कुदरत से खिलवाड़ के नतीजे

प्रकृति का अधिकाधिक दोहन करने की हमारी नीतियों और मानसिकता ने समूची मानव जाति को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां हम सबको प्रकृति और मनुष्य की आत्मीयता के समीकरण पुन: प्रबल करने होंगे।

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सांकेतिक फोटो।

अतुल कनक

प्रकृति का अधिकाधिक दोहन करने की हमारी नीतियों और मानसिकता ने समूची मानव जाति को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां हम सबको प्रकृति और मनुष्य की आत्मीयता के समीकरण पुन: प्रबल करने होंगे। जलवायु परिवर्तन की मौजूदा दर बताती है कि दुनिया ने अगर अब भी होश नहीं संभाला, तो प्रकृति कहर बरपाने पर आमादा है।

जलवायु परिवर्तन को लेकर दुनिया भर में हलचल मची है। मानो प्रकृति अपने साथ किए गए दुर्व्यवहार से अकुलाने लगी है। जिन इलाकों में सूखे का लंबा इतिहास रहा है, उन इलाकों में बाढ़ के मंजर दिखाई देने लगे हैं और जिन इलाकों में कभी भारी बारिश हुआ करती थी, वे इलाके बारिश के लिए तरसते नजर आ रहे हैं। स्थिति का अनुमान रूस के याकुतस्क शहर से लगाया जा सकता है। याकुतस्क रूस के याकुतिया इलाके का एक चर्चित शहर है, जो बर्फ की सतह पर बनने वाला अकेला शहर माना जाता है। वहां अधिकतम तापमान कभी बीस डिग्री सेल्सियस रहा करता था। मगर इन गर्मियों में तापमान पैंतीस डिग्री सेल्सियस तक जा पहुंचा। किसी शहर के तापमान में एक साथ इतनी बढ़ोतरी बताती है कि कुदरत के मिजाज ठीक नहीं हैं।याकुतस्क ही क्यों, सारी दुनिया में सामान्य तापमान बढ़ रहा है। वैज्ञानिक भाषा में इसे ग्लोबल वार्मिंग या वैश्विक तापमान का बढ़ना कहा जाता है।

इसके खतरों से वैज्ञानिक और पर्यावरणविद लगातार आगाह कर रहे हैं। लेकिन कथित विकास की व्यग्रता में दुनिया उन तथ्यों को भी नजरअंदाज कर रही है जो समूची मानव सभ्यता के लिए किसी बड़े खतरे की प्रस्तावना का रेखांकन हो सकते हैं। बार-बार आने वाले समुद्री तूफान, चक्रवात, हिमनदों का फटना, सतत भूस्खलन, कहीं भीषण गर्मी तो कहीं भीषण सर्दी, लगातार भूकम्प और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जंगलों का धधकना इस बात की ओर इंगित करते हैं कि जलवायु के आंगन में गहरी उथल-पुथल है और इसे मनुष्य यह सोच कर अनदेखा नहीं कर सकता कि किसी और के आंगन की आग से हमें क्या लेना-देना? जब दुनिया के किसी एक भी हिस्से में बड़ी पर्यावरणीय हलचल होती है तो वह समूचे मानव समुदाय के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए, क्योंकि यदि जंगल में किसी एक पेड़ में लगी आग को बाकी पेड़ यह सोच कर अनदेखा करेंगे कि उन्हें इससे क्या, तो सारा जंगल आग के आतप और आतंक से बहुत देर तक नहीं बच सकेगा।

विकास के नाम पर हमने जिस जीवन शैली को अपनाया है, उसके चलते वातावरण में लगातार विषैली गैसों का उत्सर्जन हो रहा है। पराबैंगनी किरणों को हम तक पहुंचने से रोकने वाली ओजोन परत कमजोर पड़ने की चिंता जानकारों को लगातार परेशान कर रही है। दूसरी तरफ पर्यावरण में एअरोसाल की बढ़ती हुई मात्रा पृथ्वी के जलचक्र पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है। एअरोसाल गैस के साथ ठोस कणों या बूंदों के मिश्रित होने की स्थिति को कहते हैं और इसकी अत्यधिक मात्रा के कारण मानसून का व्यवहार भी अनियमित हो गया है। मौसम विज्ञानियों की भविष्यवाणी है कि इस बार भारत में पंद्रह अक्तूबर तक मानसून सक्रिय रहेगा। विक्रमी संवत के अनुसार देखें तो यह आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि होगी। इस समय तक मानसून की सक्रियता यह आशंका पैदा करती है कि अचानक बहुत तेज सर्दी के दिन आएंगे। लोकमान्यताएं भी कहती हैं कि जब भी मानसून इस तरह का अनियमित व्यवहार करता है, तो जीवन को नई चुनौतियों का सामना करना होता है।

मानसून की दृष्टि से ही क्यों, इस साल गर्मी के मौसम में भी दुनिया के लिए जून और जुलाई के महीने काफी बदलाव वाले रहे हैं। मौसम ने इतने रिकार्ड तोड़े कि वैज्ञानिकों ने इस वर्ष के मौसम को ‘रिकार्ड तोड़ने वाला मौसम’ तक कह दिया। इसके पहले नासा की एक रिपोर्ट में सन 2020 को हालिया इतिहास का सबसे गर्म साल बताया गया था। उसके पहले भी अप्रैल 2017 में ‘क्लाइमेट सेंटर’ नाम के एक अंतरराष्ट्रीय संगठन ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि पिछले छह सौ अट्ठाईस महीनों में से कोई भी महीना उतना ठंडा नहीं रहा, जितना पूर्ववर्ती वर्ष में वह महीना रहा करता था। यानी छह सौ अट्ठाईस महीनों तक पृथ्वी के आसपास का तापमान लगातार बढ़ता रहा। यदि तापमान वृद्धि के हालात यही रहे तो सन 2050 तक पृथ्वी की सतह कितनी गर्म होगी, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। गौरतलब है कि फिनलैंड में जून,1961 के बाद जुलाई,2021 का महीना सबसे गर्म रहा।

इस देश के एक शहर कोवोला अंजाला में इकतीस दिन तक लगातार लू चली। इसी साल नौ जुलाई को कैलीफोर्निया की डेथ वैली में 54.4 डिग्री तापमान दर्ज किया गया, जबकि अपेक्षाकृत ठंडा समझे जाने वाले शहर लास वेगास में पारा सैंतालीस डिग्री के पार चला गया। उधर, ब्राजील के कुछ हिस्सों में वर्षा नहीं होने के कारण सूखा आपातकाल घोषित करना पड़ा। मौसम की मनमर्जी ने चीन और बांग्लादेश में जम कर बारिश कराई। जर्मनी में जुलाई में हुई बारिश ने सदियों के रिकार्ड तोड़ डाले। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के महासचिव पेटेरी तालस ने इस विश्वव्यापी मंजर को देख कर ही कहा था कि जलवायु परिवर्तन के विध्वंसक प्रभाव से अब दुनिया का कोई भी देश बचा हुआ नहीं दिखता।

बढ़ते वैश्विक तापमान पर सन 2018 में जारी एक रिपोर्ट में कहा गया था कि तापमान में वृद्धि के कारण पहले से ही मानव और प्राकृतिक प्रणाली में बड़ा बदलाव हो रहा है। इस बदलाव को हिमनदों की मौजूदा स्थिति से भी आंका जा सकता है। पिछले दिनों एक अध्ययन में सामने आया कि सन 2000 के बाद हर साल दो सौ सड़सठ अरब टन हिमनद गायब हुए हैं। हिमनदों का गायब होना वस्तुत: उनका पिघलना ही है। दुनिया भर में समुद्रों में पानी की जो बढ़ती मात्रा पर्यावरणविदों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है, उसमें इक्कीस फीसद से अधिक हिस्सा पिघलते हुए हिमनदों का ही है। आबादी के लिए, खासकर पहाड़ी इलाकों में हिमनदों का पिघलना एक नई परेशानी का कारण बनने लगा है।

इनके पिघलने से एक बड़ी-सी झील बन जाती है और जब वह झील फटती है तो इलाके में तबाही मचा देती है। हिमनदों के पिघलने का कारण भी धरती का तापमान बढ़ना ही है। हालत यह है कि दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत शृंखला माउंट एवरेस्ट लगातार गर्म हो रही है और इस गर्मी के कारण आसपास के हिमनद तेजी से पिघलने लगे हैं।

हम इसे ग्रीन हाउस प्रभाव कहें या वैश्विक गर्मी या कोई और नाम दें। सच तो यह है कि प्रकृति का अधिकाधिक दोहन करने की हमारी नीतियों और मानसिकता ने समूची मानव जाति को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां हम सबको प्रकृति और मनुष्य की आत्मीयता के समीकरण पुन: प्रबल करने होंगे। जलवायु परिवर्तन की मौजूदा दर बताती है कि दुनिया ने अगर अब भी होश नहीं संभाला, तो प्रकृति कहर बरपाने पर आमादा है। भारतीय संस्कृति ने शायद इसीलिए कभी देवताओं के रूप में तो कभी परंपराओं के तौर पर प्राकृतिक शक्तियों की सामर्थ्य को नमन किया जाता रहा है।

ज्यूरिख के मशहूर संगठन- इंस्टीट्यूट फार एटमोस्फियरिक एंड क्लाइमेट साइंस के वैज्ञानिक एरिक फिशर ने कुछ दिनों पहले मौसम के बदलते स्वभाव पर टिप्पणी करते हुए कहा था-‘वर्तमान में जलवायु ऐसा व्यवहार कर रही है, जैसा कोई एथलीट स्टेरायड सेवन के बाद करता है।’ इस विवेकहीन नशीली ताकत के बर्ताव का जिम्मेदार मनुष्य भी है। क्या यह सही समय नहीं है कि हम परिवेश और प्रकृति के प्रति अपने व्यवहार की समीक्षा करें और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के स्थान पर उन विकल्पों पर भी विचार करें जो समूची मानवता को क्षोभ, स्वार्थ और आशंकाओं से रहित एक सुखी जीवन का आश्वासन देते हैं?

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