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राजनीति: कोरोना – तैयारी और यथार्थ

कोरोना संक्रमण जिस तरह का भयावह रूप धारण कर गया, उसके पीछे सरकारों की असफलता तो बड़ा कारण है ही, आमजन की लापरवाही ने भी इसे बढ़ाया है। इससे बचने का उपाय चिकित्सकीय से ज्यादा सामाजिक एवं व्यावहारिक वातावरण पर निर्भर करता है। इसलिए स्वैच्छिक संगठन लोगों को इस महामारी के खौफ से निकाल सकते हैं। लोगों को पर्याप्त और सही सूचनाएं, जानकारियां दी जानी जरूरी हैं।

Author Published on: March 22, 2020 10:41 PM
कोरोना वायरस से बचाव के लिए मास्क पहने हुए रेल यात्री। फोटो: PTI

खुशबू गुप्ता
कोरोना वायरस (कोविड19) आपदा संपूर्ण विश्व के लिए एक चुनौती बन कर उभरी है। इस संकट की भयावहता और इससे उत्पन्न चिंताओं को महसूस कर विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक टेड्रोस ने इसे वैश्विक महामारी घोषित किया। संक्रमण के घातक प्रकोप, भयावह स्थिति और सबसे निराशाजनक उसके प्रति चौंकाने वाली लोगों की अकर्मण्यता पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि ‘यदि सभी देश अपने नागरिकों की जांच, उपचार, पृथक्करण कर लोगों को जागरूक और सक्रिय करें तो वे इस वैश्विक महामारी का रुख मोड़ सकते हैं।’ विश्व के कई देशों ने कोरोना से निपटने के लिए कुछ बड़े और कठोर फैसले किए हैं, जिसमें नागरिकों की भूमिका अहम रही है। भारत विकास के लिए प्रयत्नशील देश है और हमारे लिए यह संकट सामान्य बात नहीं है।

इसमें कोई संशय नहीं कि बिना नागरिकों के सहयोग के इस महामारी का मुकाबला कर पाना मुश्किल है। इसलिए देश के सभी नागरिकों का यह कर्तव्य है कि केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से जारी सभी परामर्शों और दिशा-निर्देशों का पालन करें। कोरोना से बचाव के लिए सरकार की ओर से जो कदम उठाए जा रहे हैं, उन पर अमल कर सहयोग करें। यह कोरोना से निपटने में यह जन भागीदारी काफी महत्त्वपूर्ण साबित हो सकती है। जैसे वायरस को फैलने से रोकने के लिए सबसे जरूरी है कि भीड़ वाले स्थानों पर जाने से एकदम बचा जाए। लेकिन अभी यह देखने में आ रहा है कि लोग इस तरह के संकल्प और संयम को महत्त्व नहीं दे रहे। देश में कई मामले तो ऐसे सामने आए हैं जिनमें लोगों ने जरूरी जानकारियां छिपाईं और उनकी यह लापरवाही दूसरों के लिए संकट का बड़ा कारण बन गई।

कोरोना जैसी महामारी के संकट से निपटने में सामाजिक संगठनों की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण हो सकती है। समाज के समझदार जागरूकता लाने के काम में बड़ी मदद कर सकते हैं। इस महामारी के प्रकोप से सुरक्षित रहने का एकमात्र उपाय स्वच्छता है। सामाजिक संगठनों को इसे ‘व्यावहारिक परिवर्तन’ के कार्यक्रमों में शामिल कर इसके बारे में नियमित रूप से जागरूकता अभियान चलाना चाहिए। हालांकि भारत में स्वच्छता अभियान के लिए प्रयास कम नहीं हुए हैं, लेकिन साफ-सफाई के प्रति लोगों में आज भी सजगता का अभाव देखने को मिलता है और वह भी बड़े पैमाने पर। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इसकी आवश्यकता पर जोर दिया है। कोरोना संक्रमण जिस तरह का भयावह रूप धारण कर गया, उसके पीछे सरकारों की असफलता तो बड़ा कारण है ही, आमजन की लापरवाही ने भी इसे बढ़ाया है। इससे बचने का उपाय चिकित्सकीय से ज्यादा सामाजिक एवं व्यावहारिक वातावरण पर निर्भर करता है। इसलिए स्वैच्छिक संगठन लोगों को इस महामारी के खौफ से निकाल सकते हैं। लोगों को पर्याप्त और सही सूचनाएं, जानकारियां दी जानी जरूरी हैं।

स्वैच्छिक संगठनों की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि इस महामारी के प्रसार को रोकने के लिए लोगों की भागीदारी और उनको प्रेरित करने की सामर्थ्य कितनी ज्यादा है। इन संस्थाओं के द्वारा इस बीमारी से निपटने के लिए आर्थिक सहयोग प्रदान किया जाना, निर्धनों की मदद, उन्हें जागरूक करना, चिकित्सा राहत एवं सामान्य जन उपयोगिता के किसी अन्य उद्देश्य का उन्नयन किया जाना चाहिए। जब इतने व्यापक स्तर पर लोग महामारी से पीड़ित हों तो चिकित्सकीय प्रणाली पर पूर्ण निर्भरता असफल होती है। इसके लिए मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समर्थन की आवश्यकता उतनी ही महत्त्वपूर्ण हो जाती है जितनी कि चिकित्सकीय सेवा की। इस तरह के वास्तविक प्रयासों से पीड़ितों की सहायता करने के अलावा उनके बच्चों, परिवार और अन्य आश्रित लोगों की सहायता की जा सकती है जो एकाकीपन और सामाजिक भेदभाव के शिकार हो जाते हैं।

महामारी से के दुश्चक्र से निकलने में बचाव कार्यक्रम भी काफी अहम हैं। जॉन्स हॉपकिंस विश्वविद्यालय और न्यूक्लियर थ्रेट इनिशिएटिव द्वारा बनाई गई ग्लोबल हेल्थ सिक्युरिटी (जीएचएस) रिपोर्ट में यह बताया गया कि संपूर्ण विश्व में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा मौलिक रूप से बहुत कमजोर है। कोई भी देश वैश्विक महामारी से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है और सभी देशों में यह कोरोना वायरस महामारी गंभीर चुनौती के रूप में सामने आई है। भारत के संदर्भ में देखें तो केंद्र और राज्य सरकारों को इस संक्रमण से लड़ने के लिए ठोस और कारगर उपायों के बारे में सोचने की जरूरत है। समस्या अभी यह है कि कोरोना वायरस का कोई इलाज नहीं है और इसकी दवा या टीका कब तक तैयार होगा, यह भी कोई नहीं जानता। ऐसे में बचाव के उपाय ही कारगर हो सकते हैं।

महामारी के फैलाव को रोकने और इस पर काबू पाने के लिए लोगों के व्यवहार में परिवर्तन, उनको जागरूक तथा शिक्षित करने की आवश्यक है। जनभागीदारी और जनसर्थन से कई प्रभावी कदम भी केंद्र और राज्य सरकारें उठा रही हैं। इसके प्रमुख उपाय के रूप में सामाजिक दूरी का उपाय बहुत कारगर है। वायरस की प्रकृति और उसके फैलने के तरीकों का जो अध्ययन किया गया है, उससे यह सामने आया है कि दो लोगों के बीच कम से कम एक मीटर की दूरी जरूरी है। जिन लोगों को खांसी, जुकाम और बुखार जैसी शिकायतें हैं, उनमें इसके लक्षण होने की संभावना हो सकती है। इसलिए छींकते, खांसते समय सबसे ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत है,ताकि सामने वाले तक वायरस न पहुंच पाए। हालांकि प्रचार माध्यमों के जरिए इस बारे में लोगों को तरह-तरह से संदेश दिए गए हैं। लेकिन फिर भी समस्या तेजी से बढ़ रही है, जो बड़े खतरे की ओर इशारा करती है।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा राज्य सरकारों को निर्देश दिया गया है कि राज्यों को जो कानूनी शक्तियां दी गई हैं, चाहे वह महामारी एक्ट हो या आपदा प्रबंधन कानून हो, सीआरपीसी के तहत उनके द्वारा निर्णायक कदम सबकी सहमति से समाज को साथ लेकर उठाए जाएं। साथ ही साथ बाजारों के समय को नियंत्रित किया जाए, सार्वजनिक यातायात के संसाधनों में कमी की जाए। ये कुछ ऐसे जरूरी कदम हैं जो संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए जरूरी हैं और सबसे ज्यादा जरूरत इनका पालन सुनिश्चित कराना है। यह काम समाज, सरकार और अन्य सभी वर्गों के समर्थन से ही संभव है।

कोविड 19 के व्यापक प्रसार की स्थिति ने विश्व के सभी देशों को ऐसी प्राकृतिक आपदा को रोकने के लिए रणनीति तैयार करने, स्वास्थ्य और आपातकालीन बुनियादी ढांचे के निर्माण के बारे में सोचने के लिए बाध्य किया है। विश्व के ज्यादातर देशों को स्कैंडिनेवियाई देशों जिनमें डेनमार्क, नार्वे और स्वीडन प्रमुख हैं, की तर्ज पर सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को लागू करने की आवश्यकता है। इन सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में स्वास्थ्य, शिक्षा, बीमा, न्यूनतम मजदूरी सुरक्षा योजना, पेंशन, नागरिकों की जीवन प्रत्याशा आदि शामिल हैं। विश्व के शक्तिशाली देशों को हथियार और परमाणु शक्ति संपन्न बनने के बजाय सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर बल देना चाहिए, जिससे देश के नागरिकों का जीवन खुशहाल बनेगा।

बहरहाल अभी भारत की जो स्थिति दिखाई दे रही है, उससे साफ है कि कोरोना जैसी महामारी से लड़ने के लिए हमारे पास विकसित देशों की तरह संसाधन नहीं हैं। कोरोना की जांच में इस्तेमाल होने वाले किट की भारी कमी की वजह से ही संक्रमण ग्रस्त मरीजों का पता लगाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। दक्षिण कोरिया जैसा छोटा-सा देश लाखों लोगों की जांच कर चुका, जबकि भारत में इस तरह के सबसे जरूरी कदम का अभाव देखने को मिला। ऐसी सूरत में देश के नागरिकों से यह अपेक्षा की जाती है कि सभी देशवासी इस भयावह प्रकोप से बचने के लिए सरकार द्वारा उठाए जा रहे बचाव संबंधी कदमों और उपायों की उपेक्षा नहीं करेंगे। यही सबसे बड़ी जनभागीदारी है।

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