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राजनीति: सहिष्णुता और जयिष्णुता

चीन के लिए सहिष्णुता का मात्रात्मक पात्र अब डोकलाम के बाद गलवान में उत्प्लावित होने लगा है। अब भारत को विदेश नीति, कूटनीति, रणनीति और समरनीति में जयिष्णुता का संधान करना होगा, ताकि मां भारती के मुकुट के किरीट पर कोई वक्रदृष्टि का साहस न कर सके।

Author Published on: July 9, 2020 1:45 AM
China, India, PLAसीमा पर तैनात भारतीय और चीनी सेना। (फाइल फोटो-PTI)

राजकुमार भारद्वाज
चीन इंच-इंच भूमि हड़पने की विस्तारवादी सोच के वशीभूत होकर युद्धोन्मत्त हो चला है। वह गलवान घाटी में अपने चालीस से अधिक जवान गंवाने की लज्जाजनक पीड़ा से गुजरने के बाद भी आत्मचिंतन की ओर नहीं लौटा। चीन इस पर भी विचार नहीं कर पा रहा है कि विश्व के सभी देशों के लिए वह क्यों अछूत होता जा रहा है। पाकिस्तान और उत्तर कोरिया जैसे देशों को अपना मित्र बताने में वह किसी ग्लानि का अनुभव नहीं करता। चीन की मानसिकता के संदर्भ में यह आवश्यक हो चला है कि काल की तुला पर सहिष्णुता और जयिष्णुता का तुलन हो।

पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने मानव एकात्मवाद के दर्शन में सहिष्णुता और जयिष्णुता की मीमांसा करते हुए उनका मात्रात्मक वर्णन भी किया है। सहिष्णुता के अतिरेक के विषय में कहते हैं- सहिष्णुता का अर्थ हो गया है महत्त्वाकांक्षा से हीन दुनिया की हर जाति के सामने झुकते जाना और स्वत्व एवं जीवन को बिल्कुल धूल में मिला देना। सहिष्णुता अच्छा सिद्धांत है। इसके ऊपर इतना आग्रह हो गया है कि हम कोई भी व्यावहारिक चिंता नहीं कर रहे हैं। इसी तरह जयिष्णुता को जीवन का आवश्यक अंग मानते हुए वे कहते हैं, ह्ययदि यह कहा जाए कि जयिष्णुता अधिक आवश्यक है, तो अनुचित नहीं होगा। बिना जयिष्णुता की भावना के कोई समाज न तो जीवित रह सकता है और न वह अपने जीवन का विकास ही कर सकता है।

पंडित जी की देशना सुस्पष्ट है। इसे इस तरह समझें कि सहिष्णुता का सरलीकरण सहनशीलता है। यह जीवन में आवश्यक है। पृथक-पृथक भौगोलिक, जलवायु, वातावरण, परिस्थिति, काल-खंड, आवश्यकताओं, दायित्वों आदि कारकों के वशीभूत हो मानव का विकास हुआ। इसलिए मानव के विभिन्न समुच्चय और समुदायों का विकास क्रम अन्यान्यों से भिन्न प्रतीत होता है। इसी कारण उनके स्वभाव, आचार-विचार, व्यवहार, खान-पान, भाषा, वेशभूषा और परंपराएं भिन्न हो सकती हैं। एकाधिक बार तो यह अकल्पनीय सी लगती हैं। किंतु इसके लिए मानव विशेष उत्तरदायी नहीं है, वरन उनमें निहित कारक ही मूल हैं।

फिर मानव से मानव में एका, एकत्रीकरण, सामंजस्य और तादात्म्य कैसे बैठे? इसके समेकीकरण के लिए जो आवश्यक लसदार कुंदरू तत्व आवश्यक है, वह सहिष्णुता है। सहिष्णु से अभिमंत्रित हो मानव अपने से भिन्न समुदाय के मानव की आगवानी करता है, इस उद्घोषणा के साथ कि कई स्तरों पर भिन्नता के पश्चात भी सभी मानव प्राथमिक रूप से अखंड सत्ता और ब्रह्म तत्व के अंश और मनु एवं श्रद्धा की संतानें ही हैं। सहिष्णुता के केंद्र पर आकर भिन्न समुदाय के जन-गण नव तंत्र और वृहद समाज गढ़ते हैं।

भारत के श्रुति इतिहास के पंद्रह-बीस हजार वर्षों के कालखंड में सहिष्णुता के अनुपम उदाहरण मिलते हैं। भारत विश्व की विभिन्न संस्कृतियों के लोगों का अद्भुत संगम है। न भूतो न भविष्यति। यहां के सुदूर इतिहास में यूनानी, शक, कुषाण, हूण, अरब, मुगल, अंग्रेज ओर पुर्तगाली हमलावरों के तौर पर आए, कुछ चले गए और कुछ यहीं की संस्कृति में रच-बस गए। यह भारत की सहिष्णुता थी। भारत के राजा-रजवाड़ों ने आयावर्त क्षेत्र से बाहर कभी कदम नहीं रखा।

उन्होंने केवल अपनी धरती की रक्षार्थ संघर्ष किया। किंतु यूरेशिया, यूरोप, अमेरिका, अरब और अफ्रीका आदि खंडों का रक्तरंजित इतिहास बताता है कि वहां सहिष्णुता का स्पर्श भी नहीं था। वहां अल्प विवादों में भाई, भाई से घात करता था। रक्तपात की संस्कृति से थक कर यूरोप और अमेरिका ने लोकतांत्रिक प्रणाली का चयन किया और उसमें सहिष्णुता को एक स्थान दिया। निश्चय ही अब वे सहिष्णुता के मठाधीश बन बैठे हैं। किंतु भारत की रक्तवाहिकाओं में सहिष्णुता अपने स्वभाव में रचती-बसती है।

इस सहिष्णुता के कारण भारत ने पूरे विश्व को जहां आकर्षित किया, वहीं उसे भारी क्षति भी उठानी पड़ी। अति रूपेण वै सीता, चातिगर्वेण रावण:। अतिदानाद् बलिबर्द्धो, अति सर्वत्र वर्जयेत। अर्थात अत्यधिक सुंदरता के कारण सीता हरण हुआ। अत्यंत घमंड के कारण रावण का अंत हुआ। अत्यधिक दान देने के कारण राजा बाली को बंधन में बंधना पड़ा। अत: अति को सर्वत्र त्यागना चाहिए। इस भांति सहिष्णुता की मात्रा अधिक हो जाने के कारण जयिष्णुता का भाव गौण होता चला गया।

इसीलिए पंडित दीनदयाल जी जयिष्णुता को रेखांकित करते हुए अत्यावश्यक बताते हैं। कर्मयोगी प्रभु श्रीकृष्ण के इस पद्य को समझना होगा कि, ह्यन ही लक्ष्मी कुलक्रमज्जता, न ही भूषणों उल्लेखितोपि वा। खड्गेन आक्रम्य भुंजीत:, वीर भोग्या वसुंधरा।।ह्ण अर्थात श्री कृष्ण युद्धविमुख अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि न तो लक्ष्मी निश्चित कुल से क्रमानुसार और न ही आभूषणों पर उसके स्वामी का चित्र अंकित होता है। खड्ग व शक्ति के बल पर पुरुषार्थ करने वाले ही विजयी होकर रत्नों को धारण करने वाली धरती को भोगते हैं। अगर श्री कृष्ण और पंडित दीन दयाल जयिष्णुता का सुर छेड़ते हैं, तो इसका अर्थ उकसावा और लड़ाकू होना भी नहीं है।

जयिष्णुता क्या और जयिष्णु कौन। मानव यदि जयिष्णु न होता, तो वह राहुल सांकृत्यायन की ह्यवोल्गा से गंगाह्ण में उदरपूर्ति के लिए पशुवध न करता। मानव जयिष्णु था। इसलिए उसने पाषाणकालीन अस्त्र-शस्त्रों का विकास किया। किंतु परमात्मा ने सहिष्णुता मानव में अंतर्निहित कर दी थी। इसी के प्रतिफल स्वरूप सहिष्णु मानव ने विकल्प खोजे। उसने मांस से वनस्पति और खाद्यान्न तक की खोज, परख और उपज की। एक दुष्कर और अप्रिय स्थिति की काट के लिए संकल्पबद्ध हो उद्यम करना और कठिन व विलोम पर विजय के लिए आत्मोत्सर्ग तक करना ही जयिष्णुता है। हम यूं ही ह्यजय राम जी कीह्ण और श्री जनों की जय-जयकार नहीं करते। जयकार के गर्भ में जयिष्णुता का दर्शन पलता है। अकारण, बलात और हठ से युद्ध सन्निहत हो, तो युद्ध में प्रवृत्त होना ही श्रेष्ठ है। उससे विमुख होने या पलायन करने को सहिष्णुता का आवरण नहीं दिया जा सकता।

जो मानव मात्र आहार के लिए संघर्ष करता था, वह चांद तक जा पहुंचा है। साधन से साध्य तक की यात्रा के लिए मानक और आदर्श तय किए हैं। ऋषियों और मुनियों की तपश्चर्या उन मानकों और आदर्शों के कठिन उदाहरण हैं। इन उच्चादर्शों के कारण कई बार स्थिति इतनी विकट हो जाती है कि प्रतीत होता है कि जनकनंदिनी बिन ब्याही रह जाएंगी। जगद्जगदंबा जानकी का यही प्रण है कि वह वरण तो वीर का ही करेंगी, जिसमें पिनाकध्वंस की शक्ति और क्षमता होगी।

इतना कठिन संकल्प जयिष्णु ही कर सकता है। अन्यथा बिन ब्याही ही भली। व्यक्ति अगर जयिष्णु न होता तो पाइथोगोरस की प्रमेय कैसे सुलझती! आर्यभट्ट जैसे वैदिककालीन गणितज्ञ उलूक और जतुका की भांति रात्रिपर्यंत व्योम को निहारने की जयिष्णुता न दिखाते तो फिर कैसे तारामंडल का नामकरण और गणना होती! आज अरबों डालर खर्च करने वाले नासा और पच्चीस रुपए के पंञ्चाग की गणनाएं एक समान होतीं हैं। प्रत्येक कठिन परिस्थिति से संघर्ष करते हुए पवित्र उद्देश्यों, मानकों और आदर्शों के लिए जय और विजय की एकोवर्ण कामना से किया गया कार्य ही जयिष्णुता है।

भारतवासी चंगेज खां के कत्लेआम को भूले नहीं हैं। रक्तपात के लिए कुख्यात हूण संस्कृति की धरती चीन के लिए सहिष्णुता का मात्रात्मक पात्र अब डोकलाम के बाद गलवान में उत्प्लावित होने लगा है। अब भारत को विदेश नीति, कूटनीति, रणनीति और समरनीति में जयिष्णुता का संधान करना होगा, ताकि मां भारती के मुकुट के किरीट पर कोई वक्रदृष्टि का साहस न कर सके।

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