परिवार संस्था के समक्ष चुनौतियां

इस दौर में संबंधों का अंत, भावनाओं का अंत तथा परिवार के अंत की चर्चा भी कुछ समाज-वैज्ञानिक करने लगे हैं।

सांकेतिक फोटो।

ज्योति सिडाना

इस दौर में संबंधों का अंत, भावनाओं का अंत तथा परिवार के अंत की चर्चा भी कुछ समाज-वैज्ञानिक करने लगे हैं। यह एक विरोधाभास ही तो है कि वसुधैव कुटुंबकम् में आस्था रखने वाला समाज, जो सारी दुनिया को अपना परिवार मानने में विश्वास रखता हो, अब वह स्वार्थ और व्यक्तिवादिता के मूल्य में विश्वास करने लगा है। एक समय था, जब परिवार के सदस्य एक-दूसरे के लिए त्याग करने को तत्पर रहते थे और आज संपत्ति, जमीन या पैसों के लिए एक-दूसरे की हत्या करने से भी नहीं चूकते।

नवजागरण काल या ज्ञानोदय के बाद से राज्य, समाज और व्यक्ति में सदैव समाज को ही सर्वोपरि माना गया। पर जैसे-जैसे पूंजीवाद का विस्तार होता गया, बाजार इन सबसे ऊपर हो गया। आज व्यक्ति की जरूरतों से बाजार में मांग या उत्पादन का निर्धारण नहीं होता, बल्कि बाजार तय करता है कि किस वस्तु की मांग उत्पन्न करनी है या किस वस्तु या सेवा का उत्पादन करना है। इसके लिए बाजार मीडिया को एक साधन या उपकरण के रूप में प्रयोग करता है। बाजार का केवल एक ही उद्देश्य होता है- अधिक से अधिक लाभ कमाना। लाभ कमाने के लिए केवल वस्तुओं का क्रय-विक्रय नहीं होता, अब तो भावनाओं, रिश्तों, संबंधों का भी क्रय-विक्रय होने लगा है। हर चीज बाजार में तैयार माल के रूप में उपस्थित है, सिर्फ जेब में पैसे होने चाहिए। इस बाजार ने सच कर दिखाया कि बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैया।

जब तक समाज सर्वोपरि था तब तक सामूहिकता और त्याग की भावना, संयुक्त परिवार, परार्थवादिता, रिश्तों की कद्र, भावनाएं व्यक्ति के लिए महत्त्व रखती थीं, लेकिन जबसे बाजार सर्वोपरि हो गया है, यह सब बेमानी हो गए हैं। ‘मैं’ की भावना ने ‘हम’ की भावना को विस्थापित कर दिया है। शायद यही कारण है कि परिवार और विवाह जैसी संस्थाएं आज चुनौती का सामना कर रही हैं। पिछले कुछ समय से संपत्ति विवाद को लेकर परिवारों में निकट संबंधियों की हत्याओं के मामलों में वृद्धि देखी जा रही है।

गाजियाबाद के सैंथली गांव में संपत्ति हथियाने के लिए एक व्यक्ति ने अपने बड़े भाई की हत्या कर उसकी पत्नी से शादी कर ली। फिर अपनी दो भतीजियों और दो भतीजों को भी मौत की नींद सुला दिया। अयोध्या में एक भांजे ने संपत्ति विवाद के चलते अपने मामा-मामी सहित उनके तीनों बच्चों की गला रेत कर हत्या कर दी। हैदराबाद के वारंगल कस्बे में एक व्यक्ति ने संपत्ति विवाद को लेकर अपने भाई और दो अन्य रिश्तेदारों की बेरहमी से हत्या कर दी। बिहार के बेगूसराय में भूमि विवाद में वृद्ध किसान की गला रेत कर हत्या कर दी गई।

लुधियाना में भी संपत्ति के विवाद के कारण छोटे भाई को गोली मार कर दी। बरेली के मीरगंज क्षेत्र में एक एडवोकेट ने संपत्ति विवाद के चलते अपने माता-पिता की गोली मार कर हत्या कर दी। ये घटनाएं तो केवल नमूना भर हैं। इन घटनाओं से यह तो स्पष्ट हो जाता है कि आज भौतिकतावादी जीवन और पैसों की लालसा व्यक्ति में इतनी हावी है कि अपनों का प्यार और त्याग उसे नहीं दिखाई देता, दिखाई देता है तो केवल पैसा, सब कुछ आसानी से पाने की लालसा। वह सिर्फ आज में जीता है, भविष्य में उसके साथ क्या होगा, नहीं सोचता। क्योंकि उसके लिए दिखावा, स्टेटस और ऐशो-आराम बहुत जरूरी हो गया है फिर इसकी कीमत भले ही उसका परिवार ही क्यों न हो। कोई भी ऐसा रिश्ता नहीं, जो दागदार नहीं हुआ हो।

संस्कार, मूल्य, प्रथाएं, त्योहार सब कुछ केवल दिखावा और औपचारिकता रह गए हैं। परिवार और विवाह संस्थाएं, जो सुरक्षा की गारंटी देते थे आज उनकी यह भूमिका हाशिए पर है। माना कोविड महामारी ने लोगों को बड़ी संख्या में बेरोजगार कर दिया है, उनमे असुरक्षा की भावना और भय उत्पन्न हो गया है और इसके परिणामस्वरूप भी संपत्ति विवाद की घटनाएं परिवारों में सामान्य हो गई हैं। लेकिन भारतीय संस्कृति में प्रारंभ से ही परिवार हर तरह की असुरक्षा से अपने सदस्यों को सुरक्षा देता आया है, अपनों के लिए संघर्ष करना, हर समस्या में उनका साथ देता आया है।

फिर अचानक परिवार में वह विश्वास कहां गया? यह सोचने का विषय है। क्योंकि स्वस्थ परिवारों पर ही स्वस्थ और खुशहाल समाज की नींव रखी जा सकती है। चूंकि ऐसा नहीं हो रहा है, इसलिए खुशहाली सूचकांक में भारत का स्थान हर साल नीचे गिरता जा रहा है। किसी से छिपा नहीं है कि समृद्ध, खुशहाल और शांतिप्रिय देश में अब तनाव, निराशा, क्रोध, एकाकीपन, हिंसा जैसे पक्ष हावी होने लगे हैं।

एनसीआरबी के अनुसार वर्ष 2020 में राजस्थान में एक सौ सोलह लोगों की हत्या का कारण संपत्ति या जमीन संबंधी विवाद था, वहीं चार लाख से अधिक मामले राजस्व अदालतों में लंबित हैं। सोचिए, ये तो केवल एक राज्य के आंकड़े हैं, समग्र देश के आंकड़े कितने भयावह होंगे। विशेषज्ञों के अनुसार राजस्व रिकार्ड का उचित संधारण नहीं होना और सीमा नापने की पुरानी तकनीक के होने से इस तरह की समस्याओं और विवादों में वृद्धि हो रही है। इसलिए आवश्यकता है कि समय के साथ अब नई तकनीकों का प्रयोग किया जाए और राजस्व रिकार्ड का उचित और सही तरीके से संधारण किया जाए, ताकि इस तरह के विवादों को समय पर निपटाया जा सके।

समाजशास्त्री एमील दुर्खीम ने अपने एक अध्ययन में यह स्थापित करने का प्रयास किया था कि सामाजिक संबंधों के प्रति तटस्थ होते जाना व्यक्ति को सामूहिकता से पृथक करता चला जाता है और ऐसे में अनेक निर्णय व्यक्ति केंद्रित हो जाते हैं और इसी के परिणामस्वरूप वे आत्महत्या जैसे नकारात्मक कदम उठा लेते हैं। इसलिए दुर्खीम एक ऐसे समाज की स्थापना या निर्माण का सुझाव देते हैं, जिसमें व्यक्तिवादिता, नैतिक सुदृढ़ता और सामाजिक न्याय का समन्वय हो। अगर शिक्षा इस दिशा में अपना योगदान नहीं करती, तो उसका आंशिक महत्त्व रह जाता है।

वर्तमान दौर में सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाओं ने मुख्यत: परंपरागत परिवार प्रणालियों के सामने अनेक संकट उत्पन्न कर दिए हैं। तलाक दर में वृद्धि, विवाह के पूर्व सहजीवन, एकल अभिभावक परिवार और एकल व्यक्ति परिवार वे प्रवृतियां हैं, जो परंपरागत परिवारों के सम्मुख अनेक सवाल उत्पन्न करती हैं। कुछ लोगों का मत है कि यह परिवर्तन आधुनिक समाजों में व्यक्तिवाद के बढ़ते प्रभाव को बताते हैं।

यह व्यक्तिवादिता परंपरागत परिवार को अस्थिर बना देती है। कुछ विचारकों का यह भी मत है कि समाज में हो रहे परिवर्तनों ने अस्थिरता और असुरक्षा को व्यवस्था का हिस्सा बना दिया है। परिवार में जहां एक तरफ सदस्यों को पारिवारिक प्रतिबद्धता के मूल्य सिखाए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ उसे शिक्षा के क्षेत्र में प्रविष्ट करवा कर व्यक्तिवादिता के मूल्य से परिचित कराया जाता है, ताकि वह आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र और स्वायत्तशासी बन सके। यह एक तथ्य है कि उदारवादी दौर ने गतिशीलता को इतना तीव्र किया है कि परिवार अनेक बार कैरियर में बाधक नजर आता है, क्योंकि संबंधों में उदारवाद उभरा है। अत: विवाह से निर्मित यौनिक संबंधों से जुड़ी नैतिकता का मूल्य हाशिए पर चला गया है। संतानोत्पत्ति को स्वतंत्र जीवन व्यतीत करने की प्रक्रिया में बाधक माना जाने लगा है।

यही कारण है कि इस दौर में संबंधों का अंत, भावनाओं का अंत तथा परिवार के अंत की चर्चा भी कुछ समाज वैज्ञानिक करने लगे हैं। यह एक विरोधाभास ही तो है कि वसुधैव कुटुंबकम् में आस्था रखने वाला समाज, जो सारी दुनिया को अपना परिवार मानने में विश्वास रखता हो, अब वह स्वार्थ और व्यक्तिवादिता के मूल्य में विश्वास करने लगा है। एक समय था जब परिवार के सदस्य एक-दूसरे के लिए त्याग करने को तत्पर रहते थे और आज संपत्ति, जमीन या पैसों के लिए एक-दूसरे की हत्या करने से भी नहीं चूकते। यही कारण है कि आज चारों तरफ समाज में अविश्वास, क्रोध, ईर्ष्या, घृणा, धोखा, हिंसा, तनाव दिखाई देता है। ऐसे में किसी देश का प्रसन्नता सूचकांक, जनतांत्रिक सूचकांक, भूख सूचकांक, मानव विकास सूचकांक में स्थान अग्रिम पंक्ति में कैसे हो सकता है।

पढें राजनीति समाचार (Politics News). हिंदी समाचार (Hindi News) के लिए डाउनलोड करें Hindi News App. ताजा खबरों (Latest News) के लिए फेसबुक ट्विटर टेलीग्राम पर जुड़ें।

Next Story
रावण ने अपने आखिरी पलों में लक्ष्मण को दिया था यह ज्ञान, आपकी सक्सेस के लिए भी जरूरी हैं ये बातेंravan, ram, laxman, ramayan, valuable things, srilanka, धर्म ग्रंथ रामायण, राम, रावण, लंकापति रावण, वध श्रीराम, शिवजी की पूजा, लक्ष्मण
अपडेट