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चुनौती बनते साइबर अपराध

भारत सहित दुनियाभर में साइबर अपराध जिस तेजी से बढ़े हैं।

सांकेतिक फोटो।

अभिषेक कुमार सिंह

चाहे एक दूसरे देशों के प्रतिष्ठानों में सेंध लगाने का मामला हो या फिर बैंक खाते, एटीएम, मोबाइल बैंकिंग या सेंधमारी जैसे साइबर फर्जीवाड़ों से जुड़े अपराध हों, या फिर ईमेल, फेसबुक, वाट्सऐप आदि में सेंधमारी के मामले हों, साइबर अपराध समाज और सरकारों के लिए गंभीर समस्या के रूप में उभरे हैं।

भारत सहित दुनियाभर में साइबर अपराध जिस तेजी से बढ़े हैं, उससे सरकारों की नींद उड़ जाना लाजिमी है। शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता होगा, जब किसी साइबर अपराध की खबर नहीं सुनाई पड़ती हो। चाहे एक दूसरे देशों के प्रतिष्ठानों में सेंध लगाने का मामला हो या फिर बैंक खाते, एटीएम, मोबाइल बैंकिंग या सेंधमारी जैसे साइबर फर्जीवाड़ों से जुड़े अपराध हों, या फिर ईमेल, फेसबुक, वाट्सऐप आदि में सेंधमारी के मामले हों, साइबर अपराध समाज और सरकारों के लिए गंभीर समस्या के रूप में उभरे हैं।

भारत में यह समस्या और तेजी से बढ़ रही है। इस समस्या का सबसे गंभीर पहलू यह है कि साइबर अपराध करने वालों में नौजवानों की संख्या और भूमिका बड़ी होती जा रही है। पढ़े-लिखे नौजवान पेशेवेर भी इसमें शामिल हैं, तो ऐसे भी किशोर और युवा भी हैं हैं, जिन्होंने डिग्री स्तर तक की शिक्षा भी हासिल नहीं की है। लेकिन सूचना तकनीक के मामूली जानकार ये अपराधी साइबर थानों से लेकर डिजिटल विशेषज्ञों तक को हर मामले में छका दे रहे हैं। इसका प्रमाण हाल की वह घटना है जिसमें कुछ युवाओं ने मुसलिम महिलाओं की आनलाइन नीलामी का एक ऐप बना कर साइबर जगत में उनकी बदनामी की कोशिश की। इन मामलों में जिन युवाओं की धरपकड़ हुई है, उनके बारे में मिली जानकारियां साइबर विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों को यह सोचने के लिए विवश कर रही हैं कि आखिर क्यों साइबर अपराध हमारे युवाओं को इस तरह अपनी ओर लुभा रहे हैं कि वे सही-गलत का फर्क नहीं कर पा रहे हैं।

ताजा मामला मुसलिम महिलाओं को बदनाम करने और उनके खिलाफ नफरत फैलाने के अभियान से जुड़ा है। बुल्ली बाई नामक ऐप कुछ अरसा पहले चर्चा में आए एक अन्य ऐप- सुल्ली बाई जैसा ही था, जिसका इस्तेमाल मुसलिम महिलाओं के खिलाफ इंटरनेट-सोशल मीडिया पर नफरत का माहौल बनाने के लिए हो रहा था। इस ऐप में सोशल मीडिया से कुछ नामचीन मुसलिम महिलाओं की तस्वीरें जुटाई गईं और उन्हें बिक्री के लिए उपलब्ध नीलामी के लिए अपलोड कर दिया गया। इस घटना से आहत महिलाओं ने पुलिस में मामला दर्ज करवाया। पुलिस ने देश के अलग-अलग हिस्सों से जिन नौजवानों पकड़ा, उनके बारे में मिली जानकारियां चौंकाती हैं।

महिलाओं के सम्मान को साइबर दुनिया में ठेस लगाने वाले इन अभियुक्तों के बारे में जो बात हमारे देश और समाज को परेशान करने वाली है, वह इनका बेहद युवा और पढ़ा-लिखा होना है। बैचलर आफ कंप्यूटर एप्लिकेशन (बीसीए) की डिग्री ले चुके एक आरोपी ने कबूल किया कि मुसलिम महिलाओं को आनलाइन प्रताड़ित करने के मकसद से उसने सुल्ली ऐप बनाया था। इसी तरह बुल्ली बाई ऐप बनाने वाले एक आरोपी ने बताया कि सोशल मीडिया पर उसके अलग-अलग पहचान से खाते हैं जिनके जरिए वह इंटरनेट पर सक्रिय रहता है। इस मामले में उत्तराखंड के रुद्रपुर से अठारह साल की एक छात्रा भी पकड़ी गई।

साइबर अपराधों के मामले में ये घटनाएं एक नए किस्म की चुनौती हैं। हाल के दौर में साइबर अपराधों की फेहरिस्त पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि ओटीपी (वन टाइम पासवर्ड) और क्रेडिट कार्ड संबंधी जालसाजी, ई-कामर्स, फर्जी पहचान पत्र बनाने, फर्जी मोबाइल नंबर हासिल करने, फर्जी पता तैयार करने और चोरी के सामान की इंटरनेट के जरिए खरीद-बिक्री आदि से लेकर कोई ऐसा साइबर फर्जीवाड़ा नहीं बचा है जिस पर इस दुनिया में सक्रिय अपराधियों ने हाथ न आजमाया हो। ऐसे मामलों में धरपकड़ के बाद भी इसकी रत्ती भर भी गारंटी नहीं है कि ऐसी डिजिटल धांधलियां जल्द ही रुक जाएंगी और जनता बेफिक्र होकर हर तरह का वर्चुअल लेनदेन, खरीद-फरोख्त या सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर पाएगी। सवाल है कि ऐसे हालात क्यों पैदा हुए हैं और क्या इन साइबर अपराधों का कोई अंत है?

जब से महामारी ने दुनिया को अपनी गिरफ्त में लिया है, साइबर अपराधियों की मानो लाटरी निकल आई है। चूंकि कोरोना काल में खरीदारी, पढ़ाई से लेकर ज्यादातर आर्थिक गतिविधियां बरास्ता इंटरनेट कंप्यूटर नेटवर्क के जरिए संपन्न हो रही हैं, ऐसे में उनमें सेंध लगाने के खतरे उतने ही बढ़ गए हैं। इस बारे में एक वैश्विक विश्लेषण अमेरिका की वेरिजान बिजनेस कंपनी ने किया। कंपनी ने मई 2021 में तैयार रिपोर्ट में बताया कि उसने वर्ष 2021 में दौरान अट्ठासी देशों, बारह उद्योगों और तीन विश्व क्षेत्रों में फैले दायरे में उनतीस हजार इंटरनेट सुरक्षा संबंधी घटनाओं का विश्लेषण किया।

इस विश्लेषण के आधार पर दुनिया भर में डाटा उल्लंघन यानी डिजिटल सेंधमारी के सवा पांच हजार मामले दर्ज किए गए। डिजिटल सेंधमारी में एक किस्म है फिशिंग की, यानी बैंकों के क्रेडिट कार्ड आदि की जानकारी चुरा कर रकम उड़ा लेना। दूसरी किस्म है- रैंसमवेयर यानी फिरौती की। इसमें लोगों, कंपनियों के कंप्यूटर नेववर्क पर साइबर हमला कर उन्हें अपने कब्जे में ले लिया जाता है और इसके बदले में भारी-भरकम फिरौती वसूली जाती है। विश्लेषण में पता चला है कि पिछले साल की तुलना में फिशिंग में ग्यारह फीसद और रैंसमवेयर में छह फीसद की बढ़ोत्तरी हुई।

साइबर अपराध की तीसरी किस्म सोशल मीडिया पर मौजूद लोगों को किसी न किसी तरीके से अपमानित करने वाले अपराध की है, जो सुल्ली-बुल्ली बाई जैसे ऐप की मार्फत किए जा रहे हैं। पिछले डेढ़-दो साल में ही लोगों के बैंक खातों, निजता यानी पहचान से जुड़े डाटा पर हाथ साफ करने जैसे मामलों में साढ़े छह सौ फीसद का इजाफा हुआ है। भारत में ऐसी घटनाओं की सालाना संख्या छह-सात लाख तक पहुंच गई है।

यहां बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर ऐसे साइबर अपराधों की रोकथाम कैसे हो। हालांकि कानूनी उपाय इसका एक रास्ता है। लेकिन बात सिर्फ कानून बनाने मात्र से नहीं बन रही है। चूंकि साइबर अपराधी अब अंतरदेशीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गिरोह बना कर काम कर रहे हैं, इसलिए खातों से उड़ाई गई रकम रातों-रात एक देश से बाहर दूसरे ठिकानों पर चली जाती है।

इसी तरह बुल्ली बाई जैसे ऐप जिस गिटहब नामक मंच पर बन रहे हैं, वे विदेशों से संचालित हो रहे हैं। ऐसे में देश के कानून बेमानी हो जाते हैं। सबसे ज्यादा मुश्किल उन लोगों के लिए है जिन्हें बैंकिंग, खरीदारी के वर्चुअल विकल्प मजबूरी में (जैसे कि कोरोना काल में) अपनाने पड़े हैं और जिन्हें इन साइबर उपायों की समझ व जानकारी बिल्कुल नहीं है। ऐसे लोग एटीएम से पैसे निकालने के लिए अक्सर अनजान लोगों की मदद लेते हैं और उन्हें अपने एटीएम का पिन नंबर तक बता डालते हैं।

जाहिर है, डिजिटल प्रबंधों को जरूरी बनाने के साथ सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह कानून बनाने के साथ कड़ी सजाओं के प्रावधान भी करे और साइबर थानों में दर्ज हर शिकायत पर कार्रवाई सुनिश्चित करे। अभी तो आलम यह है कि साइबर पुलिस हील-हुज्जत के बाद शिकायत दर्ज करने के अलावा कोई और काम नहीं करती। अक्सर पीड़ितों को खुद ही बैंकों और पुलिस थानों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। ध्यान रहे कि हमारे देश में खाली बैठे-ठाले शातिर लोगों और बेरोजगारों की एक बड़ी फौज अमेरिका-ब्रिटेन तक के नागरिकों को फर्जी काल सेंटर आदि के जरिए लूटने पर आमादा है। ऐसे में यदि साइबर अपराधियों की धरपकड़ कर उन्हें बेहद सख्त सजा देने में तेजी नहीं लाई गई, तो यह मर्ज एक लाइलाज महामारी की तरह ही बढ़ता जाएगा।

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