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बदलता नजरिया, संवरती जिंदगी

महाराष्ट्र सरकार ने विधवाओं के लिए चली आ रही रूढ़िवादी परंपरा को समाप्त कर बीते दिनों एक प्रगतिशील कदम उठाया है।

सोनम लववंशी

इन बदलती परिस्थितियों के बीच भी अभी भारतीय समाज में तकरीबन सात करोड़ विधवाएं हैं। ये विधवाएं मथुरा, वृंदावन, काशी और बनारस जैसी जगहों में अपनी जिंदगी के बाकी दिन काटती देखी जा सकती हैं, जिनकी कोई पहचान नहीं होती। इसलिए राजनीतिक दल भी इन्हें अपना वोट बैंक नहीं मानते। इनके लिए कभी कोई व्यापक आंदोलन भी खड़ा नहीं होता।

महाराष्ट्र सरकार ने विधवाओं के लिए चली आ रही रूढ़िवादी परंपरा को समाप्त कर बीते दिनों एक प्रगतिशील कदम उठाया है। इक्कीसवीं सदी के भारत में जब मूल्यों और नैतिकता की बात हर क्षण होती हो, तब समाज में विधवा प्रथा को ढोने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। संविधान में महिला और पुरुष को समान अधिकार प्राप्त हैं, इसके बावजूद समाज में धार्मिक-सामाजिक प्रथाओं के नाम पर महिलाओं पर पाबंदी लगाने संबंधी अनेक कुरीतियां विद्यमान हैं।

अब इन्हें खत्म करने की जरूरत है। स्त्री मुक्ति और उनके अधिकारों के लिए लड़ाई राजा राममोहन राय ने उन्नीसवीं सदी में ही शुरू कर दी थी। मगर आज भी स्त्री उपेक्षिता आखिर क्यों है? इसी को ध्यान में रखते हुए अब महाराष्ट्र में विधवा महिलाओं को चूड़ी तोड़ने, माथे से सिंदूर पोंछने और मंगलसूत्र उतारने की प्रथा नहीं निभानी होगी। कोल्हापुर की हेवरवाड़ा ग्राम पंचायत में विधवाओं के लिए इस अमानवीय प्रथा को समाप्त करने का निर्णय लिया है।

परिवर्तन प्रकृति का नियम है। ऐसे में मानव समाज भी परिवर्तन को स्वीकार न करे तो मानव के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगना स्वभाविक है। ऐसे में बदलावों को सहजता के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि विधवाओं के प्रति समाज का नजरिया बदल रहा है। वर्तमान तक आते-आते बहुत कुछ बदला है। ससुराल में विधवाओं को ज्यादा अधिकार मिलने लगे, पुनर्विवाह भी होने लगे और इस दिशा में एक नई बयार चलती दिखाई देने लगी। लेकिन, इस तरह का बदलाव एक दिन में नहीं होता।

विधवाओं को लेकर सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर सोच बदल रही है। उम्मीद की जा सकती है कि यह बदलाव कुछ परिवारों और कुछ समाजों तक ही सीमित नहीं होगा, व्यापक स्तर पर दिखाई देगा। कुछ समाजों में तो विधवा-विधुर परिचय सम्मेलन भी होने लगे हैं। जब ऐसे कदम उठेंगे, तभी विधवाओं को भी अपना जीवन जीने का हक मिल पाएगा। समाज में अक्सर एक बात कही जाती है कि बहू, बेटी की तरह होती है। बेटी तो शादी के बाद विदा हो जाती है, पर बहू घर में ही रहती है।

लेकिन, कई बार हालात ऐसे हो जाते हैं, जब घर की रौनक रहने वाली बहू का शृंगार उतर जाता है। कपड़ों की रंगीनियत उतर जाती है और उसकी जगह उसे वैध्वय का चोला पहनना पड़ता है। जीवन का यह बेहद त्रासद सच होता है। फिर भी जीवन तो जीना ही है। जब परिवार और समाज जीवन का यह दर्द बांट लेता है, तो जीवन आसान हो जाता है। कुछ साल पहले तक यह सोचना भी मुश्किल था, पर अब समाज की परंपराएं दरक रही हैं। मान्यताएं ध्वस्त होने लगी और विधवाओं का दर्द बांटा जाने लगा है। अब उनकी भी शादियां होने लगी हैं, ताकि वे नया जीवन शुरू कर सकें।

मध्यप्रदेश के धार में इसी अखातीज पर एक परिवार ने सामाजिक वर्जनाओं को जिस तरह खंडित किया, वह समाज के बदलते सोच का जीवंत उदाहरण है। ससुराल में बहू को बेटी की तरह सम्मान मिलना चाहिए, इस बात की मिसाल धार के इस परिवार में देखी गई। उन्होंने कोरोना काल में अपने बेटे को खो दिया था। यह ऐसा दर्द था, जिसकी भरपाई आसान नहीं थी।

मगर, बेटे की मौत के बाद भी सास-ससुर ने बहू को बेटी की तरह रखा। बेटे-बहू की एक बेटी भी थी। काफी विचार-विमर्श के बाद तय किया गया कि विधवा बहू का पुनर्विवाह किया जाए। उस परिवार ने इसी अक्षय तृतीया के दिन अपनी विधवा बहू की दूसरी शादी करवाई और उसे बेटी की तरह विदा किया। उन्होंने शादी में उपहार के तौर पर अपनी बहू को साठ लाख रुपए का घर भी दिया।

यह कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं, सच्ची घटना है, जिसके कई लोग गवाह हैं। धार शहर के प्रकाश नगर में रहने वाले युगप्रकाश स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त एजीएम हैं। कोरोना की दूसरी लहर में उन्होंने अपने बेटे को खो दिया था। इसके बाद उन्होंने किसी तरह खुद को और परिवार को संभाला। फिर उन्हें विधवा बहू के भविष्य की चिंता भी सताने लगी थी। उन्होंने बहू की दूसरी शादी करने का सोचा, लेकिन बहू राजी नहीं हुई।

बहुत समझाया तो उसने दूसरी शादी के लिए हामी भर दी। कुछ दिनों बाद नागपुर के रहने वाले एक युवक के साथ उसका रिश्ता पक्का हो गया। फिर इस आखातीज पर शादी भी हो गई। बेटी भी अपनी मां के साथ नए परिवार में बसने नागपुर चली गई। उसके पूर्व पति भोपाल की एक कंपनी में सीनियर साफ्टवेयर इंजीनियर थे। उनके निधन के बाद बहू को कंपनी ने नौकरी दे दी। सास-ससुर ने बेटे द्वारा नागपुर में खरीदा घर भी बहू को उपहार में दे दिया।

ऐसी और इस तरह की अन्य घटनाएं बताती हैं कि अब बहू के प्रति ससुराल की सोच बदलने लगी है। अब उसके लिए सफेद लिबास हमेशा का पहनावा नहीं रहा। धीरे-धीरे ऐसी सामाजिक सोच पनपने लगी है, जब विधवाओं के पुनर्विवाह होने लगे। कुछ समाजों में बकायदा विधवा-विधुर विवाहों के परिचय सम्मेलन भी आयोजित होने लगे। जबकि, एक समय ऐसा था, जब इस तरह की बातें करना भी पाप समझा जाता था।

समाज में आई इस चेतना ने अहसास करा दिया कि विधवा होना एक हादसा है, जिसे जीवन भर नहीं भोगा जा सकता। हां, इन बदलती परिस्थितियों के बीच भी अभी भारतीय समाज में तकरीबन सात करोड़ विधवाएं हैं। ये विधवाएं मथुरा, वृंदावन, काशी और बनारस जैसी जगहों में अपनी जिंदगी के बाकी दिन काटती देखी जा सकती हैं, जिनकी कोई पहचान नहीं होती। इसलिए राजनीतिक दल भी इन्हें अपना वोट बैंक नहीं मानते। इनके लिए कभी कोई व्यापक आंदोलन भी खड़ा नहीं होता।

विधवाओं के दर्द को समझने के लिए पहली बार देश में आजादी के बाद 1995 में मार्टी चेन और ज्यां द्रेज ने बड़ा शोध किया। उन्होंने अपने शोध के परिणामों को बांटने के लिए एक बड़ी कार्यशाला का आयोजन भी किया था, जिसमें देश के विभिन्न इलाकों की विधवाओं ने हिस्सा लिया। कई विधवाओं ने बताया कि हालांकि कानून के आधार पर उन्हें अपने दिवंगत पतियों की और अपने मां-बाप द्वारा उन्हें दी गई जमीन का मालिक बनने का अधिकार है, पर इससे अक्सर उन्हें वंचित रखा जाता है।

यहां तक कि कई बार परिस्थितियां ऐसी निर्मित होती हैं कि उन्हें ‘चुड़ैल’ घोषित कर दिया जाता है और कई बार उनकी जान भी ले ली जाती है। यह सब उस लोकतांत्रिक परिवेश में होता है, जहां विधि के समक्ष समानता और निर्बाध जीवन जीने की स्वतंत्रता संविधान सभी को मुहैया कराता है। फिर चाहें वह स्त्री हो या पुरुष। हिंदू मान्यताओं के अनुसार अर्धनारीश्वर रूप से तो सभी परिचित हैं। जहां शिव पुरुष और पार्वती स्त्री का प्रतिनिधित्व करती हैं और यह स्वरूप कहीं न कहीं यह दर्शाता है कि दोनों के बिना यह सृष्टि और संसार अधूरा है। फिर स्त्री के प्रति इतनी घृणा का भाव समाज में कहां से आता है?

स्त्री चाहे विवाहित हो या विधवा, उसका समाज में स्थान कोई छीन नहीं सकता। ऐसे में सिर्फ किसी एक राज्य या एक इलाके में विधाओं के प्रति सोच बदलने से समाज में यह परंपरा पूर्णरूपेण नहीं बदलने वाली। इसके लिए अब राजनीतिक और सामाजिक चेतना पूरे देश में जगाने की जरूरत है, क्योंकि सात करोड़ की आबादी कोई कम नहीं है। हमें इसके हक के लिए एकजुट होना चाहिए, क्योंकि एक बेहतर जीवन जीना सभी का अधिकार है।

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