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रक्षा क्षेत्र की बदलती तस्वीर

देश की आजादी के बाद कई क्षेत्रों में बड़े काम हुए, लेकिन रक्षा क्षेत्र एक तरह से उपेक्षित ही रहा।

रक्षा क्षेत्र की बदलती तस्वीर

नब्बे के दशक में जहां भारत हथियारों का पता लगाने वाली राडार प्रणाली हासिल करने के लिए अमेरिका और इजराइल के सामने हाथ फैलाने को मजबूर था, वहीं हाल में भारत ने यही राडार प्रणाली आर्मेनिया को बेच कर रक्षा बाजार में अपना झंडा गाढ़ा है।

हाल के वर्षों में रक्षा क्षेत्र में भारत आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ा है। महत्त्वपूर्ण यह कि आज भारत दूसरे देशों को अपने बनाए हथियार और रक्षा साजोसामान बेच भी रहा है। देश में हथियारों और मिसाइलों के निर्माण का काम भी तेजी से शुरू हो चुका है। ब्रह्मोस मिसाइल के अलावा आकाश वायु रक्षा प्रणाली और स्वदेशी जेट विमान तेजस की भी पूरी दुनिया में धूम मची है। बड़े-बड़े देशों ने तेजस को खरीदने में दिलचस्पी दिखाई है।

रक्षा उपकरणों का सबसे बड़ा आयातक अमेरिका भी पूरी तरह भारत में विकसित इस लड़ाकू विमान में रुचि ले रहा है। अमेरिका, आस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और फिलिपीन सहित छह देश तेजस की खरीद के लिए आगे आए हैं। मलेशिया तो पहले ही इस विमान को खरीदने के लिए प्रस्ताव रख चुका है। इसके तहत वह भारत से अठारह तेजस खरीदने का इच्छुक है। हिंदुस्तान एअरोनाटिक्स लिमिटेड द्वारा निर्मित तेजस एक इंजन वाला बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान है, जिसकी क्षमता अत्यधिक खतरे वाले माहौल में परिचालन की है।

देश की आजादी के बाद कई क्षेत्रों में बड़े काम हुए, लेकिन रक्षा क्षेत्र एक तरह से उपेक्षित ही रहा। इसका नतीजा यह हुआ कि दशकों तक भारत भारत रक्षा सामान और हथियारों के लिए दूसरे देशों पर ही निर्भर बना रहा। अगर इस ओर शुरू से ही ध्यान दिया जाता तो शायद 1962 में हम चीन से जंग में हारते नहीं। तब हमारे सैनिकों के पास लद्दाख जैसे ठंडे इलाके में लड़ने के लिए उपयुक्त सैन्य पोशाक और जूते तक नहीं थे।

लेकिन इसके बाद भी लंबे समय तक भारत रक्षा उपकरणों और छोटे-छोटे जरूरी सामान के लिए दूसरे देशों का ही मुंह ताकता रहा। कुछ साल पहले तक भी भारत रक्षा क्षेत्र में उपयोग होने वाले लगभग ज्यादातर उत्पाद, हथियार और उपकरण विदेशों से खरीदे जाते रहे। यही कारण रहा कि भारत पूरे विश्व में रक्षा उपकरणों का सबसे बड़ा आयातक देश बना रहा।

पर अब हालात बदल रहे हैं। आज दक्षिण पूर्व एशिया में भारत का दबदबा बढ़ रहा है। हथियार निर्यात से न केवल देश की आय बढी है, बल्कि फिलिपीन के बाद वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों ने भी भारत से हथियार खरीदने में दिलचस्पी दिखाई है। चीन दक्षिण चीन सागर से लेकर दक्षिण पूर्व एशिया तक विस्तारवादी नीति पर चल रहा है। इसलिए दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के लिए वह बड़ी चुनौती बन गया है।

जाहिर है, ऐसे में हर देश के लिए सैन्य ताकत बढ़ाना वक्त की जरूरत बनता जा रहा है और संयोग से यह अवसर भारत को मिल रहा है। ब्रह्मोस मिसाइल के अलावा भारत में विकसित वायु रक्षा प्रणाली की भी दुनिया के रक्षा बाजार में खासी धूम है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश भी हमसे ये हथियार प्रणालियां खरीदना चाह रहे हैं। अभी मोटे तौर पर करीब बयालीस देश भारत से रक्षा उपकरणों और हथियारों का आयात करते हैं। इन देशों में कतर, लेबनान, इराक, इक्वाडोर और जापान जैसे देश भी शामिल हैं।

भारत से निर्यात होने वाले रक्षा उपकरणों और हथियार प्रणालियों में प्रमुख रूप से युद्धक स्थितियों में शरीर की सुरक्षा करने वाले उपकरण शामिल हैं। वियतनाम, इंडोनेशिया और फिलिपीन के अलावा बहरीन, केन्या, सऊदी अरब, मिस्र, अल्जीरिया और संयुक्त अरब अमीरात ने भी आकाश मिसाइल को खरीदने में अपनी रुचि दिखाई है। कई अन्य देश तटीय निगरानी प्रणाली, राडार और एअर प्लेटफार्म खरीदना चाह रहे हैं।

सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और दक्षिण अफ्रीका भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने के लिए बात कर रहे हैं। ध्वनि की रफ्तार से तीन गुना तेज चलने वाली ब्रह्मोस मिसाइल भारत-रूस सैन्य सहयोग का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके निर्माण के लिए दोनों देशों के बीच 1998 में सहमति हुई थी। ब्रह्मोस मिसाइल का नाम ब्रह्मपुत्र और मस्क्वा नदियों के नामों को मिला कर रखा गया है।

आज भारत रक्षा उपकरणों के निर्यात के मामले में दुनिया के शीर्ष पच्चीस देशों की सूची में शामिल हो गया है। वर्ष 2019 में रक्षा उपकरणों के निर्यात के मामले में भारत का स्थान उन्नीसवां था। नब्बे के दशक में जहां भारत हथियारों का पता लगाने वाली राडार प्रणाली हासिल करने के लिए अमेरिका और इजराइल के सामने हाथ फैलाने को मजबूर था, वहीं हाल में भारत ने यही राडार प्रणाली आर्मेनिया को बेच कर रक्षा बाजार में अपना झंडा गाढ़ा है।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार भारत ने वित्त वर्ष 2017 में एक हजार पांच सौ इक्कीस करोड़ रुपए के रक्षा उपकरणों का निर्यात किया था, जो वित्त वर्ष 2018 में चार हजार छह सौ बयासी करोड़ रुपए का रहा और वित्तीय वर्ष 2019 में बढ़ कर दस हजार सात सौ पैंतालीस करोड़ रुपए के स्तर पर पहुंच गया था। कुल मिला कर पिछले सात वर्षों के दौरान भारत ने पचहत्तर से अधिक देशों को अड़तीस हजार करोड़ रुपए के रक्षा उपकरणों का निर्यात किया है।

नौसैनिक जहाजों का पूरी तरह से भारत में ही निर्माण भी एक बड़ी कामयाबी रही है। भारत की रक्षा उपकरण निर्माण कंपनियों ने सस्ती गश्ती नौकाएं बना कर दूसरे देशों को बेची हैं। इसी प्रकार हवाई रक्षा क्षेत्र में हिंदुस्तान एअरोनाटिक्स लिमिटेड ने प्रयोग के तौर पर उच्च स्तरीय हल्के हेलिकाप्टर का निर्माण भी सफलतापूर्वक किया है। अब तो सरकारी एवं निजी क्षेत्र में कई रक्षा उपकरण उत्पादक कंपनियां नए उत्पादों के साथ दुनिया के अन्य देशों से मुकाबला करने की स्थिति में आ रही हैं।

वित्तीय वर्ष 2022-23 के रक्षा बजट में यह व्यवस्था की गई है कि शोध एवं अनुसंधान पर खर्च की जाने वाली कुल राशि का पच्चीस प्रतिशत भाग निजी उद्योगों एवं नवाचारी उद्योगों को उपलब्ध कराया जाएगा। साथ ही, रक्षा सेवाओं के आधुनिकीकरण के लिए बारह प्रतिशत की वृद्धि के साथ 1.52 लाख करोड़ रुपए की राशि निर्धारित की गई है।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सरकार ने 2024-25 तक रक्षा निर्यात लक्ष्य 36,500 करोड़ रुपए तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। इस वक्त सरकार का जोर स्वदेशी हथियार निर्माण पर अधिक है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए केंद्र ने आर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड और इकतालीस आयुध निर्माण फैक्ट्रियों को मिला कर रक्षा क्षेत्र में सात सार्वजनिक उपक्रम (डीपीएसयू) बना दिए हैं।

इसका उद्देश्य प्रशासनिक चुस्ती के साथ कामकाज में पारदर्शिता और तेजी लाना है। बीते आठ वर्ष में भारत के रक्षा निर्यात में करीब छह गुना वृद्धि हुई है। फिलिपीन के साथ 2,770 करोड़ रुपए का रक्षा सौदा मील का पत्थर है। पिछले चार-पांच वर्षों में देश का रक्षा आयात लगभग इक्कीस फीसद कम हुआ है। दूसरी ओर, रक्षा निर्यात सात गुना बढ़ा है। भारत वैश्विक मंच पर जैसे-जैसे खुद को स्थापित कर रहा है, उसी के साथ चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। राष्ट्रीय रक्षा अब सीमाओं तक सीमित नहीं है, यह बहुत व्यापक है।

इसलिए हमें इन चुनौतियों से निपटना होगा। हमें उन ताकतों के प्रयासों को विफल करना होगा, जो भारत के हितों को नुकसान पहुंचाना चाहती हैं। और ऐसा तभी किया जा सकता है जब हम रक्षा-सुरक्षा में आत्मनिर्भर हों। रक्षा संबंधी जरूरतों का सामान अपने यहां बना सकें। अगर हथियार, रक्षा प्रणालियां और सैन्य साजोसामान के मामले में पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर बन जाता है तो दुनिया का कोई देश हमें दबाव में नहीं ले पाएगा।

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