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महंगे ईंधन की मार

पिछले साल महामारी के दौरान पेट्रोल पर तेरह रुपए और डीजल पर सोलह रुपए विशेष शुल्क लगाया गया था।

सांकेतिक फोटो।

सरोज कुमार

पिछले साल महामारी के दौरान पेट्रोल पर तेरह रुपए और डीजल पर सोलह रुपए विशेष शुल्क लगाया गया था। कम से कम इस शुल्क को ही सरकार वापस ले ले तो गरीबों पर बोझ कम हो सकता है, लेकिन फिलहाल ऐसा लगता नहीं है। तर्क यह कि गरीबों को मुफ्त राशन और मुफ्त टीकाकरण के लिए पैसों की जरूरत है।

एक पुराना मुहावरा है- पढ़े फारसी बेचे तेल..। लेकिन फारसी को ऊंचा और तेल को नीचा दिखाने वाला यह मुहावरा आज उलट गया है। तेल नया मुहावरा गढ़ रहा है। जमीन का तेल आसमान पहुंच चुका है और इसकी ऊंचाई का पता हर किसी को लग चुका है। नहीं लगा होगा तो जल्द लग जाएगा क्योंकि तेल का भाव हर दिन सब्र की नई सीमा पार कर रहा है। प्राकृतिक गैस भी पीछे नहीं है। दोनों साथ-साथ कदमताल कर रहे हैं। कुल मिलाकर सिर पर र्इंधन की आफत है और हमें अपने सब्र का इम्तेहान देना है।

र्इंधन का भाव ऊंचा होने के दो मुख्य कारण हैं। पहला अंतरराष्ट्रीय और दूसरा घरेलू। दोनों कारण समस्या के निवारण के लिए तैयार नहीं हैं। सरकार कहती है कि वह तेल उत्पादक देशों से कच्चे तेल के दाम घटाने और आपूर्ति बढ़ाने के लिए बात कर रही है। लेकिन वह स्वयं दाम घटाना नहीं चाहती। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत पिच्यासी अमेरिकी डालर प्रति बैरल पार कर गई है, जो साल भर पहले साढेÞ बयालीस डालर प्रति बैरल थी। यह 2018 के बाद कच्चे तेल का सर्वोच्च स्तर है।

महामारी के मंद पड़ने से दुनिया भर में आर्थिक गतिविधियां तेज हुई हैं और र्इंधन की मांग बढ़ी है। लेकिन तेल उत्पादक देशों ने मांग के अनुरूप उत्पादन बढ़ाने से इंकार कर दिया है। मध्य पूर्व के देशों ने प्रीमियम शुल्क हटाने के भारत सरकार के अनुरोध को भी अनसुना कर दिया। एशियाई देशों के लिए कच्चे तेल पर अलग से प्रीमियम शुल्क का प्रावधान है। परिणामस्वरूप एशियाई देशों को आपूर्ति होने वाला कच्चा तेल महंगा हो जाता है। सऊदी अरब हल्के कच्चे तेल की मानक कीमत पर अभी भारत से 1.30 डालर प्रीमियम वसूल रहा है। जबकि यूरोप के लिए उसने 2.4 डालर की छूट दे रखी है। ऐसे में निकट भविष्य में तेल के दामों में कमी की उम्मीद बेमानी है। अलबत्ता मांग बढ़ रही है तो कीमत ऊपर ही जाएगी।

तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक प्लस समूह की हाल की बैठक में सदस्य देशों ने अपना रुख दोहराया है कि वे नवंबर में कच्चे तेल की कुल आपूर्ति सिर्फ चार लाख बैरल प्रति दिन तक ही बढ़ाएंगे। शीर्ष तेल उत्पादक देशों सऊदी अरब, रूस, इराक, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत का उत्पादन नवंबर की वृद्धि के बाद भी सामान्य से चौदह फीसद कम रहेगा। जाहिर है, कीमतें हर हाल में ऊपर जानी हैं। दरअसल, तेल उत्पादक देश महामारी के दौरान हुए नुकसान की भरपाई ऊंची कीमत के जरिए करना चाहते हैं। वे यह भी देख लेना चाहते हैं कि तेल आयातक देश कितने पानी में हैं और ऊंची कीमत का बोझ वे कब तक ढो पाते हैं।

ठीक ऐसी ही परीक्षा भारत की सरकार भी अपने नागरिकों से ले रही है। हर रोज तेल की कीमतें बढ़ रही हैं और सरकार इस बात से खुश है कि पेट्रोल की खपत बढ़ गई। उसे कर न घटाने का एक बहाना मिल गया है। यानी जब तक खपत घटने न लगे, सरकार कर घटाने वाली नहीं है। पिछले साल महामारी के दौरान पेट्रोल पर तेरह रुपए और डीजल पर सोलह रुपए विशेष शुल्क लगाया गया था। कम से कम इस शुल्क को ही सरकार वापस ले ले तो गरीबों पर बोझ कम हो सकता है, लेकिन फिलहाल ऐसा लगता नहीं है। तर्क यह कि गरीबों को मुफ्त राशन और मुफ्त टीकाकरण के लिए पैसों की जरूरत है। और इस जरूरत के नाम पर आम जनता से तेल की कुल कीमत का आधे से अधिक हिस्सा कर के रूप में वसूला जा रहा है।

इस साल दूसरी लहर की भयावहता देख चुके लोग आवाजाही में सुरक्षित दूरी बनाए रखने के लिए निजी वाहनों का उपयोग अधिक कर रहे हैं। इससे पेट्रोल की खपत बढ़ गई है। पिछले महीने सितंबर में पेट्रोल की खपत साल भर पहले के मुकाबले नौ फीसद अधिक रही। पेट्रोल की खपत में वृद्धि लोगों की मजबूरी के कारण हुई है। इसी मजबूरी का लाभ सरकार उठा रही है और इसे अर्थव्यवस्था में सुधार का सबूत बता रही है। लेकिन अर्थव्यवस्था में सुधार का सबूत पेट्रोल की नहीं, डीजल की खपत से मिलता है। डीजल की खपत पिछले साल के मुकाबले साढ़े छह फीसद घटी है। देश में पेट्रोलियम उत्पादों की खपत में डीजल की हिस्सेदारी लगभग अड़तीस फीसद है। उद्योग और कृषि जैसे अर्थव्यवस्था के मुख्य क्षेत्रों में डीजल की ही जरूरत होती है। सरकार की सोच में यह तथ्य शायद शामिल नहीं है।

गैस की आफत भी तेल से कम नहीं है। रसोई में इस्तेमाल होने वाली गैस हो, या इंजन और टरबाइन चलाने के काम आने वाली गैस, सभी की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। इस साल पहली जनवरी से लेकर अब तक 14.2 किलोग्राम के रसोई गैस सिलिंडर की कीमत दो सौ रुपए से ज्यादा बढ़ चुकी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्राकृतिक गैस की कीमत में तीव्र उछाल के बाद सरकार ने घरेलू प्राकृतिक गैस की कीमत अक्तूबर के शुरू में बासठ फीसद बढ़ा दी। हालांकि 2019 के बाद प्राकृतिक गैस की कीमत पहली बार बढ़ी है, लेकिन वृद्धि का समय कहीं से सही नहीं है। हर तरफ हाहाकार है। आम उपभोक्ता की कमर पहले से टूटी पड़ी है। इस वृद्धि के बाद सीएनजी, पीएनजी के दामों में लगातार वृद्धि हो रही है। इससे बिजली उत्पादन, उर्वरक उत्पादन और माल ढुलाई की लागत बढ़ेगी, और इसका बोझा अंत में आम जनता पर ही पड़ेगा।

भारत अपनी जरूरत की लगभग 45.3 फीसद प्राकृतिक गैस आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्राकृतिक गैस की कीमत में तीव्र उछाल चल रहा है। वैश्विक तपन से निपटने के लिए दुनिया के देशों में बिजली बनाने के लिए कोयले के स्थान पर गैस के इस्तेमाल का चलन बढ़ा है। इस कारण गैस की मांग बढ़ी है। दूसरी ओर यूरोप में प्राकृतिक गैस का उत्पादन इधर कुछ वर्षों में काफी घटा है, क्योंकि कई देशों ने पर्यावरण संबंधी चिंताओं के कारण गैस क्षेत्र बंद कर दिए हैं। यूरोप का प्राकृतिक गैस उत्पादन जो 2005 में तीन सौ अरब घनमीटर था, वह 2021 में घट कर दो सौ अरब घनमीटर रह गया है। अब यूरोप गैस के लिए रूस पर निर्भर है।

प्राकृतिक गैस उत्पादक देशों पर आपूर्ति का दबाव बढ़ गया है। इस कारण गैस के दाम में भारी उछाल आया है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अगस्त के एक आंकड़े के अनुसार 2008 की मंदी के बाद से प्राकृतिक गैस की कीमत अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच चुकी है। आगे यह और ऊपर जाने वाली है। ब्लूमबर्ग की ताजा रपट में कहा गया है कि प्राकृतिक गैस की कीमत में जिस तेजी से बढ़ रही है, अमेरिका के कई उपभोक्ताओं को मजबूरन गैस छोड़ तेल की तरफ लौटना होगा। जबकि अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस उत्पादक है। ऐसे में भारत के लिए प्राकृतिक गैस की राह आगे कठिन होने वाली है। आम उपभोक्ताओं को पेट्रोल और डीजल के साथ एलपीजी, सीएनजी और पीएनजी की ऊंची कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना होगा। लेकिन इससे अर्थव्यवस्था का गणित गड़बड़ा सकता है।

अर्थव्यवस्था के बहुत बड़े हिस्से की खरीदी क्षमता जमीन पर आ जाएगी और समाज में असमानता बढ़ेगी। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के गवर्नर शक्तिकांत दास भी पेट्रोल-डीजल की ऊंची कीमत के संभावित खतरे से सरकार को आगाह कर चुके हैं। लेकिन सरकार आम उपभोक्ताओं को राहत देने की मनस्थिति में नहीं लगती है, परिस्थिति तो अपनी जगह है ही। जिन्हें कर चुकाने में हर रोज मरना है उनके लिए भला कैसी राहत!

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