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राजनीति : तेल बाजार पर कब्जे की जंग

तेल और तेल बाजार पर कब्जे की जंग नई नहीं है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद एशियाई और लैटिन अमेरिकी देशों के तेल और गैस भंडार पर कब्जे के लिए अमेरिकी कंपनियों ने कई खेल खेले। ईरान में अगर राष्ट्रवादियों के विद्रोह को दबा अमेरिका ने अपने समर्थक शाह को बिठाया, तो सद्दाम हुसैन को अमेरिकी योजनाओं के अनुसार न चलने का सबक भी सिखाया। लैटिन अमेरिकी देश इक्वाडोर और वेनेजुएला अमेरिकी ऊर्जा कंपनियों के मुनाफे के खेल के शिकार हैं।

कोरोना वायरस के कहर से कच्चे तेल के दामों में आई गिरावट

दुनिया के ज्यादातर देशों को अपनी जद में ले चुकी महामारी कोरोना के प्रकोप से तेल बाजार भी बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। इसी वजह से प्रमुख तेल आयातक देशों दक्षिण कोरिया, जापान और चीन में तेल आयात में गिरावट दर्ज की गई है। मंदी के भय से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें अप्रत्याशित रूप से नीचे आ गई हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल तीस से पैंतीस डॉलर प्रति बैरल तक बिक रहा है। इसके बावजूद उत्पादन में कटौती को लेकर तेल उत्पादक देशों के बीच सहमति नहीं बन पाई है। हालात यहां तक पहुंच गए कि सऊदी अरब और रूस ने तेल उत्पादन बढ़ाने का फैसला किया है। रूस ने तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक के प्रस्ताव को नहीं माना। ओपेक तेल उत्पादन के कटौती करना चाहता था, लेकिन रूस ने कटौती से इंकार कर दिया।

इसका मतलब साफ है। रूस कोविड-19 यानी कोरोना की आड़ में अमेरिकी तेल कंपनियों और सऊदी अरब की तेल कंपनी अरामको को सबक सिखाना चाहता है। अमेरिकी तेल कंपनियों के वैश्विक तेल बाजार में विस्तार के प्रयासों से रूस खुश नहीं है। सऊदी अरब की सबसे बड़ी तेल कंपनी अरामको के विस्तार से भी रूस परेशान है। ओपेक चाहता था कि तेल उत्पादन में प्रतिदिन पंद्रह लाख बैरल तक की कटौती की जाए, जिसमें पांच लाख बैरल उत्पादन की कटौती गैर ओपेक देश करेंगे। जबकि रूस का तर्क था कि फिलहाल कोविड-19 के प्रभाव को देखने की जरूरत है। इसलिए तेल उत्पादन में कटौती का प्रस्ताव ठीक नहीं है। अब सऊदी अरब ने एक अप्रैल से एक करोड़ तेईस लाख बैरल प्रतिदिन तेल उत्पादन का फैसला किया है।

फिलहाल सऊदी अरब प्रतिदिन सनतानवे लाख बैरल तेल का उत्पादन करता है। रूस भी बीस से तीस लाख बैरल प्रतिदिन तेल उत्पादन बढ़ाने की योजना बना रहा है। लेकिन इससे दुखी अमेरिकी तेल कंपनियां हैं जिनके तेल को अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कम हुई कीमतों की चुनौती का सामना करना पड़ेगा। रूस और सऊदी अरब के तेल उत्पादन बढ़ाने के फैसले का प्रभाव दिखने लगा है। सऊदी अरब की तेल कंपनी अरामको के शेयर में गिरावट दर्ज की गई। दरअसल इस समय रूस प्रतिदिन एक करोड़ दस लाख बैरल तेल का उत्पादन करता है। चूंकि रूस कीखुद की तेल खपत प्रतिदिन लगभग छत्तीस लाख बैरल है, इसलिए सत्तर से अस्सी लाख बैरल तेल रूस अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिदिन बेच सकता है।

रूस, अमेरिका और सऊदी अरब तीन बड़े तेल उत्पादक देशों की नजर भारत और चीन जैसे बड़े तेल आयातक देशों पर है। इस कीमत युद्ध का लाभ भारत को मिलेगा। तेल की कीमतों में गिरावट से भारत का तेल आयात बिल घटेगा। 2018-19 में भारत का तेल आयात बिल एक सौ बारह अरब डालर था। तेल की गिरती कीमतों के बीच इस साल तेल आयात बिल एक सौ पांच अरब डालर के आसपास रह सकता है।
दरअसल भारतीय तेल बाजार में सऊदी अरब और रूसी कंपनियों के बीच जबर्दस्त जंग है। अमेरिकी दबाव में भारत ईरान से तेल आयात लगभग बंद कर चुका है। वेनेजुएला पर अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों के कारण भारत वेनजुएला से भी तेल आयात काफी कम कर चुका है। इन हालात में भारतीय तेल आयात में इस्लामिक देशों की हिस्सेदारी पैसठ से सत्तर फीसद तक पहुंच गई है। दूसरी तरफ रूस लगातार भारतीय तेल बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए कोशिशें कर रहा है। अमेरिकी तेल कंपनियां भी भारतीय बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने को आतुर हैं।

रूस द्वारा तेल उत्पादन में कटौती से मना करने के कई अर्थ निकाले जा रहे है। अगर तेल की कीमतें गिरेंगी तो सऊदी अरब के राजस्व पर इसका सीधा असर पड़ेगा। सऊदी अरब के बजट राजस्व में नब्बे फीसद हिस्सेदारी तेल की है। अगर तेल की कीमतें तीस से चालीस डालर प्रति बैरल के बीच लंबे समय तक बनी रह गर्इं तो इसका सीधा असर सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। सऊदी अरब का रक्षा क्षेत्र भी इससे प्रभावित होगा। सऊदी अरब अमेरिका से हर साल अरबों डॉलर के हथियार खरीदता है। रूस तेल की कीमतों में गिरावट कर सऊदी अरब पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाएगा, ताकि सऊदी अरब रूसी रक्षा उत्पादों को भी अपनी खरीद में जगह दे। दरअसल, रूस ने एक तीर से कई शिकार करने की कोशिश की है। तेल की कीमतें घटेंगी तो सऊदी अरब की अरामको और अमेरिकी तेल कंपनियों की बाजार विस्तार योजना पर असर पड़ेगा। जैसे सऊदी अरब की अरामको भारतीय बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रही है।

भारत में रिफाइनरी विस्तार योजना भी सऊदी अरब बना रहा है। भारतीय बाजार में रूसी कंपनी रोजनेफ्ट अरामको के विस्तार को चुनौती दे रही है। दूसरी ओर, चीन के ऊर्जा बाजार में रूस और ईरान की भागीदारी है। रूसी गैस और ईरानी तेल चीन के बाजार मे पहुंच रहे हैं। लेकिन २अमेरिका और सऊदी अरब की तेल कंपनियां रूस को एशियाई बाजार में चुनौती दे रही हैं। अरामको भारत में रिलांयस पेट्रोलियम की जामनगर रिफाइनरी में हिस्सेदारी खरीदेगी। साथ ही, सऊदी अरब इस रिफाइनरी में प्रतिदिन पांच लाख बैरल तेल आपूर्ति करने की योजना पर भी काम कर रहा है। अरामको की इस विस्तार योजना से रूस की ऊर्जा और तेल कंपनियां खुश नहीं है। बताया जा रहा है रूस ने काफी सोच-समझ कर तेल की कीमतों को गिराने का फैसला किया। तेल की कीमतों में गिरावट के साथ ही अरामको के शेयर नीचे आ गए, उसे लगभग तीन सौ अरब डॉलर का नुकसान हुआ। अरामको के आर्थिक नुकसान का सीधा असर अरामको के विस्तार योजना पर पड़ेगा। अरामको का रिलांयस पेट्रोलियम में हिस्सेदारी लेने की योजना टल सकती है।

हालांकि रूस की नजर अमेरिकी तेल और गैस कंपनियों पर भी है। इसका कारण यूरोपीय बाजार भी है। रूस की आर्थिक राष्ट्रवादी शक्तियां इस समय सरकार पर अमेरिका को सबक सिखाने का दबाव बना रही हैं। उनका कहना है कि रूसी ऊर्जा कंपनी गैजप्रोम और तेल कंपनी रोजनेफ्ट की कीमत पर अमेरिकी शेल तेल कंपनियों को लाभ पहुंचाने का कोई मतलब नहीं है। उनका तर्क है कि अमेरिकी तेल कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए अमेरिकी प्रशासन वेनेजुएला और ईरान के तेल उद्योग को भारी नुकसान पहुंचा चुका है। ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने के पीछे यह एक बड़ा कारण है। वेनेजुएला पर भी अमेरिकी प्रशासन ने आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं। यही नहीं, रूसी गैस को यूरोप में पहुंचने से रोकने का खेल भी अमेरिका खेल रहा है। रूस की नाराजगी इस बात को लेकर है कि रूस से यूरोप तक जाने वाली गैस को अमेरिका रोकने की पूरी कोशिश कर रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण रूस से जर्मनी तक गैस ले जाने वाली नौर्ड स्ट्रीम-2 गैस पाइप लाइन का काम पूरा नहीं हो पाया है। इस पाइप लाइन को बना रही यूरोपीय कंपनियां अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण पाइप लाइन बिछाने से पीछे हट गई हैं। अमेरिका यूरोपीय बाजार में अपनी गैस बेचना चाहता है, लेकिन यहां उसके लिए रूस बजड़ा रोड़ा है।

तेल और तेल बाजार पर कब्जे की जंग नई नहीं है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद एशियाई और लैटिन अमेरिकी देशों के तेल और गैस भंडार पर कब्जे के लिए अमेरिकी कंपनियों ने कई खेल खेले। ईरान में अगर राष्ट्रवादियों के विद्रोह को दबा अमेरिका ने अपने समर्थक शाह को बिठाया, तो सद्दाम हुसैन को अमेरिकी योजनाओं के अनुसार न चलने का सबक भी सिखाया। लैटिन अमेरिकी देश इक्वाडोर और वेनेजुएला अमेरिकी ऊर्जा कंपनियों के मुनाफे के खेल के शिकार हैं। यहां पर अपने हिसाब से अमेरिकी प्रशासन तख्ता पलट करवाता रहता है। लेकिन अमेरिकी आर्थिक विस्तारवाद को रूस ने लंबे समय तक चुनौती दी। अब इस खेल में चीन भी शामिल है। वैश्विक तेल बाजार में चीन भी निवेश के नाम पर घुसपैठ कर रहा है। यही अमेरिका और सऊदी अरब की बड़ी परेशानी है।

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