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डिजिटल शासन की चुनौतियां

प्रौद्योगिकी मानवता के लिए बड़ी धरोहर और संपदा है।

डिजिटल शासन की चुनौतियां

सुशील कुमार सिंह

भारत में हर पांचवां व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे है और हर चौथा नागरिक अशिक्षित है। समझने वाली बात यह भी है कि किसी के पास मोबाइल होना डिजिटल हो जाने का प्रमाण नहीं है, जब तक कि उसके पास इंटरनेट आदि की सुविधा व जानकारी न हो।

प्रौद्योगिकी मानवता के लिए बड़ी धरोहर और संपदा है। जब देश में डिजिटल शासन की बात होती है तो नए प्रारूप और एकल खिड़की संस्कृति मुखर हो जाती है। नागरिक केंद्रित व्यवस्था के लिए सुशासन प्राप्त करना एक लंबे समय की दरकार रही है। ऐसे में डिजिटल शासन इसका बहुत बड़ा आधार है। यह एक ऐसा क्षेत्र है और एक ऐसा साधन भी है जिससे नौकरशाही तंत्र का समुचित प्रयोग कर व्याप्त कठिनाइयों को दूर किया जा सकता है।

देखा जाए तो नागरिकों को सरकारी सेवाओं की आपूर्ति और प्रशासन में पारदर्शिता की वृद्धि के साथ व्यापक नागरिक भागीदारी के मामले में डिजिटल शासन कहीं अधिक प्रासंगिक है। डिजिटल शासन चुस्त और सुव्यवस्थित ई-सरकार का ताना-बाना है। प्रौद्योगिकी वही अच्छी होती है जो जीवन आसान करती हो, जनोपयोगी नीतिगत अर्थव्यवस्था को सुनिश्चित करती हो और संतुलन कायम रखने में कमतर न हो।

आज डिजिटल सेवाएं अपेक्षाकृत कम जटिल और अधिक प्रभावी तो हैं, मगर डिजिटल शासन की सफलता के लिए मजबूत डिजिटल बुनियादी ढांचा तैयार करना जरूरी है। सरकार के समस्त कार्यों में प्रौद्योगिकी का अनुप्रयोग ई-शासन कहलाता है, जबकि न्यूनतम सरकार और अधिकतम शासन, प्रशासन में नैतिकता, जवाबदेही, उत्तरदायित्व की भावना व पारदर्शिता दक्ष सरकार के गुण हैं, जिसकी पूर्ति डिजिटल शासन के बगैर संभव नहीं है। पड़ताल बताती है कि डिजिटल शासन की रूपरेखा पांच दशक पुरानी है।

हालांकि उस दौर में शासन डिजिटल तो नहीं था, मगर इलेक्ट्रानिक विधा के अंतर्गत आधारभूत व्यवस्था को सुसज्जित करने का प्रयास शुरू हो चुका था। गौरतलब है कि इलेक्ट्रानिक विभाग की स्थापना 1970 में हुई थी और 1977 में राष्ट्रीय सूचना केंद्र के साथ ई-शासन की दिशा में पहला उठा कदम था। ई-शासन को बढ़ावा देने की दिशा में 1987 में प्रक्षेपित उपग्रह आधारित कंप्यूटर नेटवर्क (एनआइसीएनईटी) एक क्रांतिकारी कदम था। इसका मुखर पक्ष 1991 के उदारीकरण के बाद देखने को मिलता है।

साल 2006 में राष्ट्रीय ई-शासन योजना के प्रकटीकरण के बाद डिजिटल शासन का स्वरूप व्यापक रूप में सामने आया और इसी कड़ी में एक जनवरी 2015 को डिजिटल इंडिया योजना शुरू हुई। डिजिटल शासन के तीन मुख्य क्षेत्रों में प्रत्येक नागरिक की सुविधा के लिए बुनियादी ढांचा, शासन व मांग आधारित सेवाएं तथा नागरिकों का डिजिटल सशक्तिकरण जैसे लक्ष्य शामिल है। डिजिटल शासन शासन में दक्षता को बढ़ाता है। इसमें लोग, प्रक्रिया, प्रौद्योगिकी व संसाधन एक स्तंभ के रूप में शुमार होते हैं। गौरतलब है कि डिजिटल इंडिया भारत को डिजिटल रूप से सशक्त समाज व ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में परिवर्तित करने के उद्देश्य से शुरू किया गया अभियान है।

भारत में 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के दिन से ही पंचवर्षीय योजनाओं और कई कार्यक्रमों के जरिए जन सशक्तिकरण के प्रयास शुरू हो गए थे। विदित हो कि सुशासन लोक सशक्तिकरण का पर्याय है। डिजिटल शासन इस दिशा में एक ऐसा उपकरण है जो योजनाओं को पारदर्शी तरीके से जनता तक परोसता है। भारत की पृष्ठभूमि में झांका जाए तो लगभग सात दशकों में विभिन्न आयोगों ने सुशासन और लोक संसाधनों के बेहतर प्रशासनिक प्रबंधन के बारे में अनुशंसाएं दी हैं जो डिजिटल शासन के माध्यम से कहीं अधिक ताकत के साथ और अधिक उपयोगी सिद्ध हो रही हैं।

प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1966-70) ने सचिव स्तर से लेकर वित्तीय एवं योजना व विकेंद्रीकरण तक कई सुधार प्रस्तावित किए। 1964 की के. संथानम रिपोर्ट के आधार पर भारतीय सतर्कता आयोग का गठन भ्रष्टाचार से निपटने के एक उपाय के रूप में परिलक्षित हुआ, जो मौजूदा समय में डिजिटल शासन के माध्यम से और मजबूती से सामने आया है। डिजिटल शासन भ्रष्टाचार से निपटने और पारदर्शिता हासिल करने का एक अच्छा माध्यम साबित हो रहा है।

भारत में डिजिटल शासन के समक्ष चुनौतियां भी कम नहीं हैं। और ये चुनौतियां केवल तकनीक से संबंधित ही नहीं हैं, बल्कि संगठनात्मक और संस्थात्मक के अलावा समावेशी विकास लक्ष्य हासिल करने और सतत विकास को बनाए रखने से भी जुड़ी हैं। गौरतलब है कि डिजिटल शासन के लिए किए जाने वाले उपाय महंगे होते हैं। इनकी अवसंरचना में बिजली, इंटरनेट, डिजिटल उपकरण आदि बुनियादी सुविधाओं का यदि अभाव बना रहता है तो चुनौतियां बरकरार रहेंगी। जाहिर है, इन पर भारी निवेश की जरूरत है।

सरकार के समस्त कार्यों में प्रौद्योगिकी का अनुप्रयोग ही ई-शासन कहलाता है। किसानों के खाते में सम्मान निधि का हस्तांतरण डिजिटल शासन का ही एक उदाहरण है। ई-शिक्षा, ई-बैंकिंग, ई-टिकट, ई-सुविधा, ई-अस्पताल, ई-याचिका और ई-अदालत सहित ऐसे तमाम उदाहर हैं जो शासन को सुशासन की ओर ले जाते हैं। देश में साढ़े छह लाख गांव और ढाई लाख पंचायतें हैं, जहां बिजली और इंटरनेट से जुड़ना आज भी एक आम समस्या है। नवंबर 2021 तक पूरे देश में मोबाइल ग्राहकों की संख्या लगभग एक सौ बीस करोड़ थी। साल 2025 तक भारत में इंटरनेट उपयोग करने वालों की तादाद नब्बे करोड़ हो जाएगी।

मौजूदा समय में डिजिटलीकरण को सफल अर्थव्यवस्था के क्षेत्रों की साझा कड़ी होनी चाहिए। नोटबंदी के बाद से ही सरकार डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में जुट गई। इसी क्रम में डिजिटल इंडिया, ई-शासन जैसे मिशन तेज कर दिए गए। साल 2024 तक भारत को पांच लाख करोड़ डालर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य रखा गया है। डिजिटलीकरण की चुनौतियां जैसे-जैसे कम होंगी, वैसे-वैसे अर्थव्यवस्था भी बढ़ेगी। भारत डिजिटल सेवा क्षेत्र में बढ़ रहे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए एक बड़ा ठिकाना भी है। इसकी सबसे बड़ी वजह यहां की जनसंख्या है जिसमें नए उद्यमों के लिए भरपूर संभावनाएं हैं।

विगत कुछ वर्षों में निजी और सरकारी सेवाओं को डिजिटल रूप प्रदान किया गया है। मगर समझने वाली बात यह भी है कि किसी के पास मोबाइल होना डिजिटल हो जाने का प्रमाण नहीं है, जब तक कि उसके पास इंटरनेट आदि की सुविधा व जानकारी न हो। एसोचैम की रिपोर्ट बताती है कि नीतियों में अस्पष्टता व ढांचागत कठिनाइयों के कारण महत्त्वाकांक्षी डिजिटल परियोजना का सफल कार्यान्वयन सुनिश्चित करने में कई चुनौतियां हैं। उदाहरण के लिए, बार-बार नेटवर्क का टूटना एक आम समस्या है।

गौरतलब है कि पिछले साल जून में भारत सरकार के आयकर विभाग ने अपनी वेबसाइट का प्रारूप बदला था और ग्राहकों को दी गई समय सीमा के कई दिनों तक वेबसाइट काम नहीं कर पा रही थी। इस तकनीकी गड़बड़ी के चलते कामकाज प्रभावित हो रहे थे। अनुमान यह भी है कि बेहतर इंटरनेट कनेक्टिविटी के लिए भारत को अस्सी लाख से अधिक वाई फाई हाटस्पाट की जरूरत है।

बरसों पहले यह संदर्भित हुआ था कि भारत में जैसे-जैसे डिजिटलीकरण बढ़ता जाएगा, वैसे-वैसे डिजिटल विशेषज्ञों की संख्या भी बढ़ानी होगी और यह पांच लाख के आसपास हो सकती है। राष्ट्रीय डिजिटल साक्षरता मिशन का लक्ष्य देश के हर घर में कम से कम एक व्यक्ति को डिजिटल साक्षर बनाने का है। फिलहाल डिजिटल शासन जिस पैमाने पर सहज दिखता है, उसे बनाए रखना उतना ही चुनौतीपूर्ण भी है। भारत अब दुनिया में प्रौद्योगिकी के साथ सहजता से जुड़ी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। मगर इसमें व्याप्त चुनौतियों को समाप्त किए बिना सुशासन की राह को पूरी तरह समतल करना संभव नहीं होगा।

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