ताज़ा खबर
 

राजनीति: बालश्रम का दुश्चक्र

बालश्रम की भयावह स्थितियों से निपटने के लिए भारत में अनेक संगठन भी काम कर रहे हैं, उनके प्रयासों के अलावा अगर सरकारी स्तर पर सही कदम उठाए जाएं तो इसकी जल्द रोकथाम की जा सकती है। भारत में मध्याह्न भोजन और ब्राजील, कोलंबिया, जांबिया और मैक्सिको में नगद भुगतान जैसे कार्यक्रमों का बहुत लाभ हुआ है। इन्हें भी देश में लागू करने से बाल मजदूरी कम होगी।

crime against childrenबाल मजदूरी करने को मजबूर बच्‍चे। फाइल फोटो।

लालजी जायसवाल

बच्चे देश का भविष्य होते हैं। पर कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं, जिनका बचपन खेलने-कूदने या पढ़ाई-लिखाई के बजाय मजदूरी करते हुए बीतता है। आजाद भारत में आज भी एक करोड़ से ज्यादा बच्चे बाल मजदूरी करते हैं। हर घंटे दो बच्चों का बलात्कार होता है, चार बच्चे यौन शोषण का शिकार होते हैं। हर घंटे आठ बच्चे मानव तस्करी का शिकार हो जाते हैं। ऐसे बच्चों को चुरा कर बाल मजदूरी और बाल वेश्यावृत्ति आदि के लिए खरीदा-बेचा जाता है।

ये सरकारी आंकड़े हैं, असल संख्या इससे कहीं ज्यादा है। गौरतलब है कि कोविड-19 महामारी के चलते जहां आर्थिक स्तर पर होने वाले व्यापक नुकसान से काम की स्थिति में गिरावट आई है, वहीं घरेलू आय कम होने और स्कूलों के बंद होने से बालश्रम बढ़ने की आशंका भी बन गई है। कोरोना संक्रमण रोकने के लिए दुनिया के अनेक देशों ने पूर्णबंदी की थी, जो कहीं-कहीं अब भी चल रही है। इससे व्यापारिक गतिविधियां, कल-कारखाने पूरी तरह बंद रहे, जिससे करोड़ों लोगों को बेरोजगार होना पड़ा और उनके परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।

यूनिसेफ का अनुमान है कि इन परिस्थितियों के कारण दुनिया भर में बाल मजदूरी में बढ़ोतरी हो सकती है। गरीबी से त्रस्त परिवार बच्चों को खतरनाक औद्योगिक गतिविधयों में भी काम करने को भेज सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो भारी संख्या में बच्चों के बचपन पर घातक असर पड़ेगा। हाल ही में पश्चिम बंगाल राइट टू एजुकेशन फोरम और कैंपेन अगेन्स्ट चाइल्ड लेबर की ओर से किए गए सर्वेक्षण में पता चला है कि पूर्णबंदी के दौरान पश्चिम बंगाल में स्कूल जाने वाले बच्चों में बाल मजदूरी दर बढ़ी है।

गौरतलब है कि बच्चों से काम लेने वाले उन्हें इसलिए काम पर रखते हैं, क्योंकि बड़े लोगों की तुलना में उन्हें वेतन कम देना पड़ता है और उनसे ज्यादा देर तक काम लिया जाता है। आज गांवों की स्थिति ज्यादा खराब है। परिवारों को काम के लिए ज्यादा लोग चाहिए ताकि पैसे कमाए जा सकें। अगर हम सुधार के लिए तुरंत कदम नहीं उठाएंगे तो स्थिति और ज्यादा बुरी होगी।

पश्चिम बंगाल के उन्नीस जिलों में साढ़े इक्कीस सौ बच्चों को उक्त सर्वेक्षण में शामिल किया गया था, उनमें एक सौ तिहत्तर दिव्यांग भी शामिल थे। इन दिव्यांग बच्चों में से महज साढ़े सैंतीस प्रतिशत आॅनलाइन पढ़ाई में सक्षम हैं। पूर्णबंदी के दौरान बीमार पड़ने वाले ग्यारह प्रतिशत बच्चों को कोई चिकित्सीय सहायता भी नहीं मिल सकी। यों भारत के संविधान में मूल अधिकारों के अनुच्छेद चौबीस के अंतर्गत बालश्रम प्रतिबंधित है, लेकिन इसका एक प्रमुख कारण गरीब बच्चों के माता-पिता में लालच और असंतोष का होना है। माता-पिता अपनी सुविधा के लिए बच्चों से मजदूरी कराते हैं, जिससे बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं।

बालश्रम मे वृद्धि का दूसरा कारण सरकारी स्कूलों में पढाई का स्तर ठीक न होना भी है। भारतीय सरकारी स्कूल अध्यापकों की अनुपस्थिति के मामले में विश्व में युगांडा के बाद दूसरे नंबर पर हैं। सरकारी स्कूलों के पांचवी कक्षा के अधिकतर बच्चे तीसरी कक्षा की किताब नहीं पढ़ पाते। स्कूलों में कौशल विकास बिलकुल नहीं होता, केवल क्लर्क बनाने वाली रट्टामार पढ़ाई होती है। तो क्यों बच्चे स्कूल जाना चाहेंगे और क्यों अभिभावक उन्हें स्कूल भेजना चाहेंगे? नई शिक्षा नीति से इन समस्याओं का समाधान निकलेगा और शिक्षा व्यवस्था का चरित्र भी बदलेगा, लेकिन उसके लिए अभी प्रतीक्षा करनी होगी।

सर्वेक्षण के मुताबिक पूर्णबंदी के असर से हर राज्य में स्कूल जाने वाले बच्चों के बीच बाल मजदूरी में एक सौ पांच प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इस दौरान लड़कियों में बाल मजदूरों की संख्या एक सौ तेरह प्रतिशत बढ़ी है, जबकि लड़कों के बीच इस संख्या में पंचानबे प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसका परिणाम यह होगा कि और ज्यादा बच्चे अधिक मेहनत तथा शोषण वाले काम करने को मजबूर होंगे, लैंगिक असमानता और विकट हो जाएगी। हाल ही में ब्यूनस आयर्स में बालश्रम पर लगभग सौ देशों का सम्मेलन हुआ था, जिसमें यह चिंता जाहिर की गई थी कि अधिकांश सदस्य देश 2025 तक बाल श्रम को समाप्त करने के अपने लक्ष्य से पीछे ही रहेंगे।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने अनुमान लगाया है कि आज से सात वर्ष बाद भी लगभग एक अरब इक्कीस करोड़ बच्चे अलग-अलग कार्यों में संलग्न पाए जा सकते हैं। अब भी विश्व में पांच से सत्रह वर्ष के बीच के काम करने वाले बच्चों की संख्या एक अरब बावन करोड़ है। नेशनल लेबर इंस्टीट्यूट आॅफ इंडिया और यूनीसेफ द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि लखनऊ में कुल साढ़े तीस हजार बाल मजदूर हैं और कोरोना के कारण इनकी संख्या में इजाफा हुआ है। यही वजह है कि यह शहर बालश्रम के मामले में दूसरे नंबर पर पहुंच गया है। गौरतलब है कि 2012 से 2016 के बीच बालश्रम में मात्र एक प्रतिशत की कमी देखी गई है।

चिंताजनक बात यह है कि 2012 से 2016 तक बारह वर्ष तक के बच्चों को बालश्रम से मुक्ति दिलाने का कोई खास प्रयत्न नहीं हो सका था। इस अवधि में लड़कियों को ही लड़कों की तुलना में कुछ अधिक मुक्ति दिलाने में सफलता मिल पाई है। बालश्रम का एक प्रमुख कारण औपचारिक अर्थव्यवस्था में श्रम संबंधी निरीक्षकों की कमी होना भी है, जिसके फलस्वरूप लगभग इकहत्तर फीसद बच्चे आज भी कृषि कार्य में लगे हैं, जिनमें से उनहत्तर फीसद बच्चों को परिवार की इकाई में काम करने के कारण पारिश्रमिक नहीं दिया जाता है। आज भी भारत में प्रतिदिन लगभग साढ़े तिरालीस लाख बच्चे स्कूल के बजाय काम पर जाते हैं। कोरोना काल ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।

इससे बड़ी त्रासदी भला और क्या होगी कि देश में आज भी सत्रह करोड़ बाल श्रमिक और लगभग बीस करोड़ वयस्क बेरोजगार हैं। ये वयस्क कोई और नहीं, बल्कि बाल श्रमिकों के माता-पिता हैं। यह विरोधाभास बालश्रम के खत्म होने से ही समाप्त हो पाएगा। बच्चों के विरुद्ध हिंसा, सामूहिक कार्यों, राजनीतिक इच्छाशक्ति, पर्याप्त संसाधन और वंचित बच्चों के प्रति पर्याप्त सहानुभूति से बालश्रम समाप्त किया जा सकता है।

बाल मजदूरी की समस्या का समाधान तभी होगा, जब हर बच्चे को उसका अधिकार उपलब्ध होगा। इसके लिए जो बच्चे अपने अधिकारों से वंचित हैं, उनके अधिकार दिलाने के लिए समाज और देश को सामूहिक प्रयास करने होंगे। आज देश के प्रत्येक नागरिक को बाल मजदूरी का उन्मूलन करने की जरूरत है। देश के किसी भी हिस्से में कोई भी बच्चा श्रमिक दिखे, तो देश के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह बाल मजदूरी का विरोध करे।

वैसे, बालश्रम की भयावह स्थितियों से निपटने के लिए भारत में अनेक संगठन भी काम कर रहे हैं, उनके प्रयासों के अलावा अगर सरकारी स्तर पर सही कदम उठाए जाएं तो इसकी जल्द रोकथाम की जा सकती है। भारत में मध्याह्न भोजन और ब्राजील, कोलंबिया, जांबिया और मैक्सिको में नगद भुगतान जैसे कार्यक्रमों का बहुत लाभ हुआ है। इन्हें भी देश में लागू करने से बाल मजदूरी कम होगी।

मैक्सिको और सेनेगल जैसे देशों में शिक्षा के स्तर में सुधार से भी बाल मजदूरी कम हुई है। साथ ही, सरकारें गरीबों के बैंक खातों में नगद पैसा दें। भविष्य में उन्हें सस्ता और सुलभ कर्ज उपलब्ध कराएं ताकि वे साहूकारों के चंगुल में न फंसें और अपने बच्चों को बंधुआ मजदूरी और मानव तस्करी से बचा सकें।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।