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शार्ली एब्दो हमला: कातिल का धर्म

कहा जाता है कि कातिल का कोई धर्म नहीं होता- कातिल बस कातिल होता है। शार्ली एब्दो की घटना के बाद, जो हत्यारों के लिए मौत का जश्न थी, कहा जा सकता है कि कातिल का भी धर्म होता है। पेशावर में जब छोटे-छोटे बच्चों को भून दिया गया, तब कह सकते थे कि आतंकवाद […]

Author January 20, 2015 2:12 PM
शार्ली एब्दो की घटना के बाद, जो हत्यारों के लिए मौत का जश्न थी, कहा जा सकता है कि कातिल का भी धर्म होता है। (तस्वीर-रॉयटर्स)

कहा जाता है कि कातिल का कोई धर्म नहीं होता- कातिल बस कातिल होता है। शार्ली एब्दो की घटना के बाद, जो हत्यारों के लिए मौत का जश्न थी, कहा जा सकता है कि कातिल का भी धर्म होता है। पेशावर में जब छोटे-छोटे बच्चों को भून दिया गया, तब कह सकते थे कि आतंकवाद का नशा इतना गाढ़ा होता है कि अपना-पराया कुछ नहीं सूझता। पेशावर में मारने वालों का वही धर्म था, जो मरने वालों का। दोनों के बीच बंदूक का इकतरफा रिश्ता था। वे बच्चे सैनिक अधिकारियों के थे, जिनके अब सिर्फ नाम रह गए हैं स्कूल के रजिस्टरों में, और चूंकि सैनिक अधिकारियों से बदला लेना था, पर उन पर हाथ धरना कठिन था, इसलिए उनके बच्चों की जान लेकर संतोष कर लिया गया। प्राय: सभी विचारधाराओं की तरह आतंकवाद भी दुनिया भर को ‘हम’ और ‘वे’ में बांट कर देखता है और उसी के अनुसार हिंसा या अहिंसा का अपना कार्यक्रम बनाता है।

लेकिन शार्ली एब्दो के संपादक और कार्टूनकारों का कोई धर्म नहीं था। वे नास्तिकता के संदेशवाहक थे। वे किसी को न मुसलमान बना रहे थे, न ईसाई। वे मस्तमौला जीव थे और सभी धर्मों पर खुल कर हंसना चाहते थे, क्योंकि सभी धर्म मानव विकास के पांवों की जंजीरें हैं। जो धर्म तक ही फंसा रह गया, वह विज्ञान तक कभी पहुंच नहीं सकता। नतीजा यह होता है कि वह अपनी ही मान्यताओं की वस्तुपरक विवेचना नहीं कर पाता। आंख अपने आप को नहीं देख सकती। वह दूसरों की आंख जरूर देख सकती है।

थोड़ा और आगे बढ़ कर कहें तो जिनका कत्ल किया गया, उनका विरोध धर्म से नहीं था, धार्मिक प्रणालियों में निहित निर्बुद्धिता पर था और निर्बुद्धिता के अड््डे और भी अनेक हैं। हर आदमी को अपना कार्टूनिस्ट साथ लेकर निकलना चाहिए।

यह बहस जायज है कि व्यंग्य करना हमारा मानव अधिकार है या नहीं। मैं मानता हूं कि वह मानव अधिकार नहीं है। एक खास दायरे में, जैसे दोस्तों के बीच या परिवार में, खट््टा या मीठा व्यंग्य खूब चलता है, पर उसे सहने की शक्ति प्रेम से आती है। मैं इस मुहावरे से बिलकुल सहमत नहीं हूं कि प्रेम और युद्ध में सब कुछ जायज है। नाजायज तरीकों से पाई गई जीत भविष्य के युद्धों की जननी होती है और छल से पाया गया प्रेम रोज एक नई घृणा को जन्म देता है। क्रोध असहिष्णु होता है और प्रेम में सहनशीलता होती है। नफरत में भी शक्ति होती है, जिसकी गवाही फ्रांसीसी क्रांति और रूस की समाजवादी क्रांति देती है, पर अंतत: वह भी प्रेम की ही अभिव्यक्ति होती है। प्रेम के बिना नफरत जंगल की आग है।

लेकिन प्रेम की शिक्षा देते हुए भी सभी धर्म या विचारधाराएं तिरस्कार की कला में माहिर होती हैं। यूरोप का मध्य युग ऐसे ही संघर्षों का समय था। बल्कि ईसाइयत के जन्म से ही वैचारिक संघर्ष की शुरुआत हो गई थी। ईसा मसीह पहले (और अंतिम?) ईसाई थे। लेकिन ईसाई होने के पूर्व वे यहूदी थे। पुराने में से ही नया निकलता है।

ईसा के व्यक्तित्व के आकर्षण से दूसरे अनेक यहूदी अपना धर्म छोड़ कर उनकी शरण में आने लगे। इसके लिए यहूदियों ने ईसा को क्षमा नहीं किया और सूली पर चढ़ा दिया। ऐसी मौतें जीवन से भी ज्यादा ताकतवर होती हैं। यह यों ही नहीं है कि मृतक ईसा मसीह जीवित ईसा मसीह से ज्यादा खतरनाक निकले और आज ईसाइयत करोड़ों लोगों का धर्म है।

हिंसा के साथ यही होता है। वह जिसे समाप्त करना चाहती है, वह हजारों-हजार शक्लों में प्रगट होने लगता है। पत्रकारों की हत्या के पहले शार्ली की सीमित प्रतियां छपती होंगी। आज फ्रांस के हर आदमी के हाथ में उसका नया संस्करण है।

दुनिया में जहां कहीं ऐसा आदमी है, जो धार्मिक या अन्य अंधविश्वासों का शिकार नहीं है और विवेकपूर्ण समाज चाहता है, वह शार्ली है। आशा है, यह घटना दो-चार महीनों के बाद भुला नहीं दी जाएगी और शार्ली, शार्ली ही रहेंगे।

यह याद दिलाना जरूरी लगता है कि अकसर शार्ली, शार्ली नहीं रह पाते। जो ईसाइयत प्रेम और करुणा का धर्म है, वह जब कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट में बंटने लगा, तब कत्ल का एक नया आधार पैदा हुआ। सबसे ज्यादा गुनाह कैथोलिकों ने किया। अपने विरोधियों को जिंदा जला डालने से बड़ी निर्ममता और क्या हो सकती है? कौन कत्ल करेगा और किसका कत्ल किया जाएगा, यह उनके धर्म से तय होता था। जिसने प्रोटेस्टेंट मत का साथ दिया, उसे पोप का दुश्मन करार दिया गया। जो कैथोलिक रह गया, उसे पूरा विश्वास था कि स्वर्ग वही जाएगा।

क्या यह भी हैरत की बात नहीं है कि जिस इस्लाम ने बिखरी हुई अरब आबादी को ऐक्यबद्ध किया, उसे एक नया धर्म सौंपा, वह जब शिया और सुन्नी में विभाजित हुआ, तब दोनों एक दूसरे की आंख में कांटे की तरह खटकने लगे। भारत में ही नहीं, सभी देशों में साल में दो-तीन बार शिया-सुन्नी झड़प जरूर होती है। आज पश्चिम एशिया के सारे गृहयुद्ध पर इस विभाजन की छाया है।

भारत के बारे में कहा जाता है कि यहां के लोग बहुत उदार और सहिष्णु रहे हैं। यह वह झूठ है जो बार-बार दुहराने से सच लगने लगा है। बहुत-से लोग भारत में हिंदू-बौद्ध संघर्ष की बात करते हैं, अगर यह इतना बड़ा युद्ध था, जिससे बौद्ध समुदाय भारत से लगभग निर्मूल हो गया, तो उसकी कुछ तो स्मृति यहां के जन मानस में बची रहनी चाहिए थी। लेकिन जब देश की एक बहुत बड़ी आबादी को टट््टी धोने, मृत पशुओं की खाल छीलने, संपत्ति न रखने के लिए विवश कर दिया गया, तब वह क्या किसी युद्ध से कम था? जन्म के आधार पर एक शाश्वत विषमता पैदा कर देने जैसी शास्त्र-सम्मत क्रूरता दुनिया के और किस समाज में पाई जाती है?

युद्ध में पराजित लोगों के साथ कुछ भी किया जा सकता है, जैसा कि दोनों अमेरिकाओं, आस्ट्रेलिया और कनाडा में मूल निवासियों के कत्लेआम से जाहिर है। तब कातिल का धर्म ईसाइयत थी, जो मानती थी कि दास के शरीर में आत्मा नाम की कोई चीज नहीं होती और जिसे गायों, सूअरों आदि की तरह जला-भून कर नाश्ता किया जा सकता है। मजे की बात यह है कि दूर देशों की इस लूटपाट में कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट का फर्क मिट गया था। वे एक-दूसरे से नहीं जूझे, बल्कि दोनों ने मिल कर स्थानीय लोगों को गुलाम बनाया या उनकी जान ले ली। बुराई की एकता अच्छाई की एकता से ज्यादा मजबूत होती है।

मेरा विश्वास है कि जो अपने को ईश्वर का सिपाही मान लेता है, वह अपने राजा के साथ धोखा करता है। सभी धर्म मानते हैं कि ईश्वर सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान है। वे यह भी मानते हैं कि ईश्वर की कृपा हो तो ‘मूक होइ वाचाल, पंगु चढ़ई गिरिवर गहन।’ मानो कोई मूक या पंगु है तो यह उसका पाप है, जिसके प्रक्षालन के लिए उसे ईश्वर की शरण में जाना चाहिए। पोप मानते हैं कि कोई न कोई चमत्कार दिखाए बिना कोई व्यक्ति संत नहीं हो सकता। चमत्कार की परिभाषा है प्रकृति के नियमों को तोड़ कर दिखाना। संत ईश्वर के निकट होता है, इसीलिए उसमें ईश्वर द्वारा बनाए हुए नियमों को तोड़ने की क्षमता होती है। वह हवा में उड़ सकता है, पानी पर तैर सकता है। लेकिन यह कैसे संभव है कि दूसरों के लिए नियम बनाने वाला ईश्वर अपने को सभी नियमों से ऊपर मानता हो? अगर वह ऐसा करता है, तो अपनी ही सृष्टि के साथ मजाक करता है।

जो आदमी ईश्वर के सम्मान की रक्षा करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लेता है और मार-काट करता रहता है, वह जानता है कि ईश्वर अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकता। उसे ईश्वर की क्षमता में तनिक भी यकीन होता, तो दुष्कर्म करने वाले व्यक्ति से स्वयं नहीं निपटता, ईश्वर के जिम्मे छोड़ देता: ले प्रभु, अपने आलोचकों से तू ही निपट। पता नहीं तू दंडित करेगा या माफ कर देगा। मैं तेरी ओर से खून क्यों बहाऊं? दुष्कर्म करने वाले के बारे में तेरी जानकारी मुझसे कई गुना ज्यादा होगी। क्या पता दंड देने में मुझसे भूल हो जाए और मैं खुद दुष्कर्म कर बैठूं। इसलिए तेरे साथ अन्याय हुआ है, तो तू ही न्याय कर।

जो इस भाषा को नहीं जानता, उसे आस्तिक कहने में मुझे संकोच है। सच तो यह है कि वह अपने ईश्वर के साथ जुल्म करता है। कातिल दूसरे की हत्या करने के पहले अपने धर्म, अपनी आचरण संहिता और अपने विश्वासों का कत्ल करता है। यानी वास्तव में वह ईश्वर के अस्तित्व का तिरस्कार करता है। नहीं तो वह ईश्वर का काम अपने हाथ में क्यों ले लेता? चूंकि ईश्वर स्वयं हस्तक्षेप नहीं करता, इसलिए उसके नाम पर कुछ भी किया जा सकता है, क्योंकि ईश्वर के लिए जो कत्ल करता है और जिसका कत्ल किया जाता है, दोनों बराबर हैं। अदृश्य वस्तुएं कैसे-कैसे दृश्य पैदा कर देती हैं।

अब हम निष्कर्ष की ओर बढ़ने की कोशिश कर सकते हैं। मामला विचार का हो, तो कातिल का कोई धर्म नहीं होता। झूठे, लालची, बेईमान, विश्वासघाती और हत्यारे सभी धर्मों में पाए जाते हैं। आतंकवाद एक विचार या विचारधारा है, इसलिए आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। लेकिन आतंकवादी का धर्म होता है, जब मामला धर्म से संबंधित हो। धर्म के नाम पर कोई विचार, कोई आइडिया, कोई मांग आतंकवादियों को सभ्य लोगों से जुदा कर देती है। इसलिए धर्म से बहुत सावधान रहना चाहिए।

भारत में बहुत-से धर्म, मत, संप्रदाय आदि पैदा हुए, पनपे और लड़े-भिड़े। कई शताब्दियों के अंत:संघर्ष के बाद हमने समझा कि इन विवादों का कोई मतलब नहीं है। सबको अपने-अपने ढंग से जीने का अधिकार है। यह अधिकार अब दलितों को भी मिलना चाहिए, इस पर, कम से कम कागजी, सर्वसम्मति है। यूरोपीय सभ्यता ने भी बहुत-से गृहयुद्ध देखे हैं। अब वह युद्धों से ऊब गई है। इसीलिए दूसरे महायुद्ध के बाद गोरों की जमीन पर कोई युद्ध नहीं हुआ। लेकिन युद्ध का निर्यात करने की उसकी हविस अभी पूरी नहीं हुई है। सभी धर्म आधुनिकता से लड़ रहे हैं। यह एक हारती हुई लड़ाई है।

हारती हुई सेना के सदस्य दूसरों की मामूली-सी चुटकी भी बरदाश्त नहीं कर सकते। इसलिए उनसे मजाक करना एक तेज चाकू से खेलना है। इसलिए सबसे अच्छा यही है कि हिंदू अपने धर्म को सुधारे, मुसलमान अपने धर्म को और ईसाई अपने धर्म को। कत्ल तब भी होंगे, पर तर्क का वातावरण भी बनेगा।

 

राजकिशोर

 

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