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राजनीति: जोखिम झेलते प्रवासी मजदूर

पूर्णबंदी की घोषणा के समय ही प्रवासी कामगारों को उनके कार्यस्थल पर ही रोकने की पर्याप्त व्यवस्था की जानी चाहिए थी और सरकार को यह जिम्मेदारी नियोक्ता पर डालनी चाहिए थी। इसके एवज में सरकार इन प्रतिष्ठानों को मुआवजा देने का एलान करती। कारोबारी संस्थान संभावित हानि के खतरे से परे हट कर अपने श्रमिकों की देखभाल करते।

Author Published on: May 18, 2020 1:10 AM
कोरोना संकट, लॉकडाउन के दौरान साधन-सवारी न मिलने पर कई लोग यूं सपरिवार सामान लेकर गृह राज्यों को पैदल ही रवाना हुए हैं। (फोटोः पीटीआई)

शरद यादव
कोरोना संकट को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की चेतावनी के बावजूद भारत सरकार कोविड-19 से लड़ने के लिए तैयार नहीं थी, जबकि इस घातक विषाणु का प्रकोप दिसंबर 2019 में चीन, दक्षिण कोरिया, जापान, थाईलैंड और सिंगापुर में भी दिखने लगा था और ये देश इससे निपटने के लिए कमर कस चुके थे। भारत में पहला मामला 30 जनवरी, 2020 को केरल में आया था। इस राज्य को शाबाशी इसलिए दी जानी चाहिए कि अब तक वहां पर केवल पांच सौ बीस मामले आए हैं और सिर्फ तीन मौतें हुई हैं, जबकि पूरे देश में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा नब्बे हजार के आसपास पहुंच चुका है।

बहुत ही विलंब के बाद 24 मार्च, 2020 को प्रधानमंत्री ने बिना किसी पूर्व तैयारी के अचानक पूर्णबंदी की घोषणा कर दी। यहीं से भारत की कोरोना के खिलाफ जंग की शुरुआत हुई थी। इसके पहले, हवाई अड्डों पर जांच से लेकर एकांतवास जैसे तमाम इंतजाम आज की स्थितियों को देखते हुए कोरी कवायद ही साबित हुए।

पूर्णबंदी का सीधा प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था और विकास की गाड़ी का दूसरा पहिया माने जाने वाले कामगारों की जिंदगी पर पड़ा। पूर्णबंदी की घोषणा के समय ही प्रवासी कामगारों को उनके कार्यस्थल पर ही रोकने की पर्याप्त व्यवस्था की जानी चाहिए थी और सरकार को यह जिम्मेदारी नियोक्ता पर डालनी चाहिए थी। इसके एवज में सरकार इन प्रतिष्ठानों को मुआवजा देने का एलान करती। कारोबारी संस्थान संभावित हानि के खतरे से परे हट कर अपने श्रमिकों की देखभाल करते।

इससे मजदूर अपने घरों को पैदल ही लौटने के लिए मजबूर नहीं होते और भविष्य में स्थिति सामान्य होने पर उनका रोजगार सुरक्षित रहने की भी गारंटी रहती। मगर चूंकि सरकार के निर्णयों में भ्रम की स्थिति थी, इसलिए प्रवासी मजदूर अपने घरों को निकल लिए और पलायन का यह सिलसिला अभी तक नहीं थमा है। इसके गंभीर नतीजे आज हमारे सामने हैं। कई लोग रेल की पटरियों पर चल रहे हैं, क्योंकि सड़कों पर पुलिस का पहरा है और हजारों की संख्या में ट्रकों में लद कर जा रहे हैं। इनमें से कई सड़क हादसों के शिकार भी हो गए। ऐसी स्थिति एनडीए शासित राज्यों में ज्यादा देखने को मिली है।

निराश्रित गरीबों के संबंध में राज्य सरकारों को पूर्णबंदी के दौरान निर्धारित सुरक्षा बंदोबस्त के साथ रहने की व्यवस्था भी करनी चाहिए थी। इन सभी बातों का एलान पूर्णबंदी लागू करते वक्त ही हो जाता तो न इतना भ्रम फैलता और न ही अफरातफरी मचती। इसी प्रकार छात्रों को भी संबंधित राज्य सरकारों द्वारा बसों से घर भेजने की अनुमति केंद्र सरकार को पहले ही दे देनी चाहिए थी, जिससे कि बच्चों को इतने दिनों तक संक्रमण के खतरे के बीच नहीं रहना पड़ता।

ये सब घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि सरकार को स्थिति की गंभीरता का अंदाजा ही नहीं था। न ही सरकारी अमला यह अनुमान लगा पाया कि यह स्थिति कितने समय तक बरकरार रह सकती है। खैर, देर आए दुरुस्त आए कि सरकार ने विशेष ट्रेनें शुरू करने का फैसला लिया, मगर उसमें भी भ्रम की स्थिति रही कि कौन टिकट का पैसा देगा और इसकी वजह से हजारों मजदूर अपने छोटे बच्चों को लेकर पैदल, साइकिल या रिक्शे से निकल पड़े और रास्तों में जो उन सभी को देखना पड़ा, वह सारे देश ने देखा। सबसे दुख की बात तो यह कि हमारे देश की गरीबी और लाचारी को पूरी दुनिया ने देखा होगा। सवाल यह है कि अब इन श्रमिकों की वापसी कैसे होगी। ये हमारी अर्थव्यवस्था के इंजन हैं, इसलिए बिना इनके लौटे उद्योग-धंधे कैसे चलेंगे, यह गंभीर प्रश्न है।

अब बात कोरोना संकट के कारण पड़ने वाले आर्थिक प्रभावों की। यह जगजाहिर है कि देश की अर्थव्यवस्था अब लगभग ठप है। इसे फिर से शुरू करना, अब समय की मांग है। इसके लिए बेहतर होता कि भारत सरकार शुरू में ही यह घोषणा कर देती कि इस पूर्णबंदी के दौरान उद्योग-धंधों, कर्मचारियों और मजदूरों आदि को जो भी नुकसान होगा, उसकी भरपाई सरकार करेगी। कुछ समय के पश्चात स्थिति को समझते हुए आर्थिक पैकेज की घोषणा हो जाती।

इससे होता कि यह प्रवासी मजदूर अपने घरों को निकलते भी नहीं और जो अभी व्यापारी वर्ग चिंता में घर पर बैठा है और सोच रहा कि आगे कैसे काम चलेगा, वह भी उत्साहित रहता। देश में जो हालत चल रहे हैं उनका बयान शब्दों में किया नहीं जा सकता है। आज बड़े पैमाने पर बाजार में पैसा लगाने की जरूरत है। इसके लिए सबसे पहले प्रवासी श्रमिकों सहित सभी गरीब लोगों का पुनर्वास सुनिश्चित किया जाना जरूरी होगा।

आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी इस बात का उल्लेख किया है कि सरकार पैंसठ हजार करोड़ रुपए गरीब लोगों के कल्याण के लिए निकाल सकती है, जो हमारी दो सौ लाख करोड़ रुपए की जीडीपी वाली अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी रकम नहीं है।

अब आर्थिक पैकेज का एलान हो चुका है और वितमंत्री ने टुकड़ों में इसका ब्योरा दिया है। इस आर्थिक पैकेज के बारे में कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस बीस लाख करोड़ रुपए में से सरकार ग्यारह लाख करोड़ रुपए पहले ही घोषित कर चुकी है। घोषित हो चुका पहला पैकेज पंद्रह हजार करोड़ और दूसरा एक लाख सत्तर हजार करोड़ का था। इसके अलावा रिजर्व बैंक ने बाजार में तरलता बढ़ाने के लिए बैंकों को आठ लाख करोड़ पहले ही दे दिए थे।

म्युचुअल फंड उद्योग को संकट से उबारने के लिए भी केंद्रीय बैंक पचास हजार करोड़ का पैकेज पहले दे चुका है। निर्माण मजदूरों के लिए गठित कल्याण कोष और जिला योजना का कुछ हिस्सा इस पैकेज में पहले ही जोड़ा जा चुका है। बीस लाख करोड़ के पैकेज का मतलब जीडीपी का दस फीसद और देश के सालाना तीस लाख करोड़ रुपए के बजट का करीब पचहत्तर फीसद है। यदि इतना सरकार निकाल सकती है तो अर्थव्यवस्था को चलने में देर नहीं लगेगी।

मगर दुर्भाग्यपूर्ण ऐसा नहीं है जैसा कि कई विशेषज्ञ बता रहे हैं कि यह केवल जीडीपी का ढाई फीसद आखिर में दिखाई देगा। वितमंत्री को ऐसे पैकेज की घोषणा करनी चाहिए जो कि एक मजदूर को और एक साधारण व्यक्ति को भी समझ में आए कि उसको क्या मिलने वाला है। पैकेज में सीधा-सीधा यह बताना चाहिए कि जो पूर्णबंदी में कारोबारियों मतलब छोटी-बड़ी फैक्ट्री वाले, दुकानदार, शोरूम आदि कुछ भी कारोबार करने वाले जिनका अर्थव्यवस्था में योगदान होता है, किसानों, कर्मचारियों, मजदूरों आदि सभी वर्गों के बारे में अलग बताना चाहिए कि उनकी भरपाई किस तरह से की जा रही है।

अब पूर्णबंदी को सुरक्षा नियमों के साथ समाप्त करना चाहिए ताकि कुछ आर्थिक गतिविधियां फिर से शुरू हो सकें। सरकार को पूर्णबंदी को उठाने का विचार तीन मई को ही करना चाहिए था। पूर्णबंदी के चलते भी जिन शहरों में संक्रमण बढ़ना था, वह बढ़ ही गया है। समय की मांग है कि संक्रमित लोगों के परीक्षण का दायरा बढ़ा कर और सुरक्षित दूरी और बीमारी के इलाज के साथ पूर्णबंदी को जल्द से जल्द उठाया जाना चाहिए। इस बीमारी के लिए जब तक कोई दवा या टीका नहीं खोज लिया जाता तब तक हमें अपनी प्रतिरोधक क्षमता का ध्यान रखते हुए इसके साथ जीवन यापन करना पड़ेगा।
(लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री और लोकसभा व राज्यसभा सांसद रहे हैं।)

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