धरती बचाने की चुनौती

भारत सहित दुनिया के अधिकतर देशों को सौर ऊर्जा उपयोग के संसाधन बढ़ाने के लिए लंबा रास्ता तय करना है।

सांकेतिक फोटो।

अतुल कनक

भारत सहित दुनिया के अधिकतर देशों को सौर ऊर्जा उपयोग के संसाधन बढ़ाने के लिए लंबा रास्ता तय करना है। पनबिजली घर और परमाणु बिजली घर भी एक विकल्प हो सकते हैं, लेकिन इनके लिए भी विकासशील देशों और गरीब देशों को बहुत बड़े बजट की आवश्यकता होगी।

पिछले तीन दशकों में सारी दुनिया में जिस तरह से प्राकृतिक उथल-पुथल मची है, उसने दुनिया भर के बुद्धिजीवियों को आगाह कर दिया है कि अगर हम अब भी वातावरण में जहरीली गैसों के उत्सर्जन को लेकर सावधान नहीं हुए, तो समूची मानवता के लिए आने वाले दिन बहुत ही कठिन होंगे। कहीं जंगल जल रहे हैं, तो कहीं बिन मौसम बरसात हो रही है और बाढ़ आ रही है, कहीं भूस्खलन जैसी आपदा देखने को मिल रही है, तो कहीं समुद्र का जल स्तर खरतनाक तरीके से बढ़ता हुआ देखा जा रहा है। बेहद ठंडे माने जाने वाले प्रदेशों में भी तापमान में आश्चर्यजनक ढंग से बढ़ रहा है। वैज्ञानिक इन घटनाओं का कारण ग्रीन हाउस प्रभाव को मानते हैं। ग्रीन हाउस प्रभाव यानी वातावरण में जहरीली गैसों का आवश्यकता से अधिक उत्सर्जन।

जीवाश्म ईंधन के बढ़ते प्रयोग से लेकर एअरकंडीशनर, फ्रिज जैसे उपकरणों के अतिप्रचलन और कोयले से उत्पादित विद्युत पर हमारी बढ़ती निर्भरता जहरीली गैसों के उत्सर्जन का बड़ा कारण है। रही-सही कसर उन जंगलों की कटाई ने पूरी कर दी, जो कार्बन डाइआक्साइड जैसी गैसों को अवशोषित कर लिया करते थे। हालत यह है कि वैज्ञानिक अब तो इस बात तक की कल्पना करने लगे हैं कि यदि यही सब चलता रहा तो क्या भविष्य के मानव को अपने साथ कृत्रिम आक्सीजन का सिलेंडर लेकर चलना होगा! इस कल्पना को फिजूल इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि हवा साफ करने वाले उपकरण (एअर प्योरिफाइर) का कारोबार गति पकड़ चुका है।

वायुमंडल में बढ़ते प्रदूषण ने दुनिया को चिंतित कर दिया है। पिछले कुछ सालों से दुनिया भर में इस बात पर विमर्श बहुत प्रबल हुआ है कि मानवता को कार्बन उत्सर्जन के दुष्प्रभावों से कैसे बचाया जाए? दुनिया भर के नीति नियंता इस या उस मंच पर पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे पर परस्पर विचार करते दिख रहे हैं। यह महत्त्वपूर्ण है कि बढ़ते कार्बन उत्सर्जन के दुष्प्रभावों से मानवता को बचाने के दो ही तरीके हो सकते हैं। एक यह कि परंपरागत र्इंधन स्रोतों पर निर्भरता को कम किया जाए और दूसरा यह कि उन जंगलों की सुरक्षा की जाए जो कार्बन डाइआक्साइड को अवशोषित कर लेते हैं।

दुनिया में शांति और सकारात्मकता की स्थापना तथा संरक्षा के लिए सक्रिय संस्था संयुक्त राष्ट्र की पहल पर सन 2015 में पेरिस में सम्मेलन हुआ था। इस सम्मेलन में दुनिया भर के देशों ने कार्बन उत्सर्जन पर इस तरह नियंत्रण स्थापित करने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रकट की थी कि धीरे-धीरे कार्बन उत्सर्जन शून्य हो जाए और पृथ्वी के बढ़ते हुए तापमान को नियंत्रित किया जा सके। लेकिन विसंगति यह रही कि जो देश अपने संसाधनों के दम पर इस दिशा में अन्य देशों के लिए एक मिसाल हो सकते थे, उनमें से भी कई अपनी जिम्मेदारियों के प्रति उदासीन रहे।

बेशक गरीब देशों के लिए तो परंपरागत ऊर्जा संसाधनों को त्याग कर नवीनीकृत ऊर्जा संसाधनों की स्थापना करना इसलिए एक दुरूह कार्य हो सकता है क्योंकि उनकी अपनी आर्थिक सीमा होती है। इसीलिए करीब एक दशक पहले विकसित देशों ने करीब एक दशक पहले यह वादा किया था कि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निबटने के लिए वे हर साल सौ अरब डालर देंगे। लेकिन विकसित देशों ने न तो इस अवधि में अपने उस वादे को निभाया और न ही हाल में ग्लासगो में जलवायु शिखर सम्मेलन में उस प्रतिबद्धता को दोहराना ही आवश्यक समझा।

देखा जाए तो संकट ऐसे ही नहीं गहरा रहा। ज्यादातर देशों की अपनी मजबूरियां और राष्ट्रीय हित आड़े आ रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि बहुत सारे देशों ने अब तक यह घोषित नहीं किया है कि वे शून्य कार्बन उत्सर्जन की स्थिति को कब तक हासिल करने की कोशिश करेंगे। सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था का आधार जीवाश्म र्इंधन है और इसलिए वह जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए आवश्यक कदम उठाने में उत्साह नहीं दिखा रहा। लेकिन रूस और आस्ट्रेलिया जैसे देशों का भी रवैया निराशाजनक ही रहा। ग्लासगो सम्मेलन में मीथेन उत्सर्जन को कम से कम तीस प्रतिशत घटाने के जिस संकल्प पत्र पर हस्ताक्षर किए गए, उस पर भी चीन, रूस, आस्ट्रेलिया और भारत जैसे कुछ देशों ने अपनी पूर्ण सहमति व्यक्त नहीं की। भारत उन देशों से भी अलग हो गया है जिन्होंने वनों की कटाई पर नीतिगत अंकुश लगाने संबंधी समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।

लेकिन भारत ने पहली बार कार्बन उत्सर्जन शून्य करने संबंधी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित किया है। शिखर सम्मेलन के अपने उद्बोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया को जो ‘पंचामृत’ सूत्र दिया, उसने दुनिया को एक राह दिखाई है कि बिना प्रकृति से रिश्ता कायम रखे हम मानवता के सुख को सवंर्द्धित नहीं कर सकेंगे। मानवता को बचाने के लिए हमें सूर्य के साथ चलना होगा। इसका सीधा सा आशय यह है कि हमे सूरज की ऊर्जा पर अपनी निर्भरता बढ़ानी होगी। हालांकि भारत सहित दुनिया के अधिकांश देशों को सौर ऊर्जा के उपयोग के संसाधन बढ़ाने के लिए लंबा रास्ता तय करना है। पनबिजली घर और परमाणु बिजली घर भी एक विकल्प हो सकते हैं, लेकिन इनके लिए भी विकासशील देशों और गरीब देशों को बहुत बड़े बजट की आवश्यकता होगी। कोरोना महामारी के तुरंत बाद इस बजट को जुटा पाना सबके बस में नहीं होगा।

परंपरागत ऊर्जा साधनों से मुक्ति पाने के लिए वैकल्पिक साधनों का एक पूरा संजाल खड़ा कर पाना भी भारत जैसे विशाल देशों के लिए कोई आसान नहीं है। मसलन बिजली से चलने वाली कारों के लिए देशभर में पर्याप्त चार्जिंग स्टेशनों को स्थापित करना चुनौतीपूर्ण काम है। लेकिन पुरानी कहावत है कि जहां चाह होती है, वहां राह मिल ही जाती है। भारत ने सन 2070 तक अपने यहां कार्बन उत्सर्जन शून्य स्तर पर लाने का वादा किया है। उम्मीद की जा सकती है कि अपने कड़े फैसलों के लिए चर्चा में रही भारत की मौजूदा सरकार इस दिशा में भी कुछ ठोस कदम उठाएगी। मसलन, भारत में सन 2030 तक बिजली उत्पादन क्षमता का आधा उत्पादन नवीकरणीय स्रोतों जैसे सौर ऊर्जा, पनबिजली आदि से करने का लक्ष्य प्राप्त कर लेगा।

हालांकि अकेले भारत की कोशिशों से सारी पृथ्वी का संरक्षण सुनिश्चित नहीं हो सकेगा। लेकिन भारत इस प्रसंग में दुनिया को एक राह तो दिखा ही रहा है। वरना जलवायु शिखर सम्मेलन के दौरान जानी मानी पर्यावरण संरक्षण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग का दिया यह बयान महत्त्ववपूर्ण हो जाता है कि ‘यह सम्मेलन विश्व भर के नेताओं के लिए ऐसे पाखंड का मंच बन गया है, जहां वे यह दिखाते हैं कि जलवायु परिवर्तन के लिए वो संवेदनशील हैं।

वास्तव में हम उस चिंतन से बहुत दूर हैं, जो इस संबंध में जरूरी है।’ ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जानसन ने तो यह भी कहा कि दुनिया इस समय तबाही के डिवाइस से जुड़ी है। जबकि संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष अब्दुल्ला शाहिद ने चिंता प्रकट करते हुए कहा कि हमारे पास जलवायु परिवर्तन के कारण उपजे संकट को हल करने के लिए क्षमता और संसाधन मौजूद हैं, लेकिन हम पर्याप्त कदम नहीं उठा रहे हैं। उम्मीद है प्रकृति से जुड़ाव की पहल का आह्वान इस स्थिति को बदल सकेगा जिसे रेखांकित करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतारेस ने ग्लासगो में ही कहा-‘हम खुद अपनी कब्रें खोदने के काम में लगे हुए हैं। हमें इसे रोकना होगा।’

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