन रोड्स और उनके साथियों ने अमेरिका के पश्चिमी राज्यों में बर्फ की मात्रा घटने व बढ़ने का समयबद्ध अध्ययन किया।

अध्ययन में यह सामने आया कि अमेरिका के सभी क्षेत्रों में हिम-पुंजों का साल 2050 से तेजी से क्षरण होने लगेगा, जो इस क्षेत्र को बर्फ के अकाल में बदल सकता है। दरअसल, इस क्षेत्र की सिएरा, नेवादा और कैस्केड जैसी पर्वतमालाओं से गर्म प्रशांत महासागर से नम हवाएं टकराती हैं, जो कैलिफोर्निया की पर्वत शृंखलाओं की बर्फ को तेजी से पिघलाने का काम करती हैं। यदि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन को बड़ी मात्रा में नहीं रोका गया तो पैंतीस से साठ साल बाद इन हिमखंडों का क्षरण नियमित रूप से दिखाई देने लगेगा। यह अध्ययन दर्शाता है कि बढ़ता वैश्विक तापमान किस तरह से स्थानीय जलवायु पर असर डाल रहा है। यह स्थिति भविष्य में आबादी के बड़े हिस्से के लिए जल संकट का भयावह कारण बन सकती है। अतएव र्इंधन और ऊर्जा के स्रोतों में रूपांतरण ठीक से नहीं किया गया तो बर्फ का अकाल विस्तरित होता चला जाएगा।

जलवायु परिवर्तन के अनेक दुष्परिणाम देखने में आ रहे हैं। इनमें से एक उत्तरी व दक्षिणी धु्रव क्षेत्रों में बढ़ते तापमान के कारण बर्फ का पिघलना भी है। अत्यधिक गर्मी अथवा सर्दी का पड़ना भी इसी के कारक माने जा रहे हैं। वैज्ञानिकों की यह चिंता तब और ज्यादा बढ़ गई, जब अंटार्कटिका में तैर रहे फ्रांस से भी बड़े आकार के हिमनद टाटेन के पिघलने की जानकारी अनुमानों से कहीं ज्यादा निकली। यानी अभी तक जो अनुमान लगाए गए थे, उसकी तुलना में यह विशालकय हिमनद कहीं ज्यादा तेजी से पिघल रहा है।

इससे समुद्र का जलस्तर बढ़ने की भी आशंका जताई जा रही है। सेंट्रल वाशिंगटन विश्वविद्यालय के पाल बिनबेरी द्वारा किए अध्ययन अमेरिका के नेशनल स्नो एंड आइस सेंटर ने दावा किया है कि 32.90 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र से उत्तरी धु्रव पर बर्फ पिघली है। भारत से यह क्षेत्र नौ हजार आठ सौ तिरसठ किलोमीटर दूर है। मेरीलैंड विश्वविद्यालय के भू-भौतिकविद डेनियल लेथ्रोप का कहना है कि इसका कारण पृथ्वी की बाहरी परत में हलचल होना है। पृथ्वी के केंद्र (कोर) में लोहा और निकेल धातुओं का गर्म तरल महासागर है और इस हलचल से विद्युतीय क्षेत्र पैदा होता है। हालांकि चुबंकीय धु्रव के तेजी से खिसकने का अभी सटीक कारण भू-विज्ञानी ज्ञात नहीं कर पाए हैं।

हालांकि कनाडा के एक वैज्ञानिक जेम्स क्लार्क रास ने 1830 में पहली बार इसी तरह की जानकारी दी थी। एक अन्य अध्ययन से यह भी ज्ञात हुआ है कि वर्ष 2000 में पृथ्वी के उत्तरी धु्रव ने अपने खिसकने की दिशा ग्रीनविच मेरिडियन (लंदन) की ओर कर दी है। अनुमान है कि यह परिवर्तन धरती पर पानी के वितरण में बदलाव और धु्रवीय बर्फ के पिघलने के कारण हुआ है। इसे जलवायु परिवर्तन की वजह माना है। बीसवीं सदी में उत्तरी धु्रव, टोरंटो और पनामा शहर को जोड़ने वाली देशांतर रेखा कनाडा की हड़सन खाड़ी की ओर बढ़ रही है। इस परिवर्तन का कारण यह था कि पिछले हिमयुग के बाद पृथ्वी की परतों में द्रव्यमान का पुनर्वितरण हुआ था। किंतु वर्ष 2000 में नाटकीय ढंग से इस दिशा में 75 डिग्री का अंतर आया और पृथ्वी का अक्ष ग्रीनविच मेरीडियन की ओर बढ़ने लगा। ऐसा माना गया है कि ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की बर्फीली चादर के सिकुड़ने की वजह से ऐसा हुआ।

इस परिप्रेक्ष्य में किए गए एक अन्य अध्ययन से सामने आया कि धरती पर पानी का पुनर्वितरण व भरण भी इसका एक कारण है। इस अध्ययन के प्रमुख नासा की जेट प्रपल्शन प्रयोगशाला के सुरेंद्र अधिकारी हैं। उनके अनुसार वैश्विक स्तर पर पानी के पुनर्वितरण व भरण से पृथ्वी की घूर्णन प्रक्रिया पर असर पड़ता है। भारतीय उपमहाद्वीप और केस्पियन सागर तेजी से भारी मात्रा में पानी नष्ट कर रहे हैं। 2003 में ग्रीनलैंड में प्रतिवर्ष दो हजार सात सौ बीस खरब किलोग्राम बर्फ पानी बन कर बह गई। इसी प्रकार पश्चिमी अंटार्कटिका से एक हजार दो सौ चालीस खरब और पूर्वी अंटार्कटिका से सात सौ चालीस खरब किलोग्राम बर्फ बह कर चली जाती है। इस अध्ययन के लिए ग्रेस उपग्रह के आंकड़े प्रयोग में लाए गए हैं। इस उपग्रह के माध्यम से 2002 से 2015 के दरम्यान इन तथ्यों को खोजा गया है कि जलराशियों के वितरण पर पृथ्वी की घूर्णन अक्ष की दिशा से क्या अंतर्सबंध है। इसके परिणामों से यह भी पता चला है कि पृथ्वी इन जलराशियों के प्रभाव से डोलती भी है।

धु्रवीय बदलाव से पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र पर होने वाले असर को लेकर भू-विज्ञानी एकमत नहीं हैं। कुछ विशेषज्ञ इस बदलाव को विनाशकारी मानते हैं, जिसमें भूकंप और सुनामी जैसे खतरे शामिल हैं। लेकिन दूसरे विज्ञानी इन प्रलंयकारी भविष्यवाणियों को बेबुनियाद बताते हुए खारिज करते हैं। इनका मत है कि पृथ्वी का चुबंकीय क्षेत्र अनुमानों के मुताबिक पिछले डेढ़ सौ साल में ग्यारह सौ वर्ग किलोमीटर खिसका है। पैंतीस करोड़ वर्षों में ऐसा करीब चार सौ बार हो चुका है। इस बदलाव में एक हजार या इससे अधिक वर्ष लगते हैं।

जलवायु परिवर्तन के इन सब कारणों पर नियंत्रण के लिए ही इस साल नवंबर में ग्लासगो में जलवायु शिखर सम्मेलन हुआ। इसमें ‘पेरिस अनुबंध की धारा-6 नियमावली’ वजूद में लाई गई है। इससे कार्बन बाजार के महत्त्व, उससे जुड़ी संभावनाओं और चुनौतियों को लेकर विचार-विमर्श का दायरा बढ़ा है। लेकिन इसके परिणाम कितने सार्थक निकलते हैं, यह फिलहाल भविष्य के गर्भ में है। इस लिहाज से बर्फ के अकाल की चुनौती का सामना न करना पड़े, इसके लिए औद्योगिक उत्पादनों पर अंकुश की पहल जरूरी है।

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