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खाड़ी संकट का दायरा

मध्यपूर्व फिर संकट और अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। कतर का बहिष्कार हो या ईरान में आतंकी हमला, इससे खाड़ी संकट नए सिरे से गहराने लगा है।

Author June 14, 2017 05:38 am
फारस की खाड़ी में तेल उत्पादक इलाके के निकट लहराता ईरान का झंडा। (REUTERS/Raheb Homavandi/File Photo/25 July, 2005)

राहुल लाल

मध्यपूर्व फिर संकट और अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। कतर का बहिष्कार हो या ईरान में आतंकी हमला, इससे खाड़ी संकट नए सिरे से गहराने लगा है। कतर पर आरोप लगे हैं कि वह चरमपंथ फैलाने वाले इस्लामी संगठनों की मदद कर रहा है, हालांकि कतर ने इससे इनकार किया है। कतर में आवश्यक वस्तुओं की कमी हो रही है। वहां इस वक्त करीब साढ़े छह लाख भारतीय रह रहे हैं। ऐसे में इन लोगों के जीवन पर पाबंदी का असर पड़ना स्वाभाविक है। यह एक बड़े क्षेत्रीय टकराव की शुरुआत है। मध्यपूर्व की दो बड़ी ताकतें ईरान और सऊदी अरब हैं। इन दोनों के रिश्ते अत्यंत कटु हैं। इस संपूर्ण मामले में महाशक्तियां भी सक्रिय हैं। सऊदी अरब को जहां अमेरिकी समर्थन मिल रहा है, वहीं ईरान को रूस का, जिससे स्थिति और भी बिगड़ रही है। ईरान और सऊदी अरब के संबंध कितने खराब हैं? विकीलीक्स ने इसका खुलासा किया है कि सऊदी शाह अमेरिका पर दबाव बना रहे थे कि वह इजराइल से ईरान पर हमले करवाए। ईरान में सात साल बाद कोई आत्मघाती हमला हुआ है। सऊदी अरब के विदेशमंत्री ने ईरान को आतंकवादी हमले की धमकी पहले ही दे रखी थी। इसके पहले आइएस भी वीडियो जारी कर कुछ समय पहले ईरान को धमकी दे चुका था। ऐसे में इस आतंकी हमले के पीछे मूल कारण क्या है? क्या कतर संकट और इन आतंकवादी हमलों में कुछ संबंध है? इस संपूर्ण क्षेत्र में वर्चस्व की लड़ाई अब नाजुक दौर में पहुंच गई है। महाशक्तियों ने इस क्षेत्र में आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष के नाम पर शिया-सुन्नी तनाव को और बढ़ाया ही है। ट्रंप ने अपने घोषणापत्र में मुसलिम देशों से दूरी बनाने की बात कही थी, मगर अपनी पहली विदेश यात्रा में वे सऊदी अरब गए। वहां जाकर सऊदी अरब के धुर विरोधी ईरान पर जम कर भड़के।

पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ईरान के साथ तनाव घटाने की पहल की थी। जबकि ट्रंप शिया-सुन्नी विवाद का लाभ उठा कर तथा सऊदी अरब को ईरान का डर दिखा कर हथियार बेचने में लगे हैं। इसी कड़ी का अगला प्रतिफल सऊदी अरब समेत छह देशों द्वारा कतर से रिश्ते तोड़ने के रूप में भी सामने आया है। ट्रंप की पहली विदेश यात्रा का नतीजा यह रहा कि सऊदी अरब और उसके मित्र देश उत्साह में आ गए। यों तो सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में कई मुद््दों पर तीखे मतभेद हैं, लेकिन वे अचानक साथ हो गए। बहरीन, यमन और लीबिया ने भी कतर से अपने राजनयिक संबंध तोड़ लिए हैं। गौरतलब है कि वैश्विक स्तर पर सऊदी अरब भी वहाबियों को प्रोत्साहन देकर कट्टरता फैलाता रहा है। कट्टर वहाबी आतंकवाद को भी प्रोत्साहित करते हैं। इस पूरे क्षेत्र में आतंकवाद और दूसरे झमेलों को समझने के लिए शिया और सुन्नी टकराव को जानना जरूरी है, क्योंकि ईरान पर हुए आतंकवादी हमले की जिम्मेदारी आइएस ने ली है। साथ ही कतर विवाद भी शिया-सुन्नी संघर्ष का ही परिणाम है। अरब जगत के लिए ईरान और सऊदी अरब दोनों बेहद महत्त्वपूर्ण देश हैं। ईरान शियाबहुल है और सऊदी अरब सुन्नी बहुल। दोनों इस्लाम के इन पंथों के रखवाले के रूप में विश्व में अपने आप को प्रस्तुत करते हैं। सुन्नी उन सभी पैगंबरों को मानते हैं जिनका वर्णन कुरान में है। दूसरी ओर शियाओं का दावा है कि मुसलिमों के नेतृत्व का अधिकार शियत अली और उनके वंशजों का ही है। विश्व में कुल मुसलिम आबादी का पचासी फीसद सुन्नी हैं और पंद्रह फीसद शिया। ईरान, इराक, बहरीन, अजरबैजान, यमन में शियाओं का बहुमत है। 1979 की ईरानी क्रांति से जब उग्र शिया इस्लामी एजेंडे की शुरुआत हुई तो इसे सुन्नी सरकारों ने खासकर खाड़ी के देशों ने एक चुनौती के रूप में देखा। ईरान के द्वारा सीमावर्तीशिया लड़ाकों को समर्थन देने के जवाब में खाड़ी देशों ने सुन्नी संगठनोंं को मजबूत किया।

एक तरफ जहां पाकिस्तान और अफगानिस्तान में तालिबान जैसे कट्टरपंथी सुन्नी संगठन अक्सर शियाओं के धार्मिक स्थानों को निशाना बनाते हैं, वहीं दूसरी ओर इराक और सीरिया में जारी संघर्ष ने दोनों समुदायों के बीच खाई और चौड़ी कर दी है। इराक भी शिया बहुल है, लेकिन उस पर सुन्नी सद्दाम हुसैन का लंबा शासन रहा। यहां भी 1980-88 के बीच ईरान-इराक लड़ाई के मूल में शिया-सुन्नी का विवाद छाया रहा। सद्दाम हुसैन की हुकूमत के खात्मे के बाद सऊदी अरब, शिया समर्थित सरकारों को प्रभावित करने के लिए सुन्नी आइएस आतंकवादियों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन करता रहा है।सऊदी अरब द्वारा प्रमुख शिया धर्मगुरु शेख अल निम्र को फांसी दिए जाने के कारण ईरान के साथ उसका तनाव पिछले तीन दशक में अपने सबसे खराब दौर में पहुंच गया है। 1987 के बाद ईरान समर्थित चरमपंथी समूह हिजबुल्लाह ने सऊदी राजघराने पर कई जानलेवा हमले किए और यहीं से दोनों देशों के बीच तनाव में बढ़ोतरी होती गई। खाड़ी में ईरान की तरफ से सबसे बड़ा खतरा उसका परमाणु कार्यक्रम नहीं बल्कि हिजबुल्लाह और यमन में हूती विद्रोहियों का समर्थन करना है। इस पूरे क्षेत्र में तनाव और आतंकवाद के पनपने का प्रमुख कारण वर्चस्व की वह लड़ाई है जो क्षेत्रीय सत्ताओं के बीच खतरनाक रूप लेती जा रही है। सीरिया सुन्नी बहुल देश है, जबकि शासक बशर अल असद शिया हैं। ईरान, सीरिया सरकार के सबसे बड़े समर्थकों में से एक है, जो रूस के साथ सीरिया के बचाव में लगा हुआ है। वहीं सऊदी अरब सीरिया सरकार को बर्खास्त करने की मांग करता रहता है।
अमेरिका भी सीरिया सरकार को हटाने में लगा है। सीरिया मामले पर अभी रूस और अमेरिका के बीच तनाव उच्चतम स्तर पर है। इस प्रकार सीरिया को लेकर महाशक्तियों के साथ संयुक्त अरब अमीरात और ईरान भी आमने-सामने हैं। यमन में भी हालात सीरिया से बेहतर नहीं हैं। संयुक्त अरब अमीरात राष्ट्रपति अब्दु राबु मंसूर हादी की मदद कर रहा है तो ईरान शिया विद्रोहियों के साथ है। बहरीन मामले में भी सऊदी अरब और ईरान आमने-सामने हैं। यहां भी शासक सुन्नी हैं और अधिकांश जनता शिया। इस कारण बहरीन में भी बहुमत शियाओं को ईरान का अबाधित समर्थन प्राप्त है। कतर के शासक स्वयं सुन्नी हैं। सऊदी अरब ने कतर के साथ राजनयिक संबंध तोड़ने का फैसला वहां के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी की विवादास्पद टिप्पणी के बाद लिया, जो कथित तौर पर ईरान के पक्ष में थी। यानी शिया ईरान के साथ सुन्नी कतर का दोस्ताना संबंध बनाना सऊदी अरब को काफी नागवार गुजरा।

इस तरह मध्यपूर्व में शिया-सुन्नी विवाद की राजनीति और महाशक्तियों के हस्तक्षेप ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है। पड़ोसी देशों में न केवल जबर्दस्त अविश्वास पैदा हुआ है बल्कि शिया-सुन्नी आधार पर चरमपंथियों को भी मदद दी जा रही है। भविष्य में ईरान समर्थित हिजबुल्लाह की गतिविधियां भी सामने आ सकती हैं। जबकि जरूरत है हर तरह के आतंकवाद को खत्म करने की। साथ ही महाशक्तियों से भी जिम्मेवारी भरे व्यवहार की अपेक्षा है। इसके लिए खाड़ी देशों का एकजुट होना न केवल उनके लिए जरूरी है, बल्कि विश्व की भलाई भी इसी में है।

 

 

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