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दुनिया मेरे आगे: बातों का व्यापार

जब सबके घरों में टेलीफोन नहीं होते थे, तब लोग अपनी सुविधा के मुताबिक अपने किसी पड़ोसी का फोन नंबर अपने विजिटिंग कॉर्ड पर छपवा लेते थे।

Author September 20, 2018 3:38 AM
अब तो बातों का व्यापार ही एक बड़ा व्यापार हो गया है और मजेदार बात यह है कि इसके बावजूद सब आभासी दुनिया में संवाद कर रहे हैं।

अतुल कनक

जिस पीढ़ी के हाथ में कॉलेज जाने की उम्र के पहले ही दो-दो सिम वाला स्मार्टफोन आ जाता है, जिस पीढ़ी के पास अपने संवादों को प्रेषित करने के लिए वॉट्सऐप, ट्विटर, फेसबुक जैसी कई सोशल वेबसाइटें हैं, उस पीढ़ी को शायद यह भरोसा नहीं हो कि आज से कुछ दशक पहले तक लोगों को एक शहर से दूसरे शहर में टेलीफोन पर बात करने के लिए ट्रंक कॉल बुक कराना पड़ता था और उसके बाद घंटों तक डाकघर या तारघर में बैठ कर अपनी लाइन मिलने की प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। चूंकि तब एक ट्रंक कॉल के भुगतान में तीन मिनट की बातें होती थीं, तो इस अवधि के पूरी होने के बाद टेलीफोन ऑपरेटर पूछ लिया करता था कि आपकी कॉल के तीन मिनट पूरे हो चुके हैं, क्या आप अपनी बात आगे भी जारी रखना चाहते हैं!

यह वह दौर था, जब टेलीफोन घरों में होना इतनी सामान्य बात नहीं होती थी। मोबाइल फोन तो खैर होते ही नहीं थे। घरों में लैंडलाइन फोन का होना भी एक ‘स्टेटस सिंबल’ यानी रसूख का प्रतीक होता था। हालांकि टेलीफोन बुकिंग के लिए ज्यादा राशि जमा नहीं करानी पड़ती थी, लेकिन एक बार अपने घर पर टेलीफोन की स्थापना का आवेदन करने के बाद बरसों तक अपनी बारी की प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। पत्रकारों, विधायकों, सांसदों, डॉक्टरों और सरकारी अफसरों को वीआइपी श्रेणी की प्राथमिकता मिलती थी और उनके घरों पर टेलीफोन जल्दी लग जाते थे। कुछ चतुर सुजान एक से अधिक टेलीफोन बुक करवा लेते थे और फिर अपने कनेक्शन को ज्यादा पैसे वसूल कर गलत तरीके से बेच देते थे। वैसे ही जैसे कभी गैस के कनेक्शन या एक विशेष ब्रांड के स्कूटर या आवासन मंडल के किस्तों वाले मकानों की बुकिंग भी ज्यादा कीमत वसूल कर भ्रष्ट तरीके से बिकती थी।

जब सबके घरों में टेलीफोन नहीं होते थे, तब लोग अपनी सुविधा के मुताबिक अपने किसी पड़ोसी का फोन नंबर अपने विजिटिंग कॉर्ड पर छपवा लेते थे। इन नंबरों को ‘पीपी नंबर’ कहा जाता था। जब देश में एसटीडी सेवाएं शुरू हुर्इं तो पहले इस पीपी नंबर पर उस व्यक्ति को बुलाया जाता था, जिससे बातें करनी होती थीं और कुछ देर बाद उस व्यक्ति से बात करने के लिए फोन मिलाया जाता था। उन दिनों जिस व्यक्ति के घर में फोन होता था, मोहल्ले में उसकी ठसक अलग ही होती थी। जब देश में एसटीडी-पीसीओ के बूथ यानी दुकानें खुल गर्इं तो आम लोगों को कुछ राहत मिली। यह वह दौर था, जब ट्रंककॉल बुक कराने की विवशता खत्म हो चुकी थी। एक शहर से दूसरे शहर में कुछ खास कोड डायल करके सीधे बातें की जा सकती थीं। चूंकि रात नौ बजे के बाद कॉल की दर आधी हो जाती थी तो पीसीओ पर रात नौ बजे के आसपास बात करने के उत्सुक लोगों की भीड़ जुट जाती थी। इसमें शामिल लोगों की व्यग्रता तब देखते ही बनती थी, जब कोई व्यक्ति लंबी बातें करने लगता था। पीसीओ पर काम करने वाले कर्मचारियों की ठसक किसी बैंक मैनेजर से कम नहीं होती थी, क्योंकि वह जिसे चाहता था, उसे पहले बात करवा देता था। अपना नंबर जल्दी लगवाने के लिए लोग उसकी चिरौरियां किया करते थे।

फिर आया मोबाइल का जमाना। 1990 के दशक के उत्तरार्ध में इसके शुरुआती दौर में मोबाइल पर इनकमिंग यानी आने वाले कॉल के लिए भी प्रति मिनट करीब आठ रुपए का भुगतान करना होता था। तब लोग ‘मिस कॉल’ यानी मोबाइल पर घंटी बजा कर बंद कर देते थे और कूट संदेश दिया करते थे। फिर मोबाइल में इनकमिंग मुफ्त हुई और फिर स्मार्ट मोबाइल पर मिली इंटरनेट की सुविधा ने तो संचार की दुनिया ही बदल दी। रही-सही कसर पूरी कर दी आकर्षक प्रस्तावों के साथ मिल रहे मुफ्त के डाटा ने। यानी जितनी देर चाहें, बिना पैसे ज्यादा खर्च होने की फिक्र के बातें करें। पुराने जमाने में लोग अक्सर बातों का आमंत्रण देते हुए प्रश्न पूछ लेते थे कि क्या बातों के भी पैसे लगते हैं! लेकिन अब तो बातों का व्यापार ही एक बड़ा व्यापार हो गया है और मजेदार बात यह है कि इसके बावजूद सब आभासी दुनिया में संवाद कर रहे हैं। किसी को परस्पर बातचीत करने का समय नहीं है।

शायद यही कारण है कि अब बातों के पैसे भले ही लग रहे हों, लेकिन बातों का वास्तविक मूल्य कमतर प्रतीत होता है। एक वह दौर था जब लोग अपनी बात रखने के लिए किसी भी हद से गुजर जाने को तैयार रहा करते थे, एक यह दौर है जब जाने-माने लोगों को भी अपनी बात से पलटते देर नहीं लगती। अब इस बात पर क्या बात की जाए? शायर मजबूर की इस बात को याद करके दिल बहलाया जा सकता है- ‘बात होती है तो होती है कोई बात भी/ वरना बेबात तो कोई बात नहीं होती है।’

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