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समान नागरिक संहिता की जरूरत किसे है

हमारे देश में समान नागरिक संहिता को एक जटिल तथा विवादास्पद मुद्दा बना दिया गया है। हाल में फिर से एक जनहित याचिका की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चली।

हमारे देश में समान नागरिक संहिता को एक जटिल तथा विवादास्पद मुद्दा बना दिया गया है। हाल में फिर से एक जनहित याचिका की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चली। इसके पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने एक और मामले की सुनवाई में सरकार से जवाब मांगा था, जो ईसाई कानून में तलाक के लिए अलग रहने की अवधि अन्य धर्मों की तुलना में अलग होने के संदर्भ में था। यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्वनी उपाध्याय ने दाखिल की है। इसमें कहा गया है कि समान नागरिक संहिता आधुनिक और प्रगतिशील राष्ट्र का प्रतीक है तथा इसे लागू करने का मतलब होगा कि देश धर्म-जाति आदि के आधार पर भेदभाव नहीं करता है। याचिका में बताया गया है कि देश में आर्थिक प्रगति जरूर हुई है लेकिन सामाजिक रूप से कोई तरक्की नहीं हुई है।

हालांकि सामाजिक रूप से देश को आधुनिक तथा प्रगतिशील बनाने के रास्ते में समान नागरिक संहिता का न होना ही कारण नहीं है, और जहां तक आर्थिक प्रगति की बात है, वह भी अमीर और गरीब के लिए एक जैसी नहीं है तथा इनके बीच की खाई चौड़ी और गहरी होती गई है। सभी नागरिकों के लिए समान अवसर उपलब्ध न होना प्रगति के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा है। लेकिन अगर अन्य मुद्दों को वहीं छोड़ दें और समान नागरिक संहिता की जरूरत की बात करें तो एक धर्मनिरपेक्ष गणतांत्रिक देश में प्रत्येक गण यानी व्यक्ति के लिए कानूनी व्यवस्थाएं समान होनी चाहिए। इस मुद््दे पर सभी सरकारें शिगूफे तो छोड़ती रहती हैं, लेकिन गंभीर नहीं हैं।

इस मसले पर समाज में भ्रम भी खड़ा हो जाता है कि समान नागरिक कानून का मतलब कहीं ऐसा तो नहीं है कि कोई अपने धार्मिक विश्वास या रीति-परंपरा के अनुरूप पारिवारिक क्रियाकलाप संपन्न नहीं करेगा! जबकि कानून अपनी पहल पर किसी मामले में दखल नहीं देता। किसी भी कानून का इस्तेमाल, जब व्यक्ति कानून की शरण में जाता है, तभी होता है और अदालत तथा कानून की जिम्मेदारी होती है कि वह बिना भेदभाव के फैसला सुनाए।

याद करें कि संविधान निर्माण के समय अनुच्छेद-44 के तहत कहा गया था कि ‘भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए राज्य एक समान नागरिक संहिता प्राप्त करने का प्रयास करेगा।’ लेकिन हकीकत सबके सामने है। इस संहिता का स्वरूप क्या हो, यह भी परिभाषित नहीं किया जा सका है। देश के शासकों ने अंग्रेजों द्वारा नागरिक कानूनों में किए- निजी एवं सार्वजनिक- बंटवारे को ही आगे बढ़ाया, जिसके तहत सार्वजनिक दायरे के लिए सख्त नियम बनाए, पर निजी दायरे के लिए अर्थात औरतों को प्रभावित करने वाले कानूनों को पर्सनल लॉ के मातहत समुदाय के नियंत्रण में छोड़ दिया। दिलचस्प बात यह है कि पितृसत्ता को धक्का लगना उनके हित में भी नहीं था, इसलिए उन्होंने इसे छेड़ना मुनासिब नहीं समझा। बहुत ही सीधा और खुला प्रश्न है कि संपत्ति के स्वामित्व में, उत्तराधिकार में, मजदूरी और नौकरी के हर्जाने में व्यक्तिगत क्या है? ये तो सार्वजनिक हित के प्रश्न हैं और इन पर इसी दृष्टि से विचार किया जाना चाहिए।

यह एक विचित्र सत्य है कि आजादी के बाद वास्तविक जनतंत्र के पक्षधरों द्वारा उठाई गई समान नागरिक संहिता की मांग बाद के दिनों में इस देश में हिंदुत्ववादी ताकतों के एजेंडे में समाहित हो गई जिसे हमेशा ही हिंदू कानूनों को अल्पसंख्यकों पर थोपने के रूप में पेश किया गया। फिर यह मसला सांप्रदायिकता के साथ ऐसा नत्थी हुआ कि वह हिंदुत्ववादियों का हथकंडा बन गया। दूसरी ओर, अल्पसंख्यक समुदायों के निहित स्वार्थों वाले नेता समान नागरिक संहिता के मसले को इस तरह पेश करते रहे हैं मानो इससे अल्पसंख्यकों के वजूद पर ही संकट आने वाला हो। इस तरह, दोनों तरफ से समान नागरिक संहिता के सवाल को न तो कभी सही नजरिए से देखा गया और न ही सही परिप्रेक्ष्य में रखा गया।

यह जानना भी जरूरी है कि एक दूसरे स्तर पर गैर-सांप्रदायिक लोगों ने भी औरतों की निजी जिंदगी से जुड़े इस मसले को भी राष्ट्रीय एकता-अखंडता की चाशनी में लपेट दिया। चर्चित शाहबानो मामले में उपरोक्त गरीब महिला ने आपराधिक दंड संहिता की धारा 125 के तहत गुजारा-भत्ता की मांग की। तब भी सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता को राष्ट्रीय अखंडता के उपकरण के तौर पर देखा।

खैर, समान नागरिक संहिता का मसला अगर महज समान नागरिक कानूनों से जुड़ा होता तो वह इतना संवेदनशील और विवादित न होता। चाहे-अनचाहे इसका लेना-देना महिलाओं के साथ जुड़ता है और जोड़ा भी गया है। इस नागरिक संहिता का क्षेत्र परिवार के अंदर से है, और परिवार के अंदर महिलाओं को समान नागरिक- जो इस संहिता को लागू करने की बात कर रहे हैं- वे भी नहीं समझते, और जो इसकी मुखालफत यह कह कर कर रहे हैं कि यह उनके निजी कानून में हस्तक्षेप है, वे भी नहीं समझते। उन सभी के लिए महिलाएं उनके परिवार की जागीर हैं। और वे समझते हैं कि ‘हमारी महिलाओं’ के लिए सुरक्षा तथा सहूलियत की मांग वे कर सकते हैं, मगर ऐसा कोई कानून बने जिसके चलते उनका ‘एकाधिकार’ जाता रहे, यह उन्हें कतई मंजूर नहीं है।

सभी जानते हैं कि समान नागरिक संहिता का मसला जिस तरह पेश हुआ और प्रचारित हुआ उसमें ही समस्या रही है और पूर्वाग्रह भी रहे हैं। अगर संविधान की निगाह में सभी बराबर हैं तो अलग से समानांतर कानून की जरूरत ही क्यों? तभी यह सवाल आता है कि अलग-अलग कानून हैं ही क्यों? कानून मान लें कि एक ही होता और लोग निजी जिंदगी में व्यवहार अपनी मर्जी से तय करते, जो परस्पर सहमति के आधार पर होता, तो सोचें क्या होता?

बहरहाल, समान नागरिक संहिता के मसले पर एक और दृष्टि से विचार करना जरूरी है। गौर करें कि हमारे संविधान में ही कुछ आधुनिक प्रावधान मौजूद हैं जिनको विस्तारित-प्रचारित करने और ठीक से लागू करने की जरूरत है। मसलन, विशेष विवाह अधिनियम, 1956 सभी धर्मों को मानने वाले अपना सकते हैं। इसमें दंपति में किसी को अपनी आस्था छोड़ने की जरूरत नहीं है। उसी प्रकार अगर दंपति एक ही धर्म के हैं तो भी उन्हें अपने धर्म की कसम खाने की जरूरत नहीं है, बल्कि वे समानता के आधार पर एक दूसरे को अपना जीवन साथी स्वीकार कर सकते हैं।

उदाहरण के तौर पर, कुछ समय पहले विधि आयोग ने सिफारिश की थी कि विशेष विवाह अधिनियम में संशोधन किया जाए तथा इसे ईसाई समुदाय पर भी लागू किया जाए ताकि ईसाई पुरुष-महिलाएं भी इसका लाभ उठा सकें। 1954 में पारित विशेष विवाह अधिनियम दो वयस्कों को यह अधिकार देता था कि किसी भी धर्म-विशेष के रीति-रिवाज से परे एक-दूसरे को नागरिक के रूप में स्वीकार करते हुए अत्यंत सरल ढंग से लोग अपने जीवन साथी का चयन कर सकें। अब तक इसमें हिंदू, मुसस्लिम, सिख और जैन शामिल रहे हैं।

अब जैसे-जैसे बहस आगे बढ़ी है, यह देखने में आ रहा है कि हिंदू विवाह अधिनियम भी समानता की श्रेणी में नहीं आता तथा कुछ रीति-रिवाजों को मान्यता देकर भ्रम की स्थिति पैदा की गई है। उस समय के हिसाब से हिंदू महिलाओं को वह राहत तथा हक अवश्य प्रदान करता था, लेकिन आधुनिकता की कसौटी पर, जिसमें व्यक्ति होने के नाते समान व्यवस्था दी गई है, वह खरा नहीं उतरता।

वर्ष 1995-96 में कई बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मिल कर एक ‘वर्किंग ग्रुप’ का गठन किया, जिसकी ओर से नागरिक संहिता का एक वैकल्पिक मसविदा पेश किया गया था। ‘इकोनॉमिक पोलिटिकल वीकली’ के अंकों में इसे लेकर एक बहस भी चली थी। इस मसविदे में औरत को एक व्यक्ति, एक नागरिक के तौर पर देखने के आग्रह के साथ समान कानून की वकालत की गई थी।

अब तो समान नागरिक संहिता नाम भी इतना विवादास्पद हो गया है कि इसे कोई और नाम दिया जाना चाहिए, जो इसकी मूल भावना को प्रतिबिंबित करे, जो सही मायने में एक मुक्तिदायी संहिता हो। मुक्ति रूढ़ियों से, गैर-बराबरी से, किसी भी धर्म को मानने की मजबूरी से। आस्थावान होना-न होना एक निहायत व्यक्तिगत मामला हो।

यदि स्त्रियों की तरफ से बात की जाए तो उन्हें किसी भी धर्म ने पुरुषों के साथ पूर्ण बराबरी का दर्जा नहीं दिया है। कहीं कम तो कहीं ज्यादा, अलग-अलग प्रकार की वर्जनाएं उनकेलिए सभी धर्मों ने खड़ी की हैं। विडंबना यही है कि इसके बावजूद वे रूढ़ियों और परंपराओं को मानने में हमेशा दो कदम आगे रहती हैं। फिर भी, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि स्त्री को सही मायने में एक मुक्तिदायी कानून की (जेंडर जस्ट लॉ) की जरूरत है जो उसे बराबर का नागरिक माने।

मोटे तौर पर हम कह सकते हैं कि इस कानून में परिवार, विवाह, संपत्ति तथा बुनियादी नागरिक अधिकार के मामलों में बराबरी हो। राज्य का कर्तव्य हो कि वह व्यक्ति के व्यक्तिगत अधिकार को सुनिश्चित करे तथा समुदाय के नाम पर उसका हनन न हो। आज मुक्तिकामी संहिता की मांग इस समझ पर आधारित होनी चाहिए कि एक लोकतांत्रिक गणराज्य के राजनीतिक सदस्य के रूप में हर व्यक्ति को अधिकार मिले और उसका यह अधिकार परिवार, समुदाय या अन्य सामूहिकताओं के मातहत न हो। अगर इस मांग के पक्ष में प्रभावी जनमत बनेगा, तो वह न सिर्फ महिला सशक्तीकरण की दृष्टि से, बल्कि देश की व्यापक सामाजिक प्रगति के लिहाज से भी एक बड़ा मुकाम होगा।

 

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