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मानसून के अनुमान का संकट

पिछले दस साल के आंकड़ों में एक भी साल भविष्यवाणी सटीक नहीं बैठी। इसलिए मौसम विभाग के अनुमान भी भरोसे के लायक नहीं होते। यदि किसान इन भविष्यवाणियों के आधार पर फसल बोए, तो उसे नाकों चने चबाने पड़ जाएंगे। चूंकि कृषि वैज्ञानिक भी मौसम संबंधी भविष्यवाणी के आधार पर किसानों को फसल उगाने की सलाह देते हैं, लिहाजा उनकी सलाह भी किसान की उम्मीद पर पानी फेरने वाली ही साबित होती है।

स्काईमेट छह साल पहले से मानसून की भविष्यवाणियां कर रहा है। लेकिन सही साबित नहीं होने के कारण वह जनता के बीच भरोसा पैदा नहीं कर पाया है।

मौसम की भविष्यवाणी करने वाली एजेंसी स्काईमेट का बारिश का पूर्वानुमान सही निकलता है तो इस बार देश में अपेक्षाकृत कम बारिश होगी। सामान्य से कम बारिश होने का कारण जून से सितंबर के दौरान प्रशांत महासागर में अलनीनो का बनना है। नतीजतन, लंबी अवधि के औसत (एलपीए) के मुकाबले में मानसून नब्बे से पनचानवे फीसद रहने का अनुमान है। इन महीनों में औसत तिरानबे फीसद बारिश होगी, जबकि मई से जुलाई के बीच अलनीनो का छियासठ फीसद प्रभाव रहेगा, जो कम बारिश का कारण बनेगा। एलपीए वर्ष 1951 और 2000 के बीच की बारिश का औसत है, जो नवासी सेंटीमीटर है। साफ है, यह किसान और अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी खबर नहीं है। इससे इस साल सूखे की आशंका बन सकती है। जून से सितंबर तक दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में सक्रिय रहने वाले मानसून पर आई यह पहली भविष्यवाणी है। इस भविष्यवाणी को करते हुए स्काईमेट ने दावा किया है कि यह उसकी दूसरी भविष्यवाणी है, जबकि हकीकत यह है कि स्काईमेट छह साल पहले से मानसून की भविष्यवाणियां कर रहा है। लेकिन सही साबित नहीं होने के कारण वह जनता के बीच भरोसा पैदा नहीं कर पाया है।

हर साल अप्रैल-मई में मानसून आ जाने की अटकलों का दौर शुरू हो जाता है। यदि औसत मानसून आए तो देश में हरियाली और समृद्धि की संभावना बढ़ती है और औसत से कम आए तो अकाल की परछाइयां देखने में आती हैं। मौसम मापक यंत्रों की गणना के अनुसार यदि नब्बे फीसद से कम बारिश होती है तो उसे कमजोर मानसून कहा जाता है। छियानबे से एक सौ चार फीसद बारिश को सामान्य मानसून कहा जाता है। यदि बारिश एक सौ चार से एक सौ दस फीसद होती है तो इसे सामान्य से अच्छा मानसून कहा जाता है। इससे ज्यादा बारिश अधिकतम मानसून कहलाती है। भारतीय मौसम विभाग की भविष्यवाणियां अक्सर गलत साबित होती हैं, इसलिए स्काईमेट के अनुमान सटीक बैठेंगे यह कहना भी मुश्किल है। पिछले साल मौसम विभाग और स्काईमेट ने अच्छी बारिश की भविष्यवाणियां की थीं, लेकिन इसी के समांतर बादलों के छीजने की भविष्यवाणी करके यह आशंका भी जता दी थी कि वर्षा कम भी हो सकती है। नतीजतन, बारिश तो अच्छी हुई, लेकिन कुछ राज्यों में सिमट जाने के कारण बाढ़ और भूस्खलन का कारण भी बनी। केरल, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड अतिवृष्टि से बेहाल हुए। वहीं महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कर्नाटक में कम बारिश हुई। पिछले दस साल के आंकड़ों में एक भी साल भविष्यवाणी सटीक नहीं बैठी। इसलिए मौसम विभाग के अनुमान भी भरोसे के लायक नहीं होते। यदि किसान इन भविष्यवाणियों के आधार पर फसल बोए, तो उसे नाकों चने चबाने पड़ जाएंगे। चूंकि कृषि वैज्ञानिक भी मौसम संबंधी भविष्यवाणी के आधार पर किसानों को फसल उगाने की सलाह देते हैं, लिहाजा उनकी सलाह भी किसान की उम्मीद पर पानी फेरने वाली ही साबित होती हैं। देश में कुल खाद्य उत्पादन का लगभग चालीस फीसद इसी बरसात पर निर्भर है। इसी मानसून का कुल बारिश में अस्सी फीसद योगदान रहता है। हैरानी इस बात पर भी है कि मौसम संबंधी अनेक उपग्रह अंतरिक्ष में पिछले पांच साल के भीतर स्थापित किए गए हैं, इसके बावजूद शत-प्रतिशत भरोसे की भविष्यवाणी नहीं हो पा रही है।

आखिर हमारे मौसम वैज्ञानिकों के पूर्वानुमान आसन्न संकटों की क्यों सटीक जानकारी देने में खरे नहीं उतरते? क्या हमारे पास तकनीकी ज्ञान अथवा साधन कम हैं, अथवा हम उनके संकेत समझने में अक्षम हैं? मौसम वैज्ञानिकों की बात मानें तो जब उत्तर-पश्चिमी भारत में मई-जून तपते हैं और भीषण गर्मी पड़ती है तब कम दबाव का क्षेत्र बनता है। इस कम दबाव वाले क्षेत्र की ओर दक्षिणी गोलार्ध से भूमध्य रेखा के निकट से हवाएं दौड़ती हैं। इस तरह दक्षिणी गोलार्ध से आ रही दक्षिणी-पूर्वी हवाएं भूमध्य रेखा को पार करते ही पलट कर कम दबाव वाले क्षेत्र की ओर गतिमान हो जाती हैं। ये हवाएं भारत में प्रवेश करने के बाद हिमालय से टकरा कर दो हिस्सों में विभाजित होती हैं। इनमें से एक हिस्सा अरब सागर की ओर से केरल के तट में प्रवेश करता है और दूसरा बंगाल की खाड़ी की ओर से प्रवेश कर ओड़िशा, पश्चिम-बंगाल, बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर-प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और पंजाब तक बरसता है। अरब सागर से दक्षिण भारत में प्रवेश करने वाली हवाएं आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और राजस्थान में बरसती हैं। इन मानसूनी हवाओं पर भूमध्य और कैस्पियन सागर के ऊपर बहने वाली हवाओं के मिजाज का प्रभाव भी पड़ता है। प्रशांत महासागर के ऊपर प्रवाहमान हवाएं भी हमारे मानसून पर असर डालती हैं। वायुमंडल के इन क्षेत्रों में जब विपरीत परिस्थिति निर्मित होती हैं तो मानसून के रुख में परिवर्तन होता है और वह कम या ज्यादा बरसात के रूप में धरती पर गिरता है।

महासागरों की सतह पर प्रवाहित वायुमंडल की हरेक हलचल पर मौसम विज्ञानियों को इनके भिन्न-भिन्न ऊंचाइयों पर निर्मित तापमान और हवा के दबाव, गति और दिशा पर निगाह रखनी होती है। इसके लिए कंप्यूटरों, गुब्बारों, वायुयानों, समुद्री जहाजों और रडारों से लेकर उपग्रहों तक की सहायता ली जाती है। इनसे जो आंकड़े इकट्ठे होते हैं उनका विश्लेषण कर मौसम का पूर्वानुमान लगाया जाता है। भारत में मौसम विभाग की बुनियाद 1875 में रखी गई थी। आजादी के बाद से मौसम विभाग में आधुनिक संसाधनों का निरंतर विस्तार होता रहा है। विभाग के पास साढ़े पांच सौ भू-वेधशालाएं, तिरसठ गुब्बारा केंद्र, बत्तीस रेडियो पवन वेधशालाएं, ग्यारह तूफान संवेदी व आठ तूफान सचेतक रडार और आठ उपग्रह चित्र प्रेषण एवं ग्राही केंद्र हैं। इसके अलावा वर्षा दर्ज करने वाले पांच हजार पानी के भाप बन कर हवा होने पर निगाह रखने वाले केंद्र, दो सौ चौदह पेड़-पौधों की पत्तियों से होने वाले वाष्पीकरण को मापने वाले यंत्र, अड़तीस विकिरणमापी एवं अड़तालीस भूकंपमापी वेधशालाए हैं। लक्षद्वीप, केरल व बंगलुरु में चौदह मौसम केंद्रों के डेटा पर सतत निगरानी रखते हुए मौसम की भविष्यवाणियां की जाती हैं। अंतरिक्ष में छोड़े गए उपग्रहों से भी सीधे मौसम की जानकारियां सुपर कंप्यूटरों में दर्ज होती रहती हैं।

दुनिया के किसी अन्य देश में मौसम इतना विविध, दिलचस्प, हलचल भरा और प्रभावकारी नहीं है जितना कि भारत में है। इसका मुख्य कारण है भारतीय प्रायद्वीप की विलक्षण भौगोलिक स्थिति। हमारे यहां एक ओर अरब सागर है और दूसरी ओर बंगाल की खाड़ी। इन सबके ऊपर हिमालय के शिखर हैं। इस कारण देश की जलवायु विविधतापूर्ण होने के साथ प्राणियों के लिए बेहद हितकारी है। इसीलिए पूरी दुनिया के मौसम वैज्ञानिक भारतीय मौसम को परखने में अपनी बुद्धि लगाते रहते हैं। इतने अनूठे मौसम का प्रभाव देश की धरती पर क्या पड़ेगा, इसकी भविष्यवाणी करने में हमारे वैज्ञानिक अक्षम रहते हैं। इसका कारण यह माना जाता है कि आयातित सुपर कंप्यूटरों की भाषा ‘अलगोरिथम’ वैज्ञानिक ठीक से नहीं पढ़ पाते हैं। कंप्यूटर भले ही आयातित हों, लेकिन इनमें मानसून के डाटा के लिए जो भाषा हो, वह देशी होनी जरूरी है। हमें सफल भविष्यवाणी के लिए कंप्यूटर की देशी भाषा विकसित करनी होगी, क्योंकि अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिमालय भारत में हैं, न कि अमेरिका अथवा ब्रिटेन में। जब हम वर्षा के आधार स्रोत की भाषा पढ़ने व संकेत परखने में सक्षम हो जाएंगे तो मौसम की भविष्यवाणी भी सटीक बैठेगी। स्काईमेट के पास भी न तो भारतीय भौगोलिक स्थिति के अनुसार सॉफ्टवेयर हैं और न ही अपनी भाषा है। ऐसे में उसकी भी आयातित कंप्यूटरों पर निर्भर रहने की मजबूरी है।

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